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संस्कृतियों के मिलने से बीकानेर को मिला दशहरा, रामलीला और गरबा
पंजाब, बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश से बीकानेर आए लोगों के प्रभाव से बीकानेर में होने लगे जगराते, दुर्गापूजा
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राजसूय। वक्त के बदलाव के साथ ही संस्कृतियों का आदान-प्रदान किस तरह से होता है, इसे अगर देखना हो तो बीकानेर को देखा जा सकता है, जहां आजादी से पहले न तो रामलीला होती थी और न रावण का दहन होता था। दुर्गापूजा का तो प्रचलन ही नहीं था। सत्तर के दशक में ब्रह्मकुमारीजी की प्रदर्शनियों में सचेतन झांकियां रतन बिहारी पार्क में होती थी। बंगाल से आए परिवारों द्वारा रानी बाजार स्थिति बंगाली मंदिर में दुर्गापूजा होती थी, जिसमें प्रतीकात्मक बलि देने की परंपरा की पालना भी होती थी, लेकिन यह भी बीकानेर रियासत काल में आए बंगाली परिवारों से शुरू किया। हालांकि, यहां देवी का बड़ा स्थान था। नवरात्र के दौरान घर-घर में घटस्थापना होती थी। नवाह्न पारायण होते थे। देवी सप्तशती के पाठ चलते रहते थे, जो धीरे-धीरे घर की चारदीवारी से निकलकर मानस प्रचार समितियों में तब्दील हो गए।
बीकानेर रियासत में कुलदेवी की रूप में नागणेचीजी माता का मंदिर आस्था का बड़ा केंद्र रहा तो देशनोक की करणीमाता की याति भी दूर-दूर तक फैली हुई रही। शिव और शक्ति के साधकों से भरे बीकानेर में उपासना स्थलों की कोई कमी नहीं रही, लेकिन आजादी के बाद जैसे-जैसे बीकानेर में दूसरे राज्यों से लोग आजीविका के लिए आने लगे, अपनी संस्कृतियों के चिह्न भी साथ लाए जो आज बीकानेर की माटी में रच-बस गए हैं।
कहीं देवी के जगराते होते हैं, जो बीकानेर में पंजाबी समाज की देन है। पंजाबी समाज ने बीकानेर में दशहरा मनाने की परंपरा शुरू की, जो आज तक जारी है। बीकानेर का दशहरा राजस्थान में कोटा के दशहरे के बाद बड़े आयोजनों में माना जाता है। बीकानेर के करणीसिंह स्टेडियम, पॉलिटेक्नीक कॉलेज मैदान और धरधीधर मैदान में दशहरे के बड़े आयोजन होते हैं।
दुर्गापूजा के पांडाल सजे हुए हैं, जो बंगाल और बिहार के परिवारों के यहां रