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विद्यार्थियों का आंदोलन: जलता हुया यूरोप बनाम दक्षिण पंथ का उदय

हिटलर और मुसोलिनी के चाहने वाले सर उठाना शुरू कर चुके हैं

जलता हुया यूरोप बनाम दक्षिण पंथ का उदय
राजसूय
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राजसूय,

यूरोप इस समय आग में जल रहा है। यूएइ के डिप्टी प्राइम मिनिस्टर अब्दुल बिन जायद नयान ने कुछ समय पहले कहा था, “एक दिन ऐसा आएगा जब हमें यूरोप में आज से भी ज्यादा कट्टरवाद और आतंक  देखने को मिलेगा। इसका कारण है उनके द्वारा ये मान लेना कि वे मध्य पूर्व को, इस्लाम को हम लोगों से बेहतर जानते हैं। मुझे खेद है लेकिन यह सिर्फ अज्ञान की बात है।" उन्होनें साफ कहा था कि समस्या की शुरुआत यूरोप से होगी क्योंकि वे माने बैठे हैं कि वे हम लोगों (इस्लाम) को बेहतर जानते हैं। पश्चिम में कट्टरपंथी ताकतों और वामपंथियों के बीच एक गठबंधन है। जबकि मजेदार बात ये है कि दुनिया में 57 मुस्लिम देश हैं जिनमें से कई देशों का राष्ट्रीय धर्म भी इस्लाम है लेकिन उनमें कहीं भी वामपंथ नहीं है। जबकि पश्चिम में यह गठबंधन खासा मजबूत है। ऐसा ही भारत में भी है। अब हम देखते हैं इसका अर्थ क्या है और भारत में किस तरह से यह एक खतरे की घंटी बजाता है। कहा जा रहा है कि फ़्रांस में छात्रों ने शिक्षा व्यवस्था में कमी को लेकर आंदोलन शुरू किया, तो सवाल ये है कि देश भर में आग कौन लगा रहा है? 18 अकतूबर तक फ़्रांस में 2400 लोग हिरासत में ले लिए गए हैं। 100 साल पुराना लिमोजस टाउन हाल जला दिया गया है। न्यूयॉर्क पोस्ट की एक खबर के अनुसार फ़्रांस में यहूदियों की दुकानों पर निशान लगाये गए और बाद में उन्हें जम कर लूटा गया। फ़्रांस के राष्ट्रपति इमनुयाल मैक्रो का कहना है कि यह न्यायसंगत नहीं है, इसका कोई तर्क नहीं है और न ही इसकी कोई माफी है। अमरीका के उपराष्ट्रपति जे डी वेंस का कहना है कि आपके देश में बाहर से लोग आए और उन्होनें वहाँ आग लगा दी है। वे आपके लोगों के साथ घुलना मिलना नहीं चाहते। वे जिन देशों से आए हैं वे वैसा ही देश वहाँ बनाना चाहते हैं। मैंने लगभग तीस साल पहले अपनी पहली यूरोप यात्रा के दौरान यह बात शिद्दत से महसूस की थी और इस बारे में पहले भी लिख चुकी हूँ। खास तौर पर जर्मनी, फ़्रांस और यूके में दिल खोल कर इमिग्रैशन का स्वागत किया गया। कहने को यह विद्यार्थियों का आंदोलन है लेकिन उनके आंदोलन को हाईजैक कर लिया गया है। इसी तरह के फसाद इटली में भी फैल चुके हैं। वहाँ एंटी-वॉर के नाम पर प्रोटेस्ट हो रहे हैं जबकि इटली ने कोई युद्ध नहीं छेड़ा है। सच्चाई तो ये है कि इटली ने यूएस-ईरान युद्ध में स्पष्ट कर दिया है कि वह इसमें किसी भी स्तर पर शामिल नहीं है। वहाँ 50 लोग हिरासत में हैं। दो पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। दुकानों को लूटा गया है। जॉर्जिया मेलोनी ने कहा है कि आंदोलन करने का अधिकार किसी भी तरह से हिंसा और हमारे शहरों की तबाही को न्यायसंगत सिद्ध नहीं करता। इटली में भी इमिग्रैशन को लेकर बहुत बड़ी बहस जारी है। मिसाल के तौर पर हम यूके की बात करते हैं। वहाँ पाकिस्तान मूल के लोग ग्रूमिंग गैंग चलाते हैं। मोरक्को मूल के लोग फिलिसतीन के झण्डा फहराते हुए सड़कों पर पदर्शन करते हैं।जबकि भारतीय मूल के लोग प्रोफेशनल काम करते है और टैक्स भरते हैं। जबकि ब्रिटिश नागरिकों के लिए ये सब बाहर से आए हुए इमिगरंट्स हैं। वे इनमे भेद नहीं कर पाते। यही कारण है कि पूरे यूरोप में इस समय इमिग्रैशन के कारण पैदा हो रही समस्याओं को लेकर बहस चल रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से मोरक्को, टूनिशिया और अल्जेरिया से आए लोगों के कारण हो रही समस्याओं पर गरम बहस हो रही है। यूरोप के देश अपनी नीति के चलते जो कि धर्मनिरपेक्ष है सभी धर्मों के लोगों का स्वागत करते आ रहे हैं । और अब वही लोग लोग उनके शहरों में आग लगा रहे हैं वे वहाँ अपने हिसाब से उस देश को चलाना चाहते हैं, वे अराजकता फैला रहे हैं और जो देश के असली नागरिक हैं वे इनके विरुद्ध आवाज उठाने से डरते हैं। क्योंकि ऐसा करने पर वे इन्हें इसलामोफोबिक कहते हैं। स्पेन में घरों की बढ़ी हुई कीमतों को लेकर फसाद जारी हैं। पुर्तगाल में भी बढ़ी हुई घरों की कीमतों को लेकर लिस्बन में प्रोटेस्ट कैम्प लगे हुए हैं। अल्बेनीया की किसी बड़ी अदालत में आग लगा दी गई है। सोशल मीडिया की अपुष्ट खबरों के अनुसार पेरिस के आईफ़ील टॉवर और इटली की पीसा की मीनार पर फिलिसतीन के झंडे लहरा दिए गए हैं। यूरोप में जिन मुद्दों पर आंदोलन हो रहे हैं वे हैं: जीवन यापन महंगा होना, घरों के कीमतें बढ़ना, शिक्षा सुविधाएं, सुरक्षा और राजनैतिक स्तर पर विश्वास की कमी। जबकि हमें आज तक यह बताया गया था कि यूरोप में तो ये सब बहुत अच्छा है। तो फिर क्या कारण है कि यूरोप जल रहा है। फ़्रांस में 2023 में भी एक युवा नाहेल के पुलिस द्वारा मारे जाने पर फसाद हुए थे। भारत में भी इसी तरह की कोशिशें कई मुद्दों को लेकर पिछले कुछ सालों में की गईं थीं। लेकिन भारत एक वृहद देश है और मजबूत सरकार ने समय रहते इन पर काबू पा लिया। एक स्तर पर सरकार की भी कमी रही कि वह बात सादा और सीधी भाषा में लोगों को नहीं समझा पाई थी। लेकिन फिर भी स्थिति को संभाल लिया गया। हाल ही में जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन भी इसी प्रयास की एक कड़ी के रूप में देखे जा सकते हैं। और अगर बांग्लादेशियों और रोहिणज्ञाओं के घुसपैठ के जरिए हमारे देश में आने पर समय रहते रोक नहीं लगायी गई तो कुछ वर्षों बाद यूरोप की यह आग यहाँ तक भी पहुँच सकती है।

