फिल्म इल्म
अलविदा: आम आदमी जैसा लगने वाला फिल्म कलाकार
निधन के एक सप्ताह बाद भी सुर्खियों में हैं नाना पाटेकर
खबर सबसे पहले
राजसूय। वो शख्स जीवनपर्यंत ग्लैमर इंडस्ट्री से जुड़ा होने के बावजूद फिल्मी चकाचौंध से सदा खुद को अलग रख कर एक नई लकीर गढऩे में लगा रहा, क्योंकि भीतर से तो वो सबसे पहले एक चित्रकार था। बतौर चरित्र अभिनेता वो आम आदमी से लगने वाला फिल्मी कलाकार सबसे ज्यादा फीस बतौर कैरेक्टर आर्टिस्ट लेता था, लेकिन सार्वजनिक रूप से गले में गमछा और खादी के कुर्ते- पायजामे में नजर आता था। उसका इस जग को अलविदा कहने के एक हफ्ते बाद भी मीडिया में उसके फिल्मी किरदारों से ज्यादा वो निजी जीवन में किरदार कैसा था, उस पर लिखा और बताया जा रहा है, बात हो रही है कीर्तिशेष अभिनेता- निर्माता- निर्देशक और सच्चे समाजसेवी नाना पाटेकर की। फिल्म- इल्म के इस आलेख में नाना पाटेकर के कुछ किस्सों और युवान पीढ़ी के लिए नाना पाटेकर अपने कृतित्व से क्या सीख दे गए है, उस पर चर्चा करना स्व. विश्वनाथ पाटेकर (नाना पाटेकर का रियल नाम)की स्मृति में करना लाजिमी होगा। मुंबई के जे. जे स्कूल ऑफ आर्ट्स से पढ़े नाना अंतस से तो पेंटर ही थे, तभी तो हर फिल्मी किरदार को नाना अपने अभिनय से कैनवास पर उकेरे रंगों की तरह अलग नजरिया प्रस्तुत कर दर्शकों को अपनी कला से मंत्रमुग्ध कर देते थे। नाना को थिएटर से लगाव था, उनकी प्राथमिकता आर्ट हाउस सिनेमा ही रही और कॉमर्शियल मसाला फिल्मों से जितना हो सके दूरी बना कर रखते थे। नाना पाटेकर को आज का युवा वर्ग अनीश बज्मी निर्देशित सुपरहिट फिल्म 'वेलकमÓ में उनके गैंगस्टर किरदार 'उदय शेट्टीÓ के लिए बहुत पसंद और याद करता है। सोशल मीडिया पर कॉमेडी 'मीम्सÓ बनाने के लिए नाना पाटेकर के उदय शेट्टी किरदार को बहुतायत में प्रयोग किया जाता है। जब अनीश बज्मी नाना पाटेकर के पास उदय शेट्टी का किरदार सुनाने गए थे, तो नाना ने उदय शेट्टी की भूमिका के लिए सीधा ना कह दिया था और जब अनीश बज्मी ने कहा कि यह किरदार आपके व्यक्तित्व और अभिनय कला को ध्यान में रख कर ही लिखा गया है। नाना फिर भी राजी नही हुए और अनीश नाना की हामी लिए बिना जाने को तैयार नहीं थे। नाना ने आखिरकार अनीश से कहा कि 'तूं अपनी माँ की सौगन्ध खाकर बोल कि क्या मुझे यह रोल करना चाहिएÓ? अनीश ने कहा कि हाँ सर माँ कसम ये किरदार आपके लिए ही बना है, तब जाकर नाना ने वेलकम फिल्म साइन की थी। नाना पाटेकर वाकई में बेहद मूडी थे और उनके तथाकथित क्रोधी नेचर के कारण कहानी की डिमांड के बावजूद बिग फिल्म निर्देशक नाना को अप्रोच करने से डरते थे। नाना पाटेकर को जो भी फिल्म बढिय़ा और लीक से हट कर लगती,उस फिल्म की सार्वजनिक रूप से तारीफ भी करते और फिल्म की स्टार- कास्ट और निर्माता- निर्देशक को अपनी ओर से दूरभाष संवाद कर वाहवाही भी करते। नाना पाटेकर को नीरज पांडे निर्देशित फिल्म 'अ वेडनसडेÓ बेहद पसन्द आई थी और फिर नाना को फिल्मी गलियारों से यह भी खबर मिली कि नीरज पांडे तो असल में नाना को ही 'अ वेडनसडेÓ में नसीरुद्दीन शाह वाले किरदार के लिए लेना चाहते थे, लेकिन नाना के शॉर्ट टेमरर्ड व्यवहार के किस्सों को सुन के नीरज पांडे ने नाना पाटेकर को न लेना ही बेहतर समझा। नाना ने फिर नीरज पांडे से व्यक्तिगत मिल कर कहा कि यार ऐसा न करा कर हाँ थोड़ा गुस्से वाला आदमी हूँ, पर मैं पागल नहीं हूँ। नाना पाटेकर का जिक्र निकला है तो नाना के 'नाम फाउंडेशनÓ को भूला नही जा सकता है। नाना ने साल 2015 में नाम फाउंडेशन नामक एनजीओ मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर शुरू किया था। नाना ने करोड़ो रूपए की लग्जरी गाड़ी लेने का मोह त्याग कर महाराष्ट्र के आत्मह्त्या कर चुके किसान परिवारों की मदद उस धन राशि से की थी। नाम फाउंडेशन अब तक 5000 से ज्यादा विधवा महिलाओं और पचास हजार से ज्यादा आपदा पीडि़त परिवारों की मदद कर चुका है। नाना की लेगेसी और उनका नाम फाउंडेशन उनके पुत्र मल्हार के हाथों में है, उम्मीद है मल्हार नाना के नेक काज को नाना जितनी ही ईमानदारी के साथ निकट भविष्य में करता रहेगा।
लेखक
मनोज रतन व्यास
फिल्मों के इतिहास और फिल्मी दुनिया की संस्कृति से वाकिफ पत्रकार मनोजरतन व्यास 'फिल्म इल्मÓ कॉलम लिखते हैं।