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राजसूय। बीकानेर से लगभग तीस किमोमीटर दूर विश्वप्रसिद्ध करणी माताजी मंदिर में दर्शन करके मैं ओरण ( गोचर भूमि) की परिक्रमा कर रहा था। वहां कई लोग श्रद्धाभाव से आसपास फैले-बिखरे ईंटों और पत्थरों के टुकड़ों, कंकड़ आदि से 'घर' बनाने में तल्लीन थे। सदियों से श्रद्धालुओं का विश्वास है कि ओरण में घर बनाने पर मां करणी की कृपा से बेघरों के घर बन जाते हैं। वहां आठ-नौ बरस के बच्चों को घर बनाते देख मेरे पैर थम गए। उनका उत्साह, उल्लास और उमंग मुझे रोमांचित करने लगा। एक बच्चे ने दो घर बनाए। एक छोटा और दूसरा बड़ा। दूसरे बच्चे ने दो मंजिला बड़ा घर बनाया। दोनों के चेहरे गर्व से दमक रहे थे। दो घर बनाने वाला बच्चा अपने मित्र का एक घर देख अचंभा करता है - ये क्या? एक ही घर बनाया है? फिर तुम्हारे मम्मी-पापा, दादा-दादी कहां रहेंगे? देख, मैंने दो घर बनाए हैं। बड़े वाला मेरे लिए और छोटे वाला उनके लिए।
अपने मित्र के दोनों घरों को दूसरे बच्चे ने मुंह बिचकाकर देखा और बोला - अलग क्यों बनाऊं, बता? तुम्हें उनसे अलग रहने में मजा आता होगा। मुझे सबके साथ रहने में मजा आता है। हम सब साथ-साथ रहेंगे एक ही घर में, समझे।
अपने मित्र की बात उस बच्चे के समझ आई कि नहीं, मालूम नहीं किंतु उस बच्चे की निश्छल, निष्पाप, निस्वार्थ और सबके साथ रहने की बात से मुझे अनमोल सबक मिल गया। उस बच्चे पर आंखों से स्नेहाशीष की वर्षा करके आगे की परिक्रमा करते हुए मैं जैसे उसी बात की परिक्रमा कर रहा था।
बालपन में ही 'अहम ' और 'मैं ' का द्वंद्व शुरू हो जाता है। एक बच्चे के लिए महत्त्वपूर्ण 'हम ' है। वह अपने मम्मी-पापा, दादा-दादी, भाई-बहनों के साथ रहने में आनंद और प्रसन्नता अनुभव करता है और उसके सपनों का घर भी उसके मन की तरह विशाल और भव्य है जिसमें वह सबके साथ हंसी-खुशी रहने का सुखद सपना संजोए है। इसलिए उसने एक ही घर बनाया है। जबकि दूसरे बच्चे के लिए महत्त्वपूर्ण हैं उसका अहम यानी 'मैं।' अपने सपनों के घर में वह अकेला रहना पसंद करता है, ऐसा घर जिस पर उसका एकाधिपत्य हो, जहां वह निर्द्वंद्व भाव से अपने मन की करने के लिए स्वतंत्र हो, कोई रोक-टोक न हो। भविष्य का जो सपना उसके मन में उछलकूद मचाए है उसमें भी उसका अहम बहुत हावी है। अपने मम्मी -पापा, दादा-दादी के लिए वह छोटा-सा साधारण और स्वयं के लिए विशाल-आलीशान घर के सपने देख रहा है।
इन दो बच्चों की तरह ही हम सबमें कमोबेश यह प्रवृति उपस्थित मिलेगी। 'अहम ' को अहमियत देते हुए स्वयं को सर्वोपरि मानने वाले भी हमारे बीच हैं और 'हम' को अहमियत देते हुए सबके प्रति समभाव रखने वाले भी हैं। अहम भाव की मनोवृत्ति मनुष्य को एकाकी बनाती है क्योंकि वह अन्य के प्रति उपेक्षा भाव रखता है। उन्हें अपने समक्ष मानने से उसका दंभ जख्मी होने लगता है। वह अन्य को हेय और स्वयं को श्रेष्ठ मानने के भ्रम में जीता है। ऐसी मानसिकता के व्यक्तियों पर राजस्थानी में एक कहावत है - म्हनैं घड़गी जिकी बाड़ में बड़गी। मतलब कि विधाता ने उसे ' एक्सक्लूसिव ' गढ़ा है, उसके बाद उसने ऐसी विलक्षण विभूति गढ़नी बंद ही कर दी। वे यह मानने को ही तैयार नहीं होते कि उनसे सुयोग्य व्यक्ति भी इसी धरा पर मौजूद हैं। आत्ममुग्धता के व्यामोह में उलझे हुए ऐसे व्यक्ति अपने से ज्यादा प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व को ' रोगी ' कहने में भी संकोच नहीं करते। एक राजस्थानी कहावत इनकी मानसिकता पर तीक्ष्ण कटाक्ष करती है - म्हासूं गोरो बीं नै रोग पील़ियै रो। वे इस भ्रम में इतराते रहते हैं कि दुनिया में मात्र वे ही गौरवर्ण यानी गुणवान हैं, दूसरा कोई दिखता भी है तो वह वास्तव में गौरवर्ण नहीं वरन पीलिए का रोगी है।
