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राजसूय
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राजसूय,
विपक्ष को उनकी असलियत बताने तो नहीं गये हैं राहुल हनोई
राहुल गांधी एक बार फिर विदेश चले गए हैं। राहुल गांधी विदेश इस तरह निकल लेते हैं, जैसे खेत का रास्ता हो। और जाते भी कहीं के कहीं। ऐसा नहीं है कि किसी एक ही जगह जाते हों। जैसे इटली जाते तो माना जा सकता कि ननिहाल की याद आ गई, लेकिन इस बार तो वियतनाम के हनोई।
कोई क्या ही कर ले। किसी समझाए कि भाई तुम इस देश के बहुत ही कीमती नेता हो। इसलिए तु हें जेड श्रेणी की सुरक्षा दी गई है। लेकिन सुरक्षा के घेरों को तोडऩा तो जैसे राहुल गांधी की फितरह है। पिछले दिनों मु य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग पर होने वाले पैदल मार्च में किसी तरह से डी.शिवकुमार को पीछे धकेलते हुए आगे निकल लिए, सभी ने देखा।
राजीव गांधी भी सुरक्षा घेरे की एक नहीं सुनते थे।
लेकिन बात विदेश जाने की है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के विदेश निकल जाने की, कायदे से इस तरह की जानकारियां संबंधित अधिकारियों को होनी ही चाहिए, लेकिन अगर यह मान लें तो फिर राहुल गांधी, राहुल गांधी कहां? स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक के नाते राहुल गांधी अगर कहीं जा सकते हैं तो बतौर नेता प्रतिपक्ष भी निजी यात्रा पर जा सकते हैं, यही तर्क शायद भाजपा के गले नहीं उतर रहा है।
भाजपा हमलावर है। काउंटर करने के लिए कांग्रेस भी तैयार है, लेकिन सवाल यह है कि राहुल गांधी के बगैर ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए शुरू किए गए अभियान का क्या होगा। विपक्ष में तो सून है। कॉकरोच पहले से ही कस्टडी में है। विपक्ष के नेताओं में से किसी में यह ताकत नहीं है कि राहुल की जगह ले सके।
क्या राहुल गांधी यह समझाना चाहते हैं कि विपक्ष में कोई नेता नहीं बचा है? शायद यही सही है, राहुल गांधी जिस तरह से नरेंद्र मोदी सरकार की नाक में दम किए हुए है, कोई दूसरा नहीं कर सकता।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पशोपेश में, सपा को नुकसान की आशंका
उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रियंका गांधी का दखल बढ़ता जा रहा है। सीटों के विभाजन के मसले पर अखिलेश के साथ राहुल की पटरी नहीं बैठ पाने के कारण अब प्रियंका गांधी ने सीधे इस विषय पर बात करनी शुरू कर दी है, इससे पहले राहुल गांधी इस विषय पर बात कर रहे थे, लेकिन राहुल गांधी की डिमांड इतनी ज्यादा थी कि ऐसा लग रहा था कि उत्तर प्रदेश से इंडिया ब्लॉक कहीं समाजवादी पार्टी से अलग नहीं हो जाए। हालांकि, ऐसी संभावना अभी भी बनी हुई है, क्योंकि कांग्रेस के पास सिर्फ दावा ही है कि उसका जनाधार उत्तर प्रदेश में बढ़ा है। हकीकत यह है कि पिछली बार उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज करवाने वाली कांग्रेस इस बार 125 सीटों पर दावा कर रही है, इस संबंध में जल्द ही एक सूची भी इंडिया ब्लॉक के पटल पर रख दी जाएगी, जिसमें अमेठी, रायबरेली और सहारनपुर की सीटें भी हैं, जिस पर अभी समाजवादी पार्टी का कब्जा है। समाजवादी पार्टी एक अलिखित समझौते के तहत गांधी परिवार से प्रत्याशी के सामने लोकसभा में चुनाव प्रत्याशी नहीं उतारे, लेकिन विधानसभा का तो गणित ही अलग है। कांग्रेस की रणनीति है कि 125 सीटों पर दावा करेंगे तो सौ सीटें तो मिलेंगी , लेकिन अगर यह समझौता हुआ तो समाजवादी पार्टी को बड़ा नुकसान होगा, क्योंकि  सपा जिसका टिकट काटेगी वह प्रत्याशी बागी भी हो सकता है और कांग्रेस का प्रत्याशी मजबूत नहीं निकला तो भाजपा को फायदा भी हो सकता है। समय रहते यह बात राहुल और प्रियंका को समझ आ जाए तो भी नुकसान कांग्रेस को ही है, क्योंकि फिर कांग्रेस साबित भी नहीं कर पाएगी। इस ऊहापोह के चलते कांग्रेस चाहती है कि एक बार फिर आजमाइश में उतरा जाए। 

