हमारे पुरोधा
हमारे पुरोधा -आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी: जिनकी वजह से भव्य है आज हिंदी
Oct 19, 2026
आनंद पुरोहित 'मस्ताना'
खबर सबसे पहले
राजसूय।
"करते तुलसीदास भी कैसे मानस-नाद?
महावीर का यदि उन्हें मिलता नहीं प्रसाद।"
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की यह प्रसिद्ध पंक्ति आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के उस ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करती है, जिसके बिना आधुनिक हिंदी साहित्य और उसकी मुख्यधारा की कल्पना भी असंभव थी। जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास ने रामकथा के माध्यम से लोक-संग्रह का नाद किया था, उसी प्रकार आधुनिक युग में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपनी लेखनी और 'सरस्वती' के माध्यम से हिंदी भाषा को पुनर्जीवित किया।
महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म 15 मई 1864 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता पं. रामसहाय द्विवेदी सेना में कार्यरत थे। आर्थिक कठिनाइयों के कारण उनकी स्कूली शिक्षा सुचारू रूप से नहीं चल पाई, जिसके चलते उन्होंने रेलवे में नौकरी (तार बाबू/सिग्नलर) की। किंतु उनके भीतर ज्ञान की ऐसी पिपासा थी कि उन्होंने स्वध्याय के बल पर संस्कृत, अंग्रेजी, बांग्ला, मराठी, गुजराती और फारसी जैसी भाषाओं पर गहरा अधिकार प्राप्त कर लिया। स्वाभिमानी होने के कारण एक अंग्रेजी अधिकारी से विवाद होने पर उन्होंने रेलवे की नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया और आजीवन हिंदी साहित्य की सेवा को ही अपना ध्येय बना लिया। 1931 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें 'आचार्य' तथा हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग ने 'वाचस्पति' की उपाधि से सम्मानित किया। 21 दिसंबर 1938 को यह महान युग-निर्माता परलोक सिधार गए।
द्विवेदी युग से पूर्व खड़ी बोली में कविताएँ लिखी जाने लगी थीं, परंतु भाषा में स्थिरता, एकरूपता और माधुर्य का अभाव था। कवि प्रायः ब्रजभाषा के शब्दों को जबरन खड़ी बोली में मिलाते थे या उर्दू-फारसी के प्रयोगों पर अत्यधिक जोर देते थे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सन् 1903 में 'सरस्वती' पत्रिका के संपादक का पद सँभाला और इसके माध्यम से भाषा के इस ढीलेपन को सख्ती से सुधारा। उनके कड़े संपादन और अनुशासन का ही परिणाम था कि कवियों को भाषा की अशुद्धियों और भद्दे प्रयोगों से मुक्ति मिली। जैसा कि इतिहास गवाह है, द्विवेदी जी के प्रभाव से एक ओर जहाँ भाषा में सफाई आई, वहीं दूसरी ओर उसका स्वरूप कुछ हद तक गद्यवत् और इतिवृत्तात्मक भी हुआ। फिर भी, खड़ी बोली को काव्य के योग्य बनाने में उनका यह अनुशासन एक अनिवार्य ऐतिहासिक कदम था।
सन् 1900 ई. में 'सरस्वती' पत्रिका के प्रकाशन ने हिंदी जगत में क्रांति ला दी। यह केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि आधुनिक हिंदी के निर्माताओं की पाठशाला थी। 'सरस्वती' के माध्यम से ही हिंदीभाषी समाज का परिचय अंग्रेजी और बांग्ला साहित्य की नूतन धाराओं से हुआ। श्री पारसनाथ सिंह द्वारा बांग्ला कविताओं के अनुवाद और वर्ड्सवर्थ जैसी विभूतियों की रचनाओं ने यहाँ के कवियों को प्रगीत मुक्तकों और नई शैलियों की ओर प्रेरित किया। रीतिकाल की श्रृंगारिकता और पारंपरिक नक्शिख वर्णन की परिपाटी को पीछे छोड़ते हुए, 'सरस्वती' ने कवियों को प्रकृति, देशप्रेम, समाज-सुधार और राष्ट्रीय चेतना जैसे व्यापक विषयों पर सृजन करने के लिए प्रेरित किया। आचार्य द्विवेदी की प्रेरणा ने ही राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, मुकुटधर पांडेय और बद्रीनाथ भट्ट जैसे प्रतिष्ठित रचनाकारों को गढ़ा, जिन्होंने आगे चलकर खड़ी बोली को अपनी कविताओं और प्रबंधों से समृद्ध किया।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक जीवन जितना कठोर और अनुशासनबद्ध था, उनका निजी जीवन उतना ही सादगीपूर्ण, संघर्षशील और प्रेरणादायक था। वे केवल एक संपादक नहीं थे, बल्कि नए रचनाकारों के लिए एक सच्चे मार्गदर्शक और अभिभावक थे। उनके जीवन से जुड़े कई संस्मरण यह बताते हैं कि वे किस प्रकार नए लेखकों की उंगली पकड़कर उन्हें तराशते थे। एक बार जब कोई नया लेखक अपनी कच्ची कविता लेकर उनके पास पहुँचता, तो वे उसकी कमियों को बहुत ही स्नेह और स्पष्टवादिता के साथ समझाते थे। उनका मानना था कि संपादक का काम केवल गलतियाँ निकालना नहीं, बल्कि लेखक की छिपी हुई प्रतिभा को निखारना है। अपने निजी जीवन में वे अत्यंत स्वाभिमानी, निडर और व्यवस्था के प्रति सजग व्यक्ति थे। उन्होंने कभी भी चापलूसी या साहित्यिक ओछपन को अपने पास नहीं फटकने दिया, और पूरी निष्ठा के साथ आजीवन हिंदी सेवा में समर्पित रहे।
उनकी अपनी मौलिक और अनूदित रचनाओं में भी यही गाम्भर्य और भाषा के प्रति निष्ठा दिखाई देती है। 'संपत्तिशास्त्र' (1907) जैसी अर्थशास्त्र से जुड़ी गंभीर पुस्तक लिखकर उन्होंने हिंदी में वैज्ञानिक विषयों पर लिखने की शुरुआत की। इसके अलावा 'काव्य-मंजूषा', 'रसज्ञ-रंजन', 'साहित्य-संदर्भ', 'विचार-विमर्श' और 'कालिदास की निरंकुशता' जैसी मौलिक गद्य कृतियों के साथ-साथ 'कुमारसंभवसार', 'मेघदूत' (अनुवाद) और 'विनय विनोद' जैसी अनूदित रचनाओं के माध्यम से उन्होंने साहित्य को समृद्ध किया।
संक्षेप में, महावीर प्रसाद द्विवेदी और 'सरस्वती' पत्रिका ने मिलकर हिंदी साहित्य को एक दिशाहीन अवस्था से निकालकर सुव्यवस्थित, परिमार्जित और राष्ट्रीय चेतना से युक्त मंच प्रदान किया। यदि द्विवेदी जी अपनी निष्ठा, कड़े संपादकीय अनुशासन और दूरदर्शिता से भाषा का संस्कार न करते, तो आज हिंदी कविता का यह भव्य और आधुनिक स्वरूप देखना संभव न होता।
लेखक
आनंद पुरोहित 'मस्ताना'
साहित्य और कला विषय पर चिंतन-परक आलेख लिखने वाले आनंद मस्ताना मोटीवेशनल स्पीकर और शिक्षक भी हैं। राजस्थानी व हिंदी के कवि-लेखक हैं।