BREAKING

कवर स्टोरी

राजनीति: आरएलपी पंचायत चुनाव से फिर मुख्य धारा में आयेगी

जाट बेल्ट में तीसरी शक्ति साबित भी हुए हैं बेनीवाल

आरएलपी पंचायत चुनाव से फिर मुख्य धारा में आयेगी
राजसूय
ad1
ad2
ad3
ad4

तीसरे विकल्प की दिशा में हनुमान बेनीवाल की कदमताल

अनेक जिलों में स्थानीय निकाय के बाद अब पंचायत चुनावों में भी उतरे

राजस्थान देश का एक ऐसा राज्य है जहां सत्ता के लिए मुख्य लड़ाई सदा ही भाजपा व कांग्रेस के बीच ही लड़ी जाती रही है। पहले लगातार कांग्रेस जीतती रही तो बाद में हर पांच साल बाद सरकार बदलने की परंपरा पड़ गयी। पिछले 35 सालों से तो यही सिलसिला चल रहा है। राजस्थानी की कहावत ' उतर गीगला म्हारी बारी ' की तर्ज पर भाजपा व कांग्रेस शासन कर रहे हैं। तीसरे दल अनेक बार आये, कुछ सीटें भी हासिल की मगर सत्ता की लड़ाई में लाख कोशिशों के बाद भी शामिल नहीं हो पाए।

 

राजसूय

राजस्थान में सत्ता की लड़ाई मुख्य रूप से हमेशा ही कांग्रेस व भाजपा के बीच में ही लड़ी जाती रही है। पहले तो लम्बे अरसे तक अन्य राज्यों की तरह राजस्थान में भी कांग्रेस का ही शासन चलता रहा। जनता पार्टी बनने के बाद इस शासन पर विराम लगा। अब 35 साल से राज्य में सरकार एक परंपरा के अनुसार ही चल रही है। एक बार कांग्रेस फिर एक बार भाजपा, यही क्रम चल रहा है।

इसे सांस्कृतिक टर्म में परम्परा कहना भी अनुचित है। क्योंकि परम्परा तो वह होती है जो निरन्तर परिमार्जित होती रहे, अपने को देशकाल व परिस्थिति के अनुसार बदलती रहे। मगर राज्य में सरकार की यह परम्परा नहीं अपितु एक रूढी बन गयी है, जिसे तोड़ना बहुत ही मुश्किल काम है। समाज में भी रूढ़ियाँ इतनी आसानी से कहां टूटती है। तो बहरहाल, राज्य में पांच साल से सरकार बदलने की रूढी चलायमान है।

ऐसा भी नहीं है कि इस रूढी को तोड़ने की कभी कोशिश नहीं हुई। कोशिशें हुई, पूरा दम लगाकर प्रयास किये गए, मगर वो सब बहुत ही कमजोर साबित हुए। एक समय में सोशलिस्ट पार्टी, फिर समाजवादी, फिर पार्टी से बाहर निकलकर किरोड़ीलाल मीणा, देवीसिंह भाटी आदि ने खूब प्रयास किये मगर उनके दल को विकल्प बनने में जरा भी सफलता नहीं मिली। कुछ सीटें जीतकर ही इनको संतोष करना पड़ा। क्योंकि इन सभी को एहसास हो गया कि राज्य की जनता इन दो मुख्य दलों के मध्य ही बंटी हुई है, तीसरे दल की तरफ देखती भी नहीं है। उसे तुरन्त ही नकार देती है। इस वजह से ही राज्य में तीसरा विकल्प कभी खड़ा ही नहीं हो पाया है।

पिछले दो दशक से तीसरा विकल्प बनने की एक कोशिश और हुई है, वह है नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल की तरफ से। उन्होंने भाजपा छोड़ी और आरएलपी बनाई। उसे भी हालांकि अभी तक उल्लेखनीय सफलता सीटों के हिसाब से नहीं मिली है, यह सत्य है। मगर राज्य में उसका एक वोट बैंक है, यह जरूर साबित हुआ है। इससे भी बड़ी बात है, पहले तीसरे विकल्प के रूप में जितने भी दल बने वे एक - दो चुनाव के बाद बिखर के समाप्त हो गए, मगर सीट अपेक्षित न आने के बाद भी आरएलपी बिखर के समाप्त नहीं हुई, इसे सांसद हनुमान बेनीवाल की बड़ी राजनीतिक सफलता माना जाना चाहिए। वे खुद दो बार लगातार नागौर से सांसद चुने गए हैं। एक बार भाजपा से गठबंधन करके तो दूसरी बार कांग्रेस से गठबंधन करके। इससे यह तो साबित ही है कि बेनीवाल दोनो मुख्य दलों की बड़ी मजबूरी भी है।

 

