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कला,CSR और दस्तकार का 'ट्रिपल-हेलिक्स' मॉडल

कला,CSR और दस्तकार का 'ट्रिपल-हेलिक्स' मॉडल
राजसूय
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राजसूय। राजस्थान में कृषि के बाद आजीविका और रोजगार देने वाला दूसरा सबसे बड़ा आधार हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्र है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण और अर्ध-शहरी आबादी, विशेषकर महिला शक्ति और पारंपरिक कारीगर समुदायों को कम पूंजी में व्यापक रोजगार प्रदान करता है। यह न केवल राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को सहेज रहा है, बल्कि अर्थव्यवस्था का भी एक अहम हिस्सा है।

 

सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक पहचान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई शक्ति देता है हमारा हस्तशिल्प व हथकरघा क्षेत्र। कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची VII के तहत कॉरपोरेट संसाधनों, कला-विशेषज्ञों व दस्तकारों का हो ट्रिपल-हेलिक्स मॉडल के ज़रिए समन्वय।

 

पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती इस विरसे को सँभालने का जिम्मा मुख्यतः सरकारों और कला अकादमियों पर रहा है, लेकिन वर्तमान में कॉरपोरेट जगत की सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) की भूमिका खासी महत्वपूर्ण हो गई है। कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची VII के तहत कला, संस्कृति और राष्ट्रीय विरासत का संरक्षण एक स्वीकृत CSR गतिविधि है, जिसमें हस्तशिल्प और हथकरघा का विकास भी शामिल है। इसके बावजूद कुल CSR बजट का केवल 2% से 5% हिस्सा ही कला-संस्कृति पर खर्च होता है, और उसमें भी दस्तकारी हेतु प्रत्यक्ष हिस्सा 0.5% से कम रह जाता है। उद्योगों को यह समझना होगा कि इस क्षेत्र में निवेश केवल दान नहीं है, बल्कि देश की सॉफ्ट पावर, ग्रामीण आजीविका और सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने का एक आवश्यक माध्यम है। इस दिशा में भारत के कुछ बड़े समूह सराहनीय काम कर रहे हैं। रिलायंस फाउंडेशन और नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर (NMACC) ने अपनी ‘स्वदेश’ पहल से कांजीवरम, पैठणी, पिछवाई और ब्लॉक प्रिंटिंग जैसे कला रूपों को वैश्विक मंच दिया है। किरण नादार म्यूजियम ऑफ आर्ट (KNMA) कला प्रदर्शनियों, दस्तावेजीकरण और सार्वजनिक कला शिक्षा में नए आयाम रच रहा है। इसके अलावा पीरामल आर्ट फाउंडेशन हस्तशिल्प व कला प्रबंधन के शोध पर सक्रिय है, अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन ने गोंड, वारली और मधुबनी कला के कारीगरों को अपने कैंपस म्यूरल प्रोजेक्ट से जोड़ा है, तथा टाटा ट्रस्ट्स अपनी ‘अंतरण’ पहल के तहत पारंपरिक हथकरघा और हस्तशिल्प के पुनरुद्धार के लिए ज़मीनी स्तर पर प्रयासरत है। हालाँकि, कॉरपोरेट CSR पहलों में प्रायः नीति-निर्माण और ज़मीनी क्रियान्वयन के बीच एक बड़ा डिस्कनेक्ट देखा जाता है। केवल बजट आवंटित करने या ब्रांडिंग तक सीमित रहने से बात नहीं बनेगी; जब तक नीति-निर्माण में प्रामाणिक ज़मीनी विशेषज्ञों की सांस्कृतिक समझ शामिल नहीं होगी, तब तक धरातल पर स्थायी बदलाव लाना कठिन होगा। राजस्थान के इस क्षेत्र को सहेजने के लिए कॉरपोरेट संसाधनों, कला-विशेषज्ञों और दस्तकारों को मिलाकर 'ट्रिपल-हेलिक्स’ मॉडल अपनाना होगा। इसके तहत बिचौलियों को हटाकर CSR का सीधा लाभ कारीगरों तक पहुँचाया जाए तथा ‘स्वदेश’ जैसी पहलों के माध्यम से उन्हें ई-कॉमर्स, आधुनिक डिज़ाइन और वैश्विक बाज़ार से जोड़ा जाए। साथ ही, युवा पीढ़ी को प्रशिक्षण और सम्मानजनक आजीविका देकर अपने पुश्तैनी हुनर को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना होगा। संसाधनों और ज़मीनी समझ का यह संगम हमारी इस परंपरा को जीवित रखेगा तथा दस्तकारों को अधिक आत्मनिर्भर बनाकर व्यापक वैश्विक पहचान दिलाएगा।

 

 

अब्दुल लतीफ उस्ता

लेखक

अब्दुल लतीफ उस्ता

कला-समीक्षक व विषयों का अन्वेषण करने वाले अब्दुल लतीफ उस्ता लोक कला और संगीत के जानकार भी हैं। राजसूय के लिए कलांगन कॉलम लिख रहे हैं।

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