अहम की मनोवृत्ति व्यक्ति को अहंकारी, असहिष्णु, अभिमानी, आत्ममुग्ध और दम्भी बनाती है। इस प्रवृत्ति का व्यक्ति यदि घर का मुखिया है या किसी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, व्यावसायिक आदि समूह या संस्थान का प्रमुख है तो वह स्वयं के निर्णय को ही सर्वोपरि मानते हुए अन्य सभी से अपेक्षा रखेगा कि वे बिना तर्क-वितर्क के उसे स्वीकार करें। अन्य से राय-मशवरा करना या अन्य की सलाह या सुझाव को स्वीकारना उसके अहम को स्वीकार नहीं होता। अपने स्तर पर निर्णय लेकर अन्य पर थोपने से उसके अहम को संतुष्टि और गर्व की अनुभूति होती है। वह न उम्र का लिहाज करता है, न किसी पद या प्रतिष्ठा का। अन्य को कमतर और स्वयं को बेहतर बताने में ही उसकी ऊर्जा का अपव्यय होता रहता है। ऐसी मानसिकता के व्यक्ति अनुदार, अव्यावहारिक और आत्ममुग्ध होते हैं। अहम में उलझा व्यक्ति अन्य से सहज, शालीन और शिष्ट व्यवहार करने में अपनी हेठी समझता है। उसका यह दंभी व्यवहार उसे अपने परिजनों, मित्रों, शुभचिंतकों से दूर करता चल जाता है बावजूद इसके वह भ्रम पाले रहता है कि उसके प्रभावी व्यक्तित्व के ताप को सहन न कर पाने से वे उसके नजदीक आने से घबराते हैं। अहम में अपनों को पराया मानने वाला ऐसे व्यक्ति को शनै:शनै: अकेलेपन का शिकार होना पड़ता है।
अहम में से 'अ' अक्षर हटाने मात्र से अहम का अंत हो जाता है और हम 'हम' बन जाते हैं। हम यानी सबकी निजता का आदर और सम्मान करना, समूह भाव से रहना। खुशी हो या गम, मिलकर उन्हें साझा करना। हरेक के प्रति समभाव रखना। सहयोग के लिए तत्पर रहना। हरेक की भावनाओं का सम्मान करना और उनकी राय और सुझाव पर सकारात्मकभाव से सामूहिक विचार-विमर्श कर काम करना। हम की भावना रखने वाले व्यक्तियों को समूह के साथ रहने और सामूहिक निर्णय से आनंद की अनुभूति होती है। उनकी दृष्टि सकारात्मक रहती है। वे किसी की कमियों पर नुक्ताचीनी करने की जगह उसकी उपलब्धियों - खासियतों की प्रशंसा कर उसे अपनी कमियां दूर करने के लिए प्रेरित करते हैं। जंगल में जगह-जगह बिखरी लकड़ियों की अहमियत तब ज्यादा बढ़ जाती है जब उन्हें इकट्ठा कर गट्ठर बनाया जाता है। अहम से मुक्त होकर ही हम गट्ठर की भांति संगठित हो पाते हैं और सामूहिकता में अपनत्व और आत्मीयता का अनुभव होता है। आपस में सुख-दुख साझा करते हैं और समस्याओं का निस्तारण सुगमता से कर पाते हैं।
हम प्रवृति के व्यक्ति स्वाभिमानी होते हैं, किंतु अभिमानी नहीं। अपने स्वाभिमान के साथ ही वे दूसरों के स्वाभिमान का सम्मान करते हुए उनके प्रति सहज, सौम्य और शालीन व्यवहार करते हैं। किंतु अहम में उलझा व्यक्ति अभिमानी होता है, स्वाभिमानी नहीं। अभिमानी व्यक्ति को दूसरे के स्वाभिमान पर चोट करके अमानुषी तुष्टि मिलती है। ऐसा व्यक्ति स्वयं की रीढ़ की हड्डी तनी रखना चाहता है किंतु दूसरों की रीढ़ को रबर की मानते हुए इस दंभ से रहता है कि अन्य सब उसके सामने नब्बे डिग्री का कोण बनाए झुके रहें। जबकि हम वृत्ति का व्यक्ति सबकी रीढ़ की हड्डी तनी हुई देख कर प्रसन्न होता है। अहम और अभिमान से मुक्त होकर हम वसुधैव कुटुंबकम् के भावों से ओतप्रोत सभी धर्म, मजहब, सम्प्रदायों का सम्मान करते हुए आपस में भाईचारा, प्रेमभाव, सौहार्द, सद्भाव से सबके स्वाभिमान की रक्षा करते हुए स्वाभिमान के साथ रहें, हम वृत्ति के व्यक्ति इस पर अमल करने की पूरी कोशिश करते हुए यह कामना करते रहते हैं कि हम भाव का विस्तार हो और सभी स्वाभिमान से जिएं और सबको स्वाभिमान से जीने दें।
लेखक
बुलाकी शर्मा
साहित्यिक सरोकारों से जुड़े विषय व आयोजनों पर नियमित रूप से लिखने वाले बुलाकी शर्मा बीकानेर के वरिष्ठ साहित्यकार हैं।