तीसरे मोर्चे की दिशा में बेनीवाल की कदमताल

आरएलपी के जरिये हनुमान बेनीवाल पूरे राज्य में घूम रहे हैं। आंदोलनों में भाग ले रहे हैं और सब जगह पहुंच रहे हैं। वे बांसवाड़ा पहुंचते हैं तो पश्चिमी सीमा से सटे बाड़मेर भी जाते हैं। टोंक, दौसा, कोटा, बारां में भी उनकी सक्रियता रहती है। श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ के किसानों की लड़ाई लड़ते हैं तो भरतपुर पहुंच के वहां के जाटों की भी लड़ाई में कूद पड़ते हैं।

छात्र , मजदूर, किसान, बेरोजगार आदि वर्गों की लड़ाई में अगुवाई सदा बेनीवाल की ही नजर आती है और वे संघर्ष करते हुए दिखते भी है।

बेनीवाल की कोशिश है कि पूर्वी राजस्थान में एक शक्ति के रूप में उभरी भारतीय आदिवासी पार्टी ' बाप ' से उनका समझौता हो और मोर्चा बनाने में बाप उनका सहयोग करे। बेनीवाल ने पहले से ही भीम आर्मी के चंद्रशेखर से समझौता किया हुआ है। उन्होंने एसटी वर्ग के तेज तर्रार नेता नरेश मीणा को भी साथ ले रखा है। इन दिनों उनकी नजदीकियां ओवैसी से बढ़ी है और दोनों ने अगले विधानसभा चुनाव को मिलकर लड़ने की बात भी सार्वजनिक रूप से कही है।

कुल मिलाकर आरएलपी सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल राज्य में तीसरा मोर्चा खड़ा करने के लिए पूरी ताकत से कदमताल कर रहे हैं।  वे अपने साथ बाप, नरेश मीणा, भीम आर्मी, ओवैसी को लेकर भाजपा - कांग्रेस को अगले विधानसभा चुनाव में टक्कर देने की कोशिश कर रहे हैं।

पंचायत चुनाव में भी लगा रहे हैं पूरा दमखम

स्थानीय निकाय चुनाव में भागीदारी इस बार राज्य में अनेक जगहों पर हनुमान बेनीवाल ने की। उल्लेखनीय सफलता भले ही न मिली हो, मगर उपस्थिति तो दर्ज पुख्तगी से हुई। उसी से उत्साहित होकर अब आरएलपी पूरी ताकत के साथ राज्य के पंचायत चुनाव में भी उतरी है। यह आरएलपी की  विधानसभा चुनाव की ही एक तरह से तैयारी है, उसी के लिए बेनीवाल लामबंदी कर रहे हैं।

इस बार आरएलपी ने नागौर के अलावा बीकानेर, जोधपुर, पाली, बाड़मेर, चूरू, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, सीकर, जयपुर, दौसा, अलवर, अजमेर, कोटा आदि में भी पंचायत चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे है। चुनावों में भागीदारी करते करते बेनीवाल पार्टी का सांगठनिक ढांचा भी खड़ा कर रहे हैं ताकि विधानसभा चुनाव में वह काम आये।

जाट बेल्ट में दिखाया है दमखम

हनुमान बेनीवाल की आरएलपी ने पूरे जाट बेल्ट में अपना दमखम दिखाया है। उसी दमखम के आधार पर पंचायत राज चुनाव में जाट बेल्ट जहां जहां है, वहां अपने उम्मीदवार उतारे है। जाट समाज इस समय बड़ी संख्या में कांग्रेस से जुड़ा है, यह उसने साबित भी किया है। भाजपा से नाराज है, यह भी प्रमाणित हुआ है। इस बेल्ट में बेनीवाल बड़ी ताकत है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। युवा जाट बड़ी संख्या में आरएलपी से जुड़ा है, यह दिख रहा है। पंचायत राज के चुनाव परिणाम से बेनीवाल को आंकलन हो जायेगा कि कहां उम्मीदवार उतारे जा सकते हैं और कहां कमजोर है, उस जगह तैयारी की योजना बनाएंगे। नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल आजकल अपनी सभाओं में एक बात भी कहते हैं कि अगले चुनाव मेरे संघर्ष के अंतिम चुनाव है, यदि उसमें सफलता नहीं मिली तो चुप होकर बैठ जाऊंगा। इस बात से उनसे जुड़ने वाले युवाओं की संख्या बढ़ी है। आरएलपी पंचायत राज चुनावों में शक्ति इस कारण से लगा रही है कि वह मुख्य धारा में आकर तीसरा विकल्प बने।

   

 

 

 

 

मधु आचार्य 'आशावादी'

लेखक

मधु आचार्य 'आशावादी'

राजसूय के संरक्षक

दैनिक भास्कर के कार्यकारी रहे संपादक मधु आचार्य 'आशावादीÓ साहित्य के क्षेत्र में भी जाने-पहचाने नाम हैं। पत्रकारिता की शुरुआत राष्ट्रदूत से की। इन दिनों आरएनई के लिए सेवाएं दे रहे हैं। राजसूय के संरक्षक।

4 प्रकाशित खबरें सभी देखें →