संपादकीय
महिला जनप्रतिनिधियों को अपने सम्मान और गरिमा की रक्षा के लिए खुद आगे आना होगा
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राजसूय। पंचायत चुनाव की तैयारियां भी शुरू हो गई है। गांवों की सरकार बनेगी तो निर्धारित कोटे के अनुसार महिलाओं के लिए रिजर्व सीटों पर महिलाएं चुनाव लड़ेंगी और जीतकर पंचायत और परिषद से अपने-अपने क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करेगी, लेकिन गांव में चुनी जाने वाली सरकारों में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक आरोप कोई भी लगा सकता है कि भले ही कोई भी महिला जीते, सरपंची तो सरपंच पति ही चलाएगा। जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। अगर महिलाओं को अपना आरक्षण लाभ मिला है तो उन्हें सबसे पहले अपने उस पद की गरिमा के लिए काम करना चाहिए, जो उन्हें मिला है। अगर उन्हें पंच, सरपंच या डायरेक्टर बनाया गया है तो किसी भी सूरत में अपने पद की गरिमा से समझौता नहीं करना चाहिए। पद की गरिमा इसी में है कि उन्हें जिस पद के लिए वोट मिले हैं, उस पद के दायित्व का निर्वहन खुद करे। अगर कोई बात समझ में नहीं आए तो समझने में कोई बुराई नहीं है। यह समझाने के लिए पति, भाई पिता, रिश्तेदार या कि अधिकारी हो सकते हैं। सरकार समय-समय प्रबोधन शिविर भी लगाती है, जिसमें नए जनप्रतिनिधियों को बताया जाता है कि उन्हें कैसे काम करना है। उनके अधिकार क्या है और किस तरह से प्रस्ताव तैयार किए जाते हैं। लेकिन यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी नहीं है महिलाओं को अपने पद की गरिमा का अहसास सिर्फ गांवों में ही नहीं है। शहरों में भी ऐसे ही हालात है। पिछले दिनों अखबारों में ऐसे फोटो आए थे, जिनमें महापौर का काम भी उनके पति कर रहे थे और महापौर मोबाइल चला रही थी। इससे साफ जाहिर हो रहा था कि उक्त महिला को न तो अपने पद की गरिमा का याल था और न काम करने में रुचि। ऐसी महिलाएं चाहे गांव में हो या शहर में, महिलाओं को आगे लाने के प्रयास में सफलता नहीं दिला सकती। इस बार निकाय चुनावों में कुछ युवतियों ने भी चुनाव लड़ा और जीत भी हासिल की। ये युवातियां शिक्षित भी थीं। इस तरह की युवतियों का राजनीति में आना अच्छी बात है। शिक्षित युवतियां समय पर गांव या शहर की राजनीति में हिस्सेदारी करे तो आने वाला समय और अधिक संभावनाशील बनेगा, क्योंकि युवतियां अपने पद की गरिमा का पालन करते हुए क्षेत्र में विकास करवाएगी।
लेकिन सबसे पहले अपनी बेडिय़ों को खुद खोलना होगा। पहला संकल्प तो यही लेना होगा कि भले ही पति, पिता या भाई महिला जनप्रतिनिधि को राजनीति से लेकर विकास कार्यों की प्रक्रिया को बताए, लेकिन बोलने का अवसर जनप्रतिनिधि को ही मिले। बैठकों में खुद बात कहे और अधिकारियों से सीधे संवाद स्थापित करे ताकि कोई सीधा जवाब पूछे तो दे दिया जा। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में राजस्थान के मुख्यमंत्री ने भी एक लाभान्वित महिला के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के दौरान घूंघट हटाने के लिए कहा था, जिससे यह जाहिर होता है कि सरकार भी महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए कटिबद्ध है। हमें सरकार की मंशा को समझना चाहिए और यह गलत भी नहीं है कि महिलाएं राजनीति में अपनी सक्रिय भागीदारी करे, क्योंकि जब महिलाएं राजनीति की मुख्ंयधारा में आएंगी तो दूसरी महिलाओं को भी समझा पाएगी कि सरकार क्या करती है और क्या नहीं।
लेखक
गायत्री शर्मा
राजसूय की संपादक