BREAKING

हालात

पैदल श्रद्धालुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?

पैदल श्रद्धालुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?
राजसूय
ad1
ad2
ad3
ad4

राजसूय।  भारत की धार्मिक परंपराओं में पैदल तीर्थयात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह आस्था, संकल्प, त्याग और आत्मिक शांति की ऐसी यात्रा है, जिसमें श्रद्धालु अपने आराध्य के प्रति समर्पण भाव से कठिन रास्तों पर भी कदम बढ़ाते हैं। कोई मन्नत पूरी होने पर पैदल निकलता है, कोई मनोकामना लेकर दरबार में हाजिरी लगाने जाता है, तो कोई अपने परिवार की सुख-समृद्धि और स्वस्थ जीवन की कामना के साथ सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करता है। तपती धूप हो, रात का अंधेरा हो या रास्ते की थकान, श्रद्धालुओं के कदम अपने आराध्य के प्रति विश्वास के सहारे आगे बढ़ते रहते हैं। लेकिन जब इसी आस्था के रास्ते पर किसी श्रद्धालु की जिंदगी सड़क दुर्घटना में थम जाती है, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं होती, बल्कि हमारी यातायात व्यवस्था और प्रशासनिक तैयारियों पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। नवरात्रों के पावन अवसर पर राजस्थान की सड़कों पर उमड़ता श्रद्धालुओं का सैलाब इसी संवेदनशील विषय पर गंभीरता से विचार करने की मांग करता है। देशभर में नवरात्रों का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। राजस्थान के सालासर बालाजी, मां ब्राह्मणी और मां भद्रकाली के मंदिरों सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी आवाजाही हो रही है। चूरू जिले में स्थित विश्वविख्यात सालासर बालाजी धाम विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और देश के अन्य हिस्सों से आने वाले भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। नवरात्रों के दौरान हजारों नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालु इस पवित्र धाम की ओर रुख करते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे भक्तों की होती है, जो पैदल यात्रा करके बालाजी के दरबार में पहुंचना चाहते हैं। उनके लिए यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विश्वास की परीक्षा और मनोकामना से जुड़ा भावनात्मक संकल्प होता है। 
    राजस्थान के अनेक मार्गों पर इन दिनों पैदल यात्रियों की लंबी कतारें दिखाई देती हैं। कहीं हाथों में ध्वज लिए श्रद्धालु जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं, तो कहीं युवा टोली बनाकर भजन गाते हुए यात्रा करते हैं। कई परिवारों के सदस्य भी एक साथ पैदल निकलते हैं। श्रद्धालुओं की सेवा के लिए जगह-जगह भंडारे, जलपान केंद्र और विश्राम स्थल स्थापित किए जाते हैं। स्थानीय लोग भी सेवा भाव से यात्रियों को पानी पिलाते हैं, भोजन करवाते हैं और थके हुए पैरों को कुछ देर आराम देने की व्यवस्था करते हैं। यह दृश्य राजस्थान की धार्मिक संस्कृति, सामाजिक सहयोग और मानवीय संवेदनशीलता का परिचायक है। लेकिन इस आस्था से जुड़े दृश्य का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सड़कों पर बढ़ती पैदल यात्रियों की संख्या, रात के समय आवाजाही, वाहनों की तेज रफ्तार और कई स्थानों पर पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों का अभाव दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ा देता है। श्रद्धालु जिस विश्वास के साथ घर से निकलते हैं, उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से हर वर्ष धार्मिक यात्राओं के दौरान सड़क हादसों की खबरें सामने आती हैं। कई बार परिवार का कोई सदस्य दर्शन करने के लिए निकलता है, लेकिन घर लौटने के बजाय उसकी मौत की खबर पहुंचती है। जिस यात्रा को परिवार के लिए खुशियां और संतोष लेकर आना था, वही जीवनभर का दर्द बन जाती है।
इस बार भी नवरात्रों के पहले दिन हनुमानगढ़ जिले के पल्लू कस्बे में सड़क दुर्घटना में तीन पैदल यात्रियों की मौत ने इस चिंता को और गंभीर बना दिया। तीन लोगों की असमय मृत्यु केवल एक समाचार नहीं है। इसके पीछे उन परिवारों की दुनिया उजडऩे का दर्द है, जिनके अपने श्रद्धा के साथ यात्रा पर निकले थे। किसी घर ने अपना बेटा खोया होगा, किसी ने भाई या पिता, तो किसी परिवार के भविष्य की उम्मीद हमेशा के लिए छिन गई होगी। मृतकों के परिजनों के लिए सांत्वना के शब्द भी उस रिक्तता को नहीं भर सकते, जो अपनों के अचानक बिछड़ जाने से पैदा होती है। ऐसे हादसे हमें यह सोचने के लिए विवश करते हैं कि क्या धार्मिक यात्राओं के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं को केवल दुर्भाग्य मानकर स्वीकार कर लिया जाए, या उनसे सबक लेकर ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे भविष्य में अनमोल जिंदगियां बचाई जा सकें? 
    निश्चित रूप से हर दुर्घटना को रोक पाना संभव नहीं होता। सड़क पर अचानक सामने आने वाली परिस्थितियां, वाहन चालकों की लापरवाही और मानवीय गलतियां भी हादसों का कारण बनती हैं। लेकिन जब किसी मार्ग पर हर वर्ष एक निश्चित अवधि में बड़ी संख्या में पैदल श्रद्धालुओं के गुजरने की जानकारी हो, तो वहां सुरक्षा व्यवस्था को आकस्मिक जिम्मेदारी नहीं माना जा सकता। यह प्रशासन की नियमित और पूर्वनियोजित जिम्मेदारी बन जाती है। नवरात्रों के दौरान सालासर और अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों की ओर जाने वाले मार्गों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढऩे का अनुमान पहले से लगाया जा सकता है। ऐसे में यातायात प्रबंधन, पुलिस बल की तैनाती, चेतावनी संकेतों और रोशनी की व्यवस्था जैसे कदम पहले ही उठाए जाने चाहिए।
राजस्थान सरकार को इस दिशा में विशेष कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता है। सबसे पहले उन मार्गों और स्थानों की पहचान की जानी चाहिए, जहां से बड़ी संख्या में पैदल यात्री गुजरते हैं और जहां पहले दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। इन संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त यातायात पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाए। केवल मुख्य चौराहों या मंदिरों के आसपास पुलिस की मौजूदगी पर्याप्त नहीं है। दुर्घटनाओं की आशंका उन ग्रामीण सड़कों, राजमार्गों और कस्बों के बाहरी हिस्सों में भी रहती है, जहां रोशनी कम होती है और वाहनों की गति अपेक्षाकृत अधिक रहती है। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था को पूरे यात्रा मार्ग को ध्यान में रखकर तैयार करना होगा।दूसरा महत्वपूर्ण उपाय श्रद्धालुओं की दृश्यता बढ़ाना है। पैदल यात्रियों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है, जो रात में चलते हैं या सुबह होने से पहले यात्रा शुरू कर देते हैं। अंधेरे में गहरे रंग के कपड़े पहने व्यक्ति को दूर से पहचानना वाहन चालक के लिए कठिन हो सकता है। यदि यात्रियों के बैग, ध्वज, जैकेट और अन्य सामान पर रिफ्लेक्टर लगाए जाएं, तो वाहन की रोशनी पडऩे पर वे दूर से दिखाई दे सकते हैं। इससे चालक को समय रहते सावधान होने और वाहन की गति नियंत्रित करने का अवसर मिलेगा। प्रशासन को यात्रियों के लिए रिफ्लेक्टिव पट्टियां या जैकेट उपलब्ध करवाने की व्यवस्था पर विचार करना चाहिए। सेवा समितियों, धार्मिक संस्थाओं और भंडारा संचालकों को भी इस अभियान से जोड़ा जा सकता है। तीसरा विषय पैदल यात्रियों और वाहनों के लिए सुरक्षित आवाजाही का है। जहां सड़क की चौड़ाई और परिस्थितियां अनुमति दें, वहां यात्रियों के लिए अलग पैदल गलियारा या निर्धारित सुरक्षित पट्टी विकसित की जानी चाहिए। सड़क के किनारे अवरोधक, स्पष्ट दिशा-सूचक बोर्ड और चेतावनी संकेत लगाए जाएं। जिन मार्गों पर यात्रियों का दबाव अधिक हो, वहां आवश्यकता के अनुसार गति सीमा कम करने, भारी वाहनों की आवाजाही नियंत्रित करने और कुछ समय के लिए यातायात का वैकल्पिक मार्ग निर्धारित करने जैसे उपाय किए जा सकते हैं। हालांकि ऐसे निर्णय स्थानीय परिस्थितियों और यातायात की वास्तविक स्थिति का आकलन करके ही लिए जाने चाहिए, ताकि सुरक्षा के साथ आम नागरिकों की आवाजाही भी प्रभावित न हो।
    रात के समय यात्रा करने वालों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। अंधेरे मार्गों पर पर्याप्त रोशनी, प्रमुख स्थानों पर पुलिस गश्त, आपातकालीन सहायता केंद्र और एंबुलेंस की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। दुर्घटना होने के बाद घायल को समय पर उपचार मिलना उसकी जान बचाने में निर्णायक हो सकता है। इसलिए केवल हादसे रोकने की व्यवस्था ही नहीं, बल्कि हादसे की स्थिति में त्वरित सहायता पहुंचाने की योजना भी जरूरी है। स्थानीय अस्पतालों को भी नवरात्रों के दौरान संभावित आपात स्थितियों के लिए तैयार रखा जाना चाहिए। इस पूरे अभियान में तकनीक और जनसहभागिता की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। जिला प्रशासन धार्मिक संस्थाओं और यात्रा आयोजकों के सहयोग से पैदल यात्रियों के प्रमुख मार्गों, विश्राम स्थलों, चिकित्सा केंद्रों और सहायता चौकियों की जानकारी सार्वजनिक कर सकता है। सोशल मीडिया, स्थानीय समाचार माध्यमों और धार्मिक स्थलों के उद्घोषणा तंत्र के जरिए यात्रियों को सुरक्षित यात्रा के बारे में जागरूक किया जा सकता है। उन्हें सड़क पर अनुशासित ढंग से चलने, समूह में चलते समय पर्याप्त दूरी रखने, वाहन मार्ग के बीच में न चलने और रात में दृश्यता बढ़ाने वाले साधनों का इस्तेमाल करने की सलाह दी जानी चाहिए। इसी प्रकार वाहन चालकों को भी चेताया जाए कि धार्मिक यात्रा वाले मार्गों पर विशेष सावधानी बरतें, निर्धारित गति सीमा का पालन करें और पैदल यात्रियों के पास से गुजरते समय अतिरिक्त सतर्कता रखें। सरकार के साथ-साथ श्रद्धालुओं और यात्रा आयोजकों की भी कुछ जिम्मेदारियां हैं। आस्था का अर्थ स्वयं को जोखिम में डालना नहीं है। कई बार श्रद्धा और उत्साह में लोग यातायात नियमों को मामूली समझने लगते हैं, जबकि सड़क पर छोटी-सी चूक भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। यात्रियों को सड़क के किनारे सुरक्षित ढंग से चलना चाहिए, जहां संभव हो वहां निर्धारित पैदल मार्ग का इस्तेमाल करना चाहिए और रात में बिना रिफ्लेक्टर या रोशनी के यात्रा करने से बचना चाहिए। समूहों के साथ चलने वाले लोगों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके पीछे आने वाले यात्री भी वाहनों को स्पष्ट दिखाई दें। यात्रा आयोजकों को भी केवल भोजन, पानी और विश्राम की व्यवस्था तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सुरक्षा को अपनी सेवा का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहिए।धार्मिक स्थलों की ओर जाने वाले इन मार्गों पर सेवा करने वाली संस्थाओं का योगदान सराहनीय है। भंडारे लगाना, पानी पिलाना और यात्रियों की थकान दूर करने के लिए विश्राम की व्यवस्था करना हमारी सामाजिक परंपरा का सुंदर रूप है। लेकिन समय की मांग है कि इस सेवा में सड़क सुरक्षा को भी शामिल किया जाए। यदि कोई संस्था भोजन के साथ रिफ्लेक्टिव पट्टियां बांटे, यात्रियों को सुरक्षित मार्ग की जानकारी दे और जरूरत पडऩे पर प्रशासन से समन्वय करे, तो उसकी सेवा का महत्व और बढ़ जाएगा। इसी तरह स्थानीय व्यापारियों, स्वयंसेवकों और युवाओं को भी जागरूकता अभियान से जोड़ा जा सकता है। मीडिया की भूमिका भी केवल दुर्घटना की खबर प्रकाशित करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। हादसों की सूचना देना आवश्यक है, लेकिन इसके साथ सुरक्षा संबंधी कमियों, संवेदनशील मार्गों और प्रशासनिक तैयारियों पर तथ्यपरक चर्चा भी होनी चाहिए। जब कोई दुर्घटना होती है, तो कुछ समय तक चिंता और चर्चा बनी रहती है, लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। वास्तविक बदलाव तभी आएगा, जब हर हादसे के बाद उसके कारणों की समीक्षा हो, जिम्मेदारियों का निर्धारण किया जाए और आवश्यक सुधारों को अमल में लाया जाए। दुर्घटनाओं के आंकड़ों, जोखिम वाले स्थानों और किए गए सुधारों की नियमित समीक्षा से भी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। नवरात्रों में श्रद्धालुओं का उमडऩा राजस्थान की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत की ताकत है। इसे रोकना या हतोत्साहित करना किसी समस्या का समाधान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि आस्था की इस यात्रा को सुरक्षित बनाया जाए। श्रद्धालु अपने आराध्य के दरबार में सिर झुकाने के लिए निकलते हैं, न कि अपने परिवारों को जीवनभर का दुख देने के लिए। उनके मन में विश्वास होता है कि यात्रा पूरी करके वे घर लौटेंगे, परिवार के साथ खुशियां बांटेंगे और अपने अनुभव सुनाएंगे। इस विश्वास की रक्षा करना समाज और शासन, दोनों की जिम्मेदारी है। राजस्थान सरकार को चाहिए कि वह नवरात्रों और अन्य प्रमुख धार्मिक अवसरों के लिए स्थायी सड़क सुरक्षा नीति तैयार करे। हर वर्ष केवल अस्थायी इंतजाम करने के बजाय यात्रा मार्गों का वैज्ञानिक आकलन, पुलिस बल की पर्याप्त तैनाती, रिफ्लेक्टर वितरण, सुरक्षित पैदल गलियारों, चिकित्सा सहायता और त्वरित आपातकालीन सेवाओं को एक समन्वित योजना का हिस्सा बनाया जाए। जिला प्रशासन को धार्मिक संस्थाओं और स्थानीय निकायों के साथ मिलकर इस योजना को लागू करना चाहिए तथा प्रत्येक यात्रा अवधि के बाद इसकी समीक्षा भी करनी चाहिए। आस्था मनुष्य को संबल देती है, लेकिन किसी की जान चली जाने के बाद केवल श्रद्धांजलि देना पर्याप्त नहीं होता। सच्ची संवेदनशीलता इस बात में है कि उन कारणों को दूर किया जाए, जिनकी वजह से किसी दूसरे परिवार को ऐसा दुख न सहना पड़े। पल्लू की दुर्घटना में जान गंवाने वाले तीन श्रद्धालुओं की स्मृति में सबसे सार्थक कदम यही होगा कि उनकी मौत से सबक लेकर भविष्य की यात्राओं को अधिक सुरक्षित बनाया जाए। मंदिरों तक पहुंचने वाले रास्ते श्रद्धा के रास्ते बने रहें, मौत के रास्ते नहीं। श्रद्धालुओं के कदम भक्ति में आगे बढ़ें और उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित हो। यही सरकार, प्रशासन और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

बालकृष्ण थरेजा

लेखक

बालकृष्ण थरेजा

पंजाब केसरी से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार बालकृष्ण थरेजा नहरी क्षेत्र (श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़)के जाने-माने पत्रकार हैं।

1 प्रकाशित खबरें सभी देखें →