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पंचायत राज चुनाव: अब होगा राजस्थान सरकार का दूसरा सेमीफाइनल, तय होगा अगला राज

ग्रामीण क्षेत्र में सरकार के कामकाज पर जनता सुनायेगी फैसला

अब होगा राजस्थान  सरकार का दूसरा सेमीफाइनल, तय होगा अगला राज
राजसूय
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राजसूय।  स्थानीय निकाय चुनाव में सबख़्यात्मक दृष्टि से बड़ी सफलता हासिल करने के बाद अब भाजपा के नेतृत्त्व वाली राज्य सरकार पंचायत राज के चुनाव की तिथियां भी शीघ्र घोषित करने की तैयारी में है। इसे राज्य की सरकार का दूसरा सेमीफाइनल कहा जा रहा है, जो इस बात का आभाष करायेगा कि अगला विधानसभा चुनाव किसके लिए आसान रहने के आसार है। पंचायत राज चुनाव में वैसे तो हमेशा से ही कांग्रेस को बढ़त रही है। इस बार क्या होता है, यह देखने की बात है।

राज्य में स्थानीय सरकार या नगर निकायों के चुनाव की प्रक्रिया तो पूरी हो गयी। 10 में से 9 नगर निगम पर भाजपा ने कब्जा कर लिया। भाजपा की सफलता का स्थानीय निकायों में प्रतिशत 60 से अधिक रहा, जिसे संतोषजनक तो माना ही जा सकता है। हालांकि इसे बेहतर प्रदर्शन नहीं कहा जा सकता। क्योंकि कांग्रेस के अलावा जिस तरह से आप, आरएलपी व निर्दलीयों ने सफलता अर्जित की है, उसे कम नहीं आंकना चाहिए। यह सफलता भाजपा के लिए बड़े व कांग्रेस के लिए छोटे खतरे की घंटी है। भाजपा को स्थानीय निकाय के चुनाव में कांग्रेस से सिर्फ 0.94 फीसदी वोट ही अधिक मिले हैं, जो ज्यादा नहीं है।

इतनी बड़ी संख्या में निर्दलीयों की जीत इस बात को साबित करती है कि भाजपा सरकार के प्रति लोगों में असंतोष है। लोग सरकार से नाराज है। यह अलग बात है कि सरकार के प्रति इतनी बड़ी नाराजगी का फायदा जिस अनुपात में कांग्रेस को उठाना चाहिए था, वो वह उठा नहीं सकी। इसी कारण कांग्रेस के लिए थोड़ी कम खतरे की घन्टी रहे हैं स्थानीय निकायों के चुनाव।

राज्य की भजनलाल सरकार के ढाई साल पूरे होने के बाद स्थानीय निकायों के चुनाव हुए हैं, इस नजरिए से देखा जाए तो यह सरकार के कामकाज को लेकर शहरी मतदाता का जनमत है। जिसे अगले विधानसभा चुनाव का पहला सेमीफाइनल भी कहा जा रहा है। 

दूसरा सेमीफाइनल पंचायत राज चुनाव का होगा। उसके व स्थानीय निकायों के चुनाव पूरे सेमीफाइनल होंगे और वे काफी कुछ विधानसभा चुनाव की संभावित तस्वीर को साफ कर देंगे। पंचायत राज के चुनाव की अब उल्टी गिनती आरम्भ हो चुकी है। इसी सप्ताह में पंचायत राज के चुनाव की तारीखों का ऐलान होने की पूरी संभावना है। हालांकि राजनीतिक दलों ने इन चुनावों के लिए अपनी बिसात अभी से बिछानी आरम्भ कर दी है। गांवों में चौपालों पर भी चुनावी चर्चाएं होने लग गयी है। गांव - ढाणी में अब पूरी तरह से पंचायत  चुनाव का माहौल बन गया है।

पंचायत राज का तंत्र यूं बनेगा
राज्य के पूरे ग्रामीण क्षेत्र में पंचायत राज का मजबूत तंत्र इस चुनाव से बनेगा, जो बहुत ताकतवर व प्रभावी भी होगा। केंद्र व राज्य प्रवर्तित योजनाओं का सीधा लाभ ग्रामीणों तक पहुंचे, इस कारण से सरकारें सरपंच, प्रधान व जिला प्रमुख को जरिया बनाती है। इस वजह से ग्रामीण क्षेत्र में विकास, रोजगार की योजनाएं, पानी का प्रबंध, फसल बीमा आदि के सभी काम इन संस्थाओं के जरिये से ही होते हैं, ये ही मुख्य भूमिका निभाते हैं।
इस तरह से खड़ा होगा पंचायत राज का पूरा तंत्र ::::
जिला प्रमुख --- 41 होंगे
प्रधान -- 457 होंगे
सरपंच --- 14403 सरपंच होंगे
वार्ड पंच -- कुल 1, 30, 589 होंगे
इस तरह से होगी व्यवस्था :: जिला परिषद, पंचायत समिति सदस्यों के चुनाव में ईवीएम का उपयोग होगा। सरपंच और वार्ड पंच के चुनाव मत - पत्र से कराने की तैयारी है। पंचायत चुनावों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण रहेगा। इस तरह से पूरे पंचायती राज का ढांचा खड़ा होगा।

दूसरा सेमीफाइनल फाइनल तय करेगा
पंचायती राज चुनाव ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। ग्रामीण क्षेत्र की राजनीतिक धड़कन का इससे पूरा पता चलता है। यही धड़कन विधानसभा चुनाव की सांस बनती है। पहला सेमीफाइनल स्थानीय निकाय चुनाव था और यह दूसरा सेमीफाइनल पंचायत राज चुनाव है, जिससे राजनीतिक दल, जनता और विश्लेषक इस बात का अंदाजा लगा लेंगे कि विधानसभा चुनाव का रुख क्या रहेगा। 

सरकार के कामकाज पर ग्रामीण जनता सुनायेगी फैसला
पंचायत राज चुनाव में ग्रामीण जनता इस बात का फैसला सुना देगी कि राज्य सरकार कैसा काम कर रही है। सरकार की नीतियों से गांव तक लाभ पहुंचा है या नहीं। बिजली, पानी की पूरी व्यवस्था है या नहीं। राज्य की कानून व्यवस्था पर भी यह चुनाव जनमत होगा। ग्रामीण मतदाता शहरी मतदाता से ज्यादा समझदार होता है। उस पर जाति, धर्म, पंथ का उतना असर नहीं पड़ता, जितना शहर के लोगों पर पड़ता है। इस कारण यह जनमत ज्यादा महत्त्व रखता है।

कांग्रेस यहां ज्यादा मजबूत रही है, वर्चस्व तोड़ने की चुनोती है
पंचायत राज संस्थाओं पर अधिकतर कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा है। सरपंच से जिला प्रमुख तक के पद अधिकतर समय कांग्रेस के पास ही रहे हैं। भाजपा को बहुत न्यून सफलता पंचायती राज चुनावों में मिलती रही है। अनेक जिले तो ऐसे हैं जहां भाजपा का कभी जिला प्रमुख रहा ही नहीं है। राजनीतिक शब्दावली में कहें तो पंचायती राज चुनाव में कांग्रेस की मजबूत किलेबंदी है, जिसे तोड़ना अब भाजपा के लिए टेढ़ी खीर है। इस बार भी भाजपा चार चरण में यह चुनाव करा रही है ताकि शक्ति झोंककर कुछ तो पंचायत राज में हासिल करे। 

भाजपा की स्थानीय निकाय के चुनावों से जो रणनीति सामने आई है, उससे तो यही प्रतीत होता है कि इन चुनावों में भी वह अपनी सरकार की पूरी शक्ति झोंकेंगी। मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप स्थानीय निकाय चुनाव में बेतहाशा लगे थे, कमोबेश वैसी ही स्थिति पंचायत राज चुनाव में बनती अभी से दिख रही है। विधायकों, मंत्रियों, सांसदों व केंद्रीय मंत्रियों की पूरी फ़ौज भाजपा उतारने की तैयारी कर रही है। 

हालांकि इन सब के बाद भी गांवों में कांग्रेस का जो नेटवर्क है, उसे भेदना आसान काम नहीं है। कांग्रेस जातीय समीकरणों के आधार पर बहुत पहले चुनावी तैयारी में लग गयी थी। भाजपा इस मामले में उससे थोड़ा पीछे है। विधानसभा की ग्रामीण सीटों के चुनाव परिणामों का भी यदि गहनता से अध्ययन किया जाए तो यही महसूस होता है कि वहां कांग्रेस बेहतर स्थिति में है। इस कारण कांग्रेस के इस मजबूत किले में सुराख करना भी आसान नहीं है।

कांग्रेस ने अपने मजबूत किले के बचाव के लिए कसरत तो 3 महीनें पहले ही शुरू कर दी थी। विधानसभा चुनाव के समय ग्रामीण पृष्ठभूमि के जिन बड़े नेताओं को अनुशासनात्मक कार्यवाही के तहत पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था, उनको एक एक करके वापस पार्टी में लिया गया है। जो बचे हुए हैं उनको भी वापस लिया जा रहा है। कुछ उन लोगों के भी वापस पार्टी में लौटने की तैयारी है जो भावावेश में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में चले गए थे, मगर वहां उनको कोई तवज्जो नहीं मिली। आने वाले दिनों में ऐसे कई नेता कांग्रेस में शामिल होने की तैयारी हो चुकी है। बाड़मेर, टोंक, दौसा, बांसवाड़ा, नागौर, जयपुर आदि के नेता कांग्रेस में आ सकते हैं।

बाप, आरएलपी भी नुकसान पहुंचाएंगे
इस बार पंचायत चुनाव में भारतीय आदिवासी पार्टी व आरएलपी भी उतरेगी। इन पार्टियों का क्षेत्र विशेष में प्रभाव भी है, जिसका नुकसान समान रूप से भाजपा और कांग्रेस को उठाना पड़ेगा। उन दलों की उपस्थिति सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठायेगी, तो दोनों ही मुख्य दलों को बड़ा नुकसान होगा। बांसवाड़ा, उदयपुर, डूंगरपुर, दौसा, नागौर, जोधपुर, बाड़मेर, पाली, बीकानेर, श्रीगंगानगर आदि में ये दल दोनों दलों को नुकसान पहुंचाएंगे। भाजपा को भी ग्रामीण क्षेत्र में अपनी कमजोरी का अहसास है, इस कारण वो पूरे जोर से यह चुनाव लड़ेगी।

#Rajasthan, bikaner,
मधु आचार्य 'आशावादी'

लेखक

मधु आचार्य 'आशावादी'

राजसूय के संरक्षक

दैनिक भास्कर के कार्यकारी रहे संपादक मधु आचार्य 'आशावादीÓ साहित्य के क्षेत्र में भी जाने-पहचाने नाम हैं। पत्रकारिता की शुरुआत राष्ट्रदूत से की। इन दिनों आरएनई के लिए सेवाएं दे रहे हैं। राजसूय के संरक्षक।

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