 

अब हम बात करते हैं यूरोप में जो आग इस समय लगी हुई है इसके अंजाम क्या होंगें। इस उपद्रव के दौरान जो लोग अपना सब कुछ गवा चुके हैं क्या वे उठ कर जवाब नही देंगें? यूरोप ने अपने अतीत में खून की नदियां बहती हुयी देखी हैं। शायद जितनी मारकाट यूरोप ने देखी और झेली है उतनी दुनिया के किसी और महाद्वीप ने नहीं देखी। यूरोप की खूबसूरती के अतीत में बेहद हिंसा रही है। और अब वामपंथी यूरोप में दक्षिणपंथ का उदय हो चुका है। फ़्रांस, निदरलैड, जर्मनी, स्वीडन, स्पेन, इटली, पुर्तगाल, पोलैंड, ऑस्ट्रीया के नेता कड़े शब्दों में बॉर्डर्स को सख्त बनाने, इमिग्रैशन पर रोक लगाने और इमिगरेंट्स को वापिस भेजने की मांग उठा रहे हैं। यूरोप में फासिस्ट वाद सिर्फ दबा हुया है यह मरा नहीं है। हिटलर और मुसोलिनी के चाहने वाले सर उठाना शुरू कर चुके हैं। हालिया चुनावों में जर्मनी में एफड़ी ने 20.8 प्रतिशत सीटें जीती हैं। पुर्तगाल में चेगा ने 22.8 प्रतिशत और फ़्रांस में नैशनल रैली ने 577 में से 125 सीटें हासिल कर ली हैं। ये सब राइट विंग पार्टियां हैं जिन्हें कुछ समय पहले तक कोई नहीं जानता था। ये धीरे-धीरे अपनी पैठ बना रही हैं। पश्चिम में खास कर के यूरोप में दक्षिणपंथ और फासिस्ट वादियों के बीच एक बेहद महीन रेखा है जो कब मिट जाते है कोई नहीं जान पाता। देखना होगा कि यूरोप में लगी यह आग क्या क्या और दिखाती है। और देखना यह भी होगा कि कही यह आग यूरोप से बाहर तक न फैल जाए। क्योंकि इस बात के अनुमान लगाये जा रहे हैं।

प्रितपाल कौर

लेखक

प्रितपाल कौर

एनडीटीवी की रिपोर्टर के रूप में अर्से तक काम करने वाली प्रितपाल कौर दिल्ली की पत्रकार हैं। पत्रकारिता और साहित्य लेखन का लंबा अनुभव। राजसूय की दिल्ली ब्यूरो प्रमुख।

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