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संपादकीय: मोहजाल है एआई पर निर्भरता, सरकार बनाए सुरक्षा-नीति

मोहजाल है एआई पर निर्भरता, सरकार बनाए सुरक्षा-नीति
राजसूय
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राजसूय। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते चलन ने मनोरंजर के रास्ते से बढ़ते हुए अब इंसानी दिमाग को ाी अपने काबू में करना शुरू कर दिया है। इंसान के सोचने-समझने से ज्यादा एआई से मिलने की वजह से बढ़ती हुई इस पर निर्भरता ने दुनिया के बुद्धिजीवियों के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि एआई पर निर्भर लोगों का भविष्य क्या होना है। इन दिनों यह चिंता वैश्विक स्तर पर है कि जिस तरह से लोग एआई पर निर्भर हो रहे हैं, क्या वह ठीक है। इस सवाल के जवाब में चिंताएं ज्यादा हैं।

दुष्परिणाम की आशंकाएं ज्यादा हैं जबकि इसके पक्ष में तर्क कम हैं। सबसे बड़ी चिंता जो जताई जा रही है, वह इस टूल की जवाबदेही को लेकर है कि क्या ऐसे सुरक्षा उपायों की जरूरत नहीं है, जिससे एआई के रिस्क से आमआदमी को बचाया जा सके। सिर्फ आम आदमी ही नहीं बल्कि तंत्र को भी। पिछले दिनों आस्ट्रेलिया में इस तरह का घटनाक्रम देखने को मिला, जिसमें एआई के जरिये हैल्थ पोर्टल तक पहुंच बनाने का प्रयास हुआ और यह प्रयास सफल भी रहा। इस तरह की घटनाओं से स्पष्ट है कि देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

क्योंकि एआई से मिलने वाली जानकारियां काल्पनिक भी हो सकती है और सही भी। यह विषय सीधे तौर पर गोपनीयता और निजता का उल्लंघन तो होगा ही सामाजिक दृष्टि से भी इसे ठीक नहीं माना जा सकता। पिछले दिनों अस्सी के दशक के लुक में फोटो बनाने वाले एक टूल को लेकर भी इसी तरह के सवाल खड़े किए गए थे कि जो टूल आपको अच्छे कपड़े पहना सकता है, वह कुछ और भी कर सकता है। इसलिए अपने डेटा एआई के हवाले नहीं करने चाहिए।

वाकई यह चिंता का विषय है, जिसे हमें समझना होगा। एआई टूल्स का इस्तेमाल कितना और और क्यों हो, इस सवाल को जाने बगैर अगर हम इसे आजमाएंगे तो परेशानी में पड़ सकते हैं। अगर एक लाइन में बात को स्पष्ट करना हो तो यही कहा सकता है कि एआई टूल उन लोगों के लिए ही फायदेमंद है, जिनका खुद का बौद्धिक स्तर उच्च है। अगर एआई से कमतर बौद्धिक स्तर पर वाले एआई को आजमाएंगे तो संभव है, वे खुद इसके टूल बन जाएंगे, क्योंकि एआई अपने ज्ञान और कौशल से चकाचौंध करता है।

हालांकि, इसके खतरों से बेपरवाह लोग एआई टूल का अंधाधुंध इस्तेमाल करने में लगे हैं, लेकिन जिन लोगों को भविष्य की चिंता है, वे इस पर निर्भरता के पक्ष में नहीं हैं। यह सही भी है। एआई ने अगर हमारे मस्तिष्क को नियंत्रित कर लिया तो फिर सबसे पहले हमारे सोचने-समझने की ताकत को छीनेगा। यह हमारे पर इतना हावी हो जाएगा कि इसके द्वारा दिए जाने वाले परिणामों पर हम आंख मंूदकर भरोसा करने लगेंगे, क्योंकि यह हमारे संचित ज्ञान से अधिक और बेहतर होगा। समय है, इसके लिए एक गाइड-लाइन का।

एक ऐसे फ्रेम-वर्क का, जिससे यह तय हो कि एआई कितनी और क्यों। इस विषय पर नीतिगत रूप से कार्ययोजना बने और देशवासियों को इससे अवगत करवाया जाए तो संभव है कि आने वाले समय में स्थितियों को नियंत्रित किया जाए। देश-दुनिया में जब यह चिंता है तो हमारी सरकार को भी इस दिशा में प्रयास करने चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को इस मोहजाल की सच्चाई से अवगत करवाया जा सके।

गायत्री शर्मा

लेखक

गायत्री शर्मा

राजसूय की संपादक

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