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राजस्थानी: डाॅ.प्रकाशदान चारण री राजस्थानी आलोचना पोथी ' नूंई कविता : दीठ अर दरसाव ' लोकरपित

Oct 26, 2026 Super Admin

डाॅ.प्रकाशदान चारण री राजस्थानी आलोचना पोथी ' नूंई कविता : दीठ अर दरसाव ' लोकरपित
राजसूय
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राजसूय,

पाठक री चेतना नै आलोकित करणौ ई आलोचना है : प्रोफेसर अर्जुनदेव चारण 


आलोचना साहित्य री रचनात्मकता में बधापौ करै : डाॅ.मदन सैनी 


डाॅ.चारण राजस्थानी वैचारिकी नै नवी पहचांण दीवी : डाॅ.गजेसिंह राजपुरोहित 


साहित्यिक आलोचना फगत किणी रचना रै गुण-दोष री विरोळ इज नीं है बल्कि साहित्य री अंतरवस्तु, संवेदना अर वैचारिक पख नै समझण अर उणनै व्यापक परिपेख में देखण री अेक सारथक प्रक्रिया है। जिण भांत आलोक अंधकार नै अळगौ कर वस्तुवां रै साचा सरूप नै सांम्ही लावै ठीक उणी ’ज भांत सारथक आलोचना किणी साहित्यिक रचना री अंतरनिहित संवेदना,विचारधारा, सिल्प अर जीवण-दीठ नै उद्घाटित करै। आलोचना रौ काम रचना माथै कोई निरणै थोपणौ नीं बल्कि उणरै अरथ-संसार नै समझण रा नवा मारग खोलणौ है। अै विचार ख्यातनाम कवि-आलोचक प्रोफेसर (डाॅ.) अर्जुनदेव चारण सूर्य प्रकाशन मंदिर रै तत्वावधान में होटल चन्द्रा इन में आयोजित डाॅ. प्रकाशदान चारण रचित राजस्थानी आलोचना पोथी ' नूंई कविता : दीठ अर दरसाव ' रै लोकारपण समारोह में आपरै अध्यक्षीय उदबोधन में व्यक्त करिया। वे कह्यौ कै असल में आलोचना वा है, जको साहित्य नै समझण री नवी दीठ देता थकां पाठक री चेतना नै आलोकित करै ।  

सारस्वत मिजमान राजस्थानी रा प्रतिष्ठित विद्वान डाॅ.मदन सैनी कह्यौ-  साहित्य में सिरजण करणौ आसान है पण उणरी आलोचना करणौ दोरौ काम है । वे कह्यौ के आ बात अेकदम पर सही है कै आलोचना साहित्य री व्यापकता अर रचनात्मकता में बधापौ करै। विसिष्ट मिजमान कवि-आलोचक डाॅ.गजेसिंह राजपुरोहित कह्यौ- कै देस री आजादी रै पछै राजस्थानी भासा-साहित्य में वैचारिकी री कमी रैयी पण इक्कीसवीं सदी रै सरुआत में डाॅ.अर्जुनदेव चारण राजस्थानी आलोचना नै जको नवी दीठ अर दसा प्रदान करी वा घणी अंजसजोग है। इणी ’ज कड़ी में डाॅ. प्रकाशदान चारण आपरै आलोच्य धरम रौ ईमानदारी सूं निरवाह करता थकां आधुनिक राजस्थानी साहित्य रै बारह कवियां री काव्य-साधना नै प्रवृत्तिगत दीठ सूं प्राथमिकता देता थकां आलोचना रै खेतर में बोत ई महताऊ काम करियौ है। वे कह्यौ कै निस्चै ई डाॅ. प्रकाशदान चारण री इण आलोचना पोथी सूं राजस्थानी वैचारिकी नै भारतीय साहित्य में अेक नवी पहचांण मिळैला। कवि-आलोचक डाॅ. प्रकाशदान चारण लोकारपित आलोचना पोथी रै विसय में बात राखता थकां कह्यौ कै साहित्य में अेक आलोचक नै आलोचना करणा सूं पैलां आलोचना परम्परा अर चुनौतियां नै भलीभांति समझ 'र ईमानदारी सूं लिखणौ चाहीजै। राजस्थानी  रचनाकार आशीष पुरोहित लोकारपित पोथी माथै पत्रवाचन करता थकां कह्यौ कै आलोचना री दीठ सूं आ पोथी घणी महताऊ है । 

समारोह रै सरुआत में मां सुरसत नै चोसरौ पैराय 'र घी रौ दीवौ जळायौ। समारोह आयोजक डाॅ. प्रशांत बिस्सा स्वागत उदबोधन रै सागै ई राजस्थानी परम्परा मुजब मिजमानां नै साफौ पैराय 'र स्वागत - सत्कार करियौ । समारोह संयोजन इजि. कुसुमलता सगळा रौ आभार ग्यांपित करता थकां आपरै अंतस री बात उजागर कीनी । कार्यक्रम रौ सरस संचालन डाॅ. चन्द्रभान बिश्नोई करियौ।  

इण अंजसजोग अवसर माथै मानीता रचनाकार प्रोफेसर सोहनदान चारण, प्रोफेसर कौशलनाथ उपाध्याय, प्रोफेसर अरविन्द परिहार, डाॅ.पद्मजा शर्मा, डाॅ. संजय व्यास,श्री मीठेश निर्मोही, श्री मोहनसिंह रतनू, श्री कमलेश शर्मा, श्री भंवरलाल सुथार, श्री दशरथ कुमार सोलंकी, श्री विष्णुदत्त दवे, श्री बी.एल.जाखड़, श्री हरिप्रकाश राठी, डाॅ.मनीषा डागा, श्रीमती रैणु वर्मा,श्रीमती वीणा चूण्डावत, श्रीमती रेणुका श्रीवास्तव, डाॅ. श्रवणदान शुन्य, श्री कल्याण बिश्नोई, तरनीजा मोहन राठौड़,श्री खेमकरण लालस,श्री रौनक श्रीमाली, सुश्री कीर्ति परिहार, श्री रामकिशोर फिड़ोदा, डाॅ.लक्ष्मी भाटी, श्री ब्रजेश अम्बर, श्रीमती निर्मला राठौड़, श्रीमतीसुमन राठौड़, डाॅ.जितेंद्रसिंह साठीका, श्रीगौतम गुटस, डाॅ.अमित गहलोत, डाॅ.दिव्यासिंह, श्रीचण्डीदान चारण, डाॅ.संदीप कुमावत, डॉ.कैलाश सोनगरा, डाॅ.भीमराज निर्मल, श्री योजित, सुश्री अवनी सागै कैई विद्वान लेखक, साहित्य-प्रेमी, शोध-छात्र अर पढेसर मौजूद रैया।

 

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