BREAKING

अलमबदार

आज की शायरी के अलमबरदार: लहूलुहान हुई जा रही है हर तितली, हवस परस्तों ने कैसे ये गुल खिलाए हैं- वसीम राशिद, शायरा

लहूलुहान हुई जा रही है हर तितली, हवस परस्तों ने कैसे ये गुल खिलाए हैं- वसीम राशिद, शायरा
राजसूय
ad1
ad2
ad3
ad4

राजसूय। उर्दू शायरी और पुरानी दिल्ली का रिश्ता फूल और ख़ुशबू की तरह है क्योंकि यहां की ज़बान-ओ-लबो लहज़ा ख़ुदा-ए-सुख़न मीर तक़ी मीर की शायरी की तरह आमफ़हम और सलीस है और ग़ालिब तो आज भी ग़ालिब हैं, ख़ासतौर पर जामा मस्जिद और लालक़िला के एतराफ़ में कुछ इल्मी और अदबी ख़ानदान हुए हैं। तारीख़ गवाह है कुछ नामों के ज़िक्र के बग़ैर दिल्ली और उर्दू शे'र-ओ-अदब का तसव्वुर ही बेमानी है, वो दुनिया-ए -उर्दू, पारसी ज़बान के सूतून रहे हैं। अगर आज की उर्दू शे'र-ओ-अदब और दिल्ली के हवाले से ख़ासतौर पर शायरात के मुतालिक बात की जाए तो इस वक़्त एक अहम नाम वसीम राशिद का है। आपकी पैदाइश हाफ़िज़ अब्दुल वाहिद खां और वालिदा सरवर जहां के यहाँ हुई। वसीम राशिद के बचपन में ही आपके वालिद का इंतकाल हो गया था। आपकी वालिदा आलीमा थी। उन्होंने वसीम राशिद के साथ सभी बच्चों को ख़ूब पढ़ाया। वसीम की शुरूआती तालीम दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में हुई और B.A, M.A दिल्ली विश्वविद्यालय से किया। आपने मास कम्युनिकेशन में डिप्लोमा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से किया। इसके साथ ही आग़ा ख़ान फ़ाउंडेशन से आपने एजुकेशनल लीडरशिप प्रोग्राम के लिए प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसी दौरान ही न्यू होरेजन स्कूल निज़ामुद्दीन दिल्ली में शिक्षण कार्य आरम्भ कर दिया। वहां आपने 20 साल तक 12वीं कक्षा के तालिब-ए-इल्म छात्रों को मीर,ग़ालिब, दाग़, ज़ौक मोमिन जैसे उस्ताद उल शोहरा और साथ ही तरक्की पसंद शोहरा-ए-इकराम की शायरी के साथ अरूज़ भी पढ़ाती रहीं और मिडिया प्रोग्राम्स भी करती रहीं। रफ़्ता- रफ़्ता आपके दिलो-दिमाग में मौज़ूनियत आती गई, फिर क्या था, आप शे'र कहने लगीं। इस दरमियान आपने सरकारी मुलाज़मत छोड़कर सहारा उर्दू न्यूज़ चैनल में सीनियर प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया। इस वजह से वसीम राशिद को हिन्दुस्तान की पहली उर्दू मुदीरा के एज़ाज़ से नवाज़ा गया। यहाँ वसीम राशिद को शे'र-ओ-अदब का भरपूर माहौल मिला। यहाँ  शकील शमशी, माजिद रमन और मोईन शादाब जैसे नामवर शायर और शहाफ़ी के साथ काम करने का जो मौक़ा मिला वो वसीम राशिद के लिए बेहद अहम रहा।  शकील शमशी कोई मिस्रा-ए-तरहा देते तो वसीम राशिद मुसलसल तबा आज़माई करने लगी। फिर यूं हुआ कि गोरखपुर में सहारा उर्दू अख़बार की लॉन्चिंग हुई। इस मौक़े पर मशहूर शायर अज़ीज़ बर्नी ने एक ऑल इण्डिया मुशाइरा मुनक्किद किया। उसकी निज़ामत वसीम राशिद ने की और अपना क़लाम पेश किया, जिसकी बानगी मुलाहिज़ा कीजिए-

पहले वो मेरी तमन्नाओं को पर देता है
शक की कैंची से उन्हें फिर वो कतर देता है

इस शे'र में ख़वातीन के दिल की तल्ख़ हक़ीक़त को शिद्दत से बयान किया गया है जो हमारे मुहाशरे अक्सर देखने और सुनने को मिलती है। वसीम राशिद एक संजीदा शायरा होने के साथ एक जिम्मेदार शहाफ़ी भी हैं, लिहाज़ा वो ख़बरों में पोशीदा हादसों से मुतआसिर लोगों के दर्द को भी ऐसे अंदाज़ में बयान करती हैं जिसके नुकूस आम इन्सान को भी फ़िक्र के नुक़्ता-ए-नज़र देते हैं। वसीम राशिद का ये शे'र भी देखें जिसमे मासूम बच्चियों की इस्मतरेज़ी करने वाले दरिंदों के हवाले से दो मिस्रों में ज़बान-ओ-बयान के एतबार से बहुत अहम बात कही गई है-