ज्ञानेश को भूले विपक्ष को अब चाहिए सर्वदलीय बैठक
पहले कॉकरोच जनता पार्टी के जोरदार प्रदर्शन और फिर इंडिया ब्लॉक के नेताओं के सुप्रीम कोर्ट तक मार्च के बाद भी भाजपा के दो बड़े चेहरे यानी नरेंद्र मोदी और अमित शाह का खुलकर नहीं बोलना, रहस्य बढ़ा रहा है। इससे पहले ाी विपक्ष के शोरशराबे पर अमित शाह ने संसद में जवाब नहीं दिया था बल्कि अचानक से संसद की कार्यवाही ही स्थगित कर दी, जिसे अब कब शुरू किया जाएगा, कोई नहीं जानता।
सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक हो रहे सारे हल्ले पर धारदार बयान नहीं आने बल्कि इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पूरे दौर को शांति से निकाल देने से जहां एक वर्ग है, जिसे ऐसा लगता है कि सरकार पूरी तरह से बैक-फुट पर है और खासतौर से कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन और फिर देशभर में प्रभाव भारी पडऩे वाला है तो दूसरी ओर कुछ लोगों को अभी भी आस है कि अचानक से आंधी-तूफान की तरह कुछ होगा और सारा विरोध खत्म हो जाएगा, दूसरी तरह का सोच रखने वाले भाजपा और मोदी-शाह के प्रशंसक हो सकते हैं, लेकिन सरकार के किसी संभावित कदम को लेकर विपक्ष भी 'वेट-एंड-वॉच' की स्थिति में आ चुका है। परिसीमन, महिला आरक्षण और समान नागरिक संहिता जैसे विषयों पर सरकार कुछ भी कर सकती है, ऐसी आशंका विपक्ष भी लगातार जता रहा है।  ऐसे में विपक्ष मु य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को भूलकर अब सर्वदलीय बैठक बुलाए जाने की मांग कर रहा है ताकि सरकार को सीधे घेरने का अवसर मिल सके। सरकार है कि इस मुद्दे पर भी कुछ नहीं कह रही है।

क्रॉस वोटिंग करने वालों को सभी जानते हैं, लेकिन...
सामने खड़े पंचायत चुनाव को देखते हुए कांग्रेस ने भितरघात करने वालों पर कार्रवाई करने का मन बदल लिया था। कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्त्व का सोच था कि आगे वाले चुनाव पर ध्यान दिया जाए, लेकिन तेजी से बढ़ती शिकायतों ने आखिरकार कमेटी को सक्रिय कर दिया है। इस बीच बीकानेर आए अशोक गहलोत को भी अल्पसं यक समाज के एक प्रतिनिधि मंडल ने मिलकर उपमहापौर चुनाव में हुए उलटफेर से अवगत करवाया है। कांग्रेस के पास बहुमत होते हुए भी उपमहापौर का हार जाना अशोक गहलोत को भी अखरा है। हालांकि, इस तरह के हालात पाली, जालौर, भरतपुर, भीलवाड़ा में भी सामने आए, लेकिन बीकानेर में स्थितियां अलग थीं।
बहरहाल, मिली शिकायतों ने कांग्रेस पार्टी के सामने ऐसा दबाव बनाया कि तय किया गया कि चाहे कुछ भी कमेटी अपनी समीक्षा रिपोर्ट तो बनाए ही। इसके बाद दोषी लोगों पर क्या कार्रवाई करनी है, तय करेंगे। सीपी जोशी के नेतृत्त्व वाली इस कमेटी ने लगभग सभी पक्षों को सुन लिया है। अब रिपोर्ट प्रस्तुत करनी बाकी है।
देखना यह है कि कार्रवाई क्या होती है। बीकानेर वालों ने प्रदेश नेतृत्त्व पर दबाव बनाया हुआ है कि महापौर जीतने वाली कांग्रेस उपमहापौर के चुनाव में क्यों हार गई। अब तो उन पार्षदों के नाम भी बताने का दावा होने लगा है, जिन्होंने क्रॉस वोटिंग की थी, लेकिन जब तक रिपोर्ट सामने नहीं आती, कार्रवाई का सवाल ही बेमानी है।

हरीश बी शर्मा

लेखक

हरीश बी शर्मा

पत्रकारिता का लंबा अनुभव। दैनिक भास्कर सहित लोकमत, निर्भय कलम, लॉयन एक्सप्रेस आदि अखबारों में बतौर पत्रकार कार्य किया। राजसूय के सलाहकार संपादक। राजसूय के संस्थापकों में से एक।

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