विचार
चुनौती: जलते यूरोप से हम भारतीयों को सबक लेने की जरूरत
यूरोप जैसी चुनौतियां भारत मे भी मौजूद
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राजसूय,
एक ओर यूरोप के कुछ देशों में हिंसा, आगजनी, लूटपाट और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियां चर्चा में हैं, तो दूसरी ओर भारत में नवरात्रि और दशहरे के बाद दीपावली की तैयारियों से बाजार गुलजार हैं। दुकानें सज चुकी हैं और खरीदारी का मौसम शुरू हो गया है। यहां सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बावजूद शांति है क्योंकि हम भारतीयो के डीएनए में विविधता में एकता है। हमारे यहां सारे त्यौहार आर्थिक गतिविधियों से भी जुड़े हुए हैं इसलिए सब एक के लिए और एक सबके लिए वाली परंपरा यहां बरसों से चली आ रही है।
भारतीय संस्कृति: संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी
भारतीय संस्कृति में बचपन से ही नैतिकता, दूसरों की संपत्ति के सम्मान और सामाजिक मर्यादा की शिक्षा दी जाती रही है। महाभारत का प्रसंग बताता है कि अधिकारों और संपत्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद किस तरह विनाशकारी युद्ध में बदल सकता है। परिवार, समाज और सांस्कृतिक परंपराएं भारतीय जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, सामाजिक शांति केवल संस्कारों से नहीं, बल्कि निष्पक्ष कानून, प्रभावी प्रशासन और न्याय व्यवस्था से भी सुनिश्चित होती है।
यूरोप जैसी चुनौतियां भारत मे भी मौजूद
यूरोप के कुछ देशों में अवैध प्रवेश, सांस्कृतिक एकीकरण और कट्टरपंथ को लेकर गंभीर बहस चल रही है। कुछ स्थानों पर हिंसक प्रदर्शन और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आई हैं। इन घटनाओं से हमे सबक लेना जरूरी है। भारत में भी बांग्लादेशी व रोहिंग्या समुदाय अवैध रूप से प्रवास कर रहा है घुसपैठ अभी भी जारी है लेकिन कई बार दलगत की राजनीति पक्ष विपक्ष के अड़ियल रवैये के चलते इन लोगों पर कार्रवाई नहीं हो रही। हमें कानून के दायरे में संविधान के अनुसार ऐसे लोगों पर ठोस कार्रवाई करनी चाहिए। केंद्र हो या राज्य की सरकार, सभी की जिम्मेदारी है कि वे अवैध प्रवेश और हिंसा पर कानून के अनुसार कार्रवाई करें तथा मानवाधिकारों और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखें।
भारत की विविधता और राष्ट्रीय एकता
भारत अनेक धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों वाला देश है। क्षेत्रवाद, उग्रवाद और सामाजिक तनाव जैसी चुनौतियों के बावजूद हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था और साझा राष्ट्रीय पहचान एकता का महत्वपूर्ण आधार हैं। जम्मू-कश्मीर और मणिपुर के अनुभव बताते हैं कि हिंसा और अस्थिरता के पीछे ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सुरक्षा संबंधी कई कारण हो सकते हैं। इसलिए इन समस्याओं का समाधान केवल कठोर कार्रवाई में नहीं, बल्कि निष्पक्ष कानून, विकास, संवाद और जनविश्वास में भी निहित है। लगातार विकास और लगातार संवाद के चलते जम्मू कश्मीर में जो बदलाव हमें देखने को मिल रहा है वो इस बात का प्रमाण है कि सरकारी यदि निष्पक्ष होकर विकास करे तथा अपनी नीतियों को ठोस तरीके से लागू करें तो परिणाम सुखद ही आते हैं।इसी तरह जनसांख्यिकीय बदलाव और अवैध प्रवासन जैसे विषयों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, लेकिन बिना प्रमाण किसी समुदाय को हिंसा या अस्थिरता के लिए जिम्मेदार ठहराना भी सही नहीं है।
भारत को क्या सीखना चाहिए?
भारत को यूरोप की चुनौतियों से सीख लेते हुए अपनी सीमाओं की सुरक्षा, कानून के निष्पक्ष पालन और सामाजिक समरसता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अवैध घुसपैठ पर नियमानुसार कार्रवाई हो, हिंसा और कट्टरपंथ के प्रति शून्य सहनशीलता हो तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों की जवाबदेही तय हो। साथ ही, धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। मानवता के नाम पर कानून की अनदेखी नहीं होनी चाहिए और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर निर्दोष नागरिकों के अधिकार भी प्रभावित नहीं होने चाहिए। भारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करते हुए यूरोप के अनुभवों से सबक लेना चाहिए। सीमाओं की सुरक्षा, कानून का शासन, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय हित- इनमें से किसी की भी अनदेखी राष्ट्र के लिए उचित नहीं है। भारत को समस्याओं के गंभीर होने का इंतजार नहीं करना चाहिए। समय रहते प्रभावी नीतियां बनाना, कानून को सर्वोपरि रखना, एक समान शिक्षा, एक समान कानून व्यवस्था लागू करना ही देश हित मे होगा।
लेखक
प्रमोद आचार्य
दैनिक भास्कर से जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद आचार्य इन दिनों उदय भास्कर का संपादन कर रहे हैं। पत्रकारिता का लंबा अनुभव।