लहूलुहान हुई जा रही है हर तितली
हवस परस्तों ने कैसे ये गुल खिलाए हैं

देखा जाए तो इस मौज़ू पर शायर और ख़ासतौर से शायरात बहुत कम शे'र कहती हैं मगर वसीम राशिद शायरी और शहाफ़त के फ़र्ज़ को एक साथ बख़ूबी अंजाम देती नज़र आती हैं। इस शे'र में तलमीह, तसबीह और इश्तियारे में वो मुकम्मल बात कह दी है जिसेके लिए कई शतरे दरकार होती हैं। वसीम राशिद ने अपनी शायरी की बिना पर हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि दुनिया भर में उर्दू- हिन्दी के मंचों से सामइन को मुतास्सिर किया है। ये ही वजह की आपकी शिनाख़्त आज की उर्दू शायरी और शहाफ़त (पत्रकारिता) में अपना अहम मकाम रखती है। जब- जब आपने दिल्ली, भोपाल, पुणे, जयपुर , एवं उत्तर प्रदेश के अलावा जहां भी वहां की उर्दू अकादमियों के मुशायरों में निज़ामत के साथ क़लाम पढा तो आलमी शोहरत याफ़्ता शायर वसीम बरेलवी, राहत इन्दौरी, फ़ारूक़ जायसी, असलम चिश्ती, हक़कानुल क़ासमी जैसे शोहरा-ए-इकराम ने भरपूर दाद-ओ-तहसीन से ये कहते हुए नवाज़ा कि- वसीम, क्या ख़ूबसूरत अदबी निज़ामत करती हो। वसीम राशिद की शायरी अपने वक़्त की आईनादार है और इन्सानी जज़्बात-ओ- अहसासात की घुटन को खुली फ़िज़ा में सांस लेने की दावत भी देती है। ये शे'र मिसाल के तौर पर देखें -

माइके जाऊं तो अब तक मिरी चौखट पे वसीम
मेरी ही शक्ल की लड़की खड़ी मिलती है

ये शे'र जब वसीम राशिद हिन्दुस्तान के साथ ही लंदन, पेरिस, कुवैत, बहरीन, क़तर दुबई, ज़द्दा के मुशायरों में जब सुनाती हैं तो सामइन की आँखें भर आती हैं, ये शे'र अपने वतन से दूर रहने वालों ख़ासतौर पर ख़वातीन को उनके घर की याद दिलाता है।
वसीम राशिद अपनी शायरी के ज़रिए इन्सान के नज़रियात का भी जायजा लेती हुई दिखाई देती हैं जिसे हम अपने इर्द-गिर्द के माहौल में अक्सर देखते रहते हैं। इसकी बानगी के तौर पर ये शे'र हाज़िर है -

ये बात सच है नज़रियात जिसके छोटे हों
बडे मकान में भी वो घुटन में रहता है

बडे ख़ानदानों के बुज़ुर्गों की टूटती बिखरती तहज़ीब और रवायत के दर्द को जिस तरह शे,र में बयान किया है वो हम अपने मुहाशरे में देखते हुए अफ़सोस करते हैं। लेकिन वसीम राशिद अपनी शायरी और मज़ामीन के ज़रिए समाज में ऐसा माहौल हमवार करने की कोशिश करती रहती हैं जो हमें अपनों की अहमियत और उनके वजूद को ख़ुद में महफ़ूज़ रखते हुए ये कह सके जैसा वसीम राशिद अपने इस मत'ले में यूं कहती हैं-

तेरा ख़्याल मेरी अंजुमन में रहता है
अजीब फूल है तन्हा चमन में रहता है

वसीम राशिद ने उर्दू के इन्टरनेशनल अख़बार चौथी दुनिया की एडिटर के तौर पर मिसाली काम किया। ये इनकी दूरंदेशी और मेहनत का ही नतीज़ा है कि आपने ईरान और ईराक़ में मुनक्किद इन्टरनेशनल शहाफ़ती सेमिनारों में भी हिस्सा लिया है। आपकी दो किताबें मंज़र-ए-आम पर आने को हैं। एक किताब मज़ामीन की आ चुकी है। आप आज भी ख़ुद को अदब की तालिब-ए-इल्म मानती हैं।

इरशाद अजीज

लेखक

इरशाद अजीज

उर्दू शायरी की परंपरा का संवद्र्धन करने वाले शायरों से परिचित करवाने वाले कॉलम 'आज की शायरी के अलमबरदार ' के लेखक इरशाद अजीज यातिप्राप्त शायर हैं।

2 प्रकाशित खबरें सभी देखें →