BREAKING

अलमबदार

ख़ामोशी को मेरी दुआ समझो और जो बोल दूं हुआ समझो

ख़ामोशी को मेरी दुआ समझो और जो बोल दूं हुआ समझो
राजसूय
ad1
ad2
ad3
ad4

राजसूय।  किसे पता था कि गांव के बुज़ुर्गों से रहीम, कबीर के दोहे और मीर ग़ालिब के शेर सुन कर उनके माÓनी पूछने वाला एक तिफ़्ल-ए-मख़्तब एक दिन हिन्दुस्तान के शेर-ओ-अदब में आला मकाम हासिल करेगा। कौन जानता था कि गांव दवे छपरा, जिला बलिया (उ.प्र.) के हाई स्कूल के सालाना जलसे में महाकवि तुलसीदास का किरदार अदा करने वाले नौजवान मदन मोहन मिश्रा एक दिन शायरी में वो मकाम हासिल करेंगे कि उन्हें दुनिया ए-उर्दू शेर-ओ-अदब में मदन मोहन दानिश के नाम से जान- पहचाना जाएगा। आप जब हाई स्कूल में पढ़ते थे तो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी स्कूल के पुस्तकालय में पाठ्यक्रम की किताबों के साथ हिन्दी- उर्दू के क्लासिकल शायर और कवियों को खूब पढ़ते रहे। धीरे- धीरे आप का ज़हन मौज़ू होने लगा, तब आप अपने जज़्बात को लफ्ज़़ों में बयां करने लगे। उस ज़मानें में मदन मोहन दानिश ने पहली गज़़ल कही जो आज भी बेहद मक़बूल है। उसका मतला मुलाहिज़ा कीजिए-
ख़ामोशी को मेरी दुआ समझो
और जो बोल दूं हुआ समझो
ये दो मिसरे इंसान की ख़ामोशी और उसकी परवाज़ की बुलंदी की तरफ़ इशारा कर उसकी गोयाई के माÓनी बयान करते हैं। ये ख़ालिक-ए-क़ायनात और इंसान के वजूद को समझने का एक सूफिय़ाना अंदाज-ए-कहन है। मदन मोहन 'दानिशÓ अपने शुरूआती दौर से ही अपना अलाहिदा उसलूब कायम करते हुए क्लासिकल उर्दू शायरी की ख़ुशबू के साथ जदीद लब-ओ-लहज़े में ऐसे शेÓर कहने लगे जो सीधा सामइन और शोरा-ए-इकराम के दिलों तक पहुंचते हैं। आपके क़लाम में जि़न्दगी के वो तमाम रंग-ओ- निक़हत इस तरह पोशीदा है जैसे हमारे अहसासात हमारे दिलों में जि़न्दा हैं। मदन मोहन दानिश अपने एहसास लफ्ज़़ों में ऐसी शिद्दत से बयां करते हैं जिनकी धड़कन इनके अशआर में सुनाई देती है। यक़ीनन धड़कन को सुनने वाले मदन मोहन दानिश के जज़्बात-ओ अहसासात में ख़ुद को महसूस करते हैं। ये शेÓर देखिए-
मुझ में एक और शख़्स है 'दानिशÓ
उसको हरगिज़ न दूसरा समझो
ये शेÓर इंसान को अपने अन्दर सफऱ करने की तरफ़ इशारा करता हुआ इस नुक़्ता-ए-नजऱ की तरह सोचने पे आमादा करता है कि ख़ुद में ख़ुद का होना अपने वजूद को महसूस करने जैसा है। ये अछूता खय़ाल उर्दू शायरी में बहुत कम बरता गया है। इसके माÓनी को मदन मोहन दानिश जैसे एक गहरे मिजाज़ के शायर बख़ूबी बयान करने का हुनर रखते हैं। आपकी शायरी एक ख़ास कैफिय़त का आईनादार है जिसमें एक हस्सास दिल शायर इंसानी समाज को अपने ज़ाती तज़ुर्बात के मंजऱ में देख सकता है, और साथ ही उनके के दर्द-ओ-ग़म के साथ अपनी आह भी सुन सकता है क्योंकि 'दानिशÓ जैसे शायर अपने दुख का जश्न मना कर वो तज़ुर्बे हासिल करते हैं जो हर किसी के बस में नहीं होता। मिसाल के तौर पर ये शेÓर मुलाहिज़ा कीजिए-
हम अपने दु:ख को गाने 
लग गए हैं
मगर इसमें ज़माने लग गए हैं
मदन मोहन दानिश ऐसी अलाहिदा तासीर के शायर हैं जिसकी वजह से इनके हजारों- लाखों चाहने वाले हिन्दुस्तान के साथ अमेरिका, कनाडा, सिंगापुर, दुबई, बैंकाक, दोहा, क़तर, आबूधाबी, बहरीन, पाकिस्तान,शारजाह और नेपाल जैसे देशों में इन्हें सुनते हुए जिस फऱाग़दिली से दाद-ओ-तहसीन से नवाजते हैं, वो देखने लायक होता है। मदन मोहन दानिश अपनी शायरी के ज़रिए ऐसी राह हमवार करते हैं जिसमें मंजि़ल की ख़्वाहिश नहीं है बल्कि मुसलसल सफऱ की दरकार है। जहां हर क़दम पे नई तख़लीक की ख़बर की उम्मीद रहती है। एक मिसाल पेश है-
हवा ने दौड़ के मौसम को ये 
ख़बर दी है
उगा है शाख़ पे पत्ता नया-नया कोई
नउम्मीदी में कुछ नया होने की ख़बर इंसान को कुदरत के साथ ख़ुद के जि़न्दा होने का यक़ीन दिलाती है तो ऐसे शेÓर वजूद में आते हैं जिनमें मौत और जि़न्दगी का फ़लसफ़ा बारीकी से समाझा जा सकता है। जहां जि़न्दगी है, वहां इश्क़ का जज्बा है और जहाँ इश्क़ है वहाँ अहसास की शिद्दत है, शिकवा है, फिऱाक़-ओ-विसाल है, प्यास है, पानी है मगर यहाँ प्यास होने के बावजूद सहराब होने की चाह नहीं बल्कि तिश्नगी अहम है। मदन मोहन दानिश जैसे तिश्नालब शायर प्यास की शिद्दत में सहराब रहते हैं।
मसअला तो इश्क़ का है, जि़न्दगानी का नहीं
यूँ समझिये प्यास का शिकवा है,पानी का नहीं
'दानिशÓ की शाइरी के मुतालिक निदा फ़ाज़ली, मुहम्मद अलवी, फऱहत अहसास और शीन. काफ़ निज़ाम जैसे आलमी शोहरत याफ़्ता शायर, नक़्क़ाद भी मुतास्सिर हैं और इनके कलाम पर अपने तासुरात लिखे हैं। आपके अब तक तीन मजमूए मंजऱ-ए-आम पर आ चुके हैं जो बेहद मकबूल हैं। साथ ही उर्दू शेर-ओ-अदब के पांच अहम शोरा-ए-इकराम के संकलनों में आपका क़लाम शाया हुआ है जो बहुत अहम है। आपकी की अदबी ख़िदमात का एतराफ़ करते हुए मध्य प्रदेश उर्दू अकादेमी साहित्य एवार्ड, शान-ए- उर्दू एवार्ड, जश्न-अदब न्यू दिल्ली, डा.भागवत शरन चतुर्वेदी जयपुर, अनामिका साहित्य सम्मान के साथ बहुत से सामाजिक- साहित्यिक संस्थानों ने आपको सम्मानित किया है। मदन मोहन दानिश ख़ामोश तरबियत के ऐसे संजीदा शायर हैं, जो हमा वक्त उर्दू ज़बान-ओ-अदब की बेलौस ख़िदमत करते हुए अपने शायर होने को जि़न्दा रखते हुए नये ज़ाविये नई नस्ल को दे रहे हैं। आप कहते हैं- शेÓर हो जाते हैं, कहे नहीं जाते।

इरशाद अजीज

लेखक

इरशाद अजीज

उर्दू शायरी की परंपरा का संवद्र्धन करने वाले शायरों से परिचित करवाने वाले कॉलम 'आज की शायरी के अलमबरदार ' के लेखक इरशाद अजीज यातिप्राप्त शायर हैं।

2 प्रकाशित खबरें सभी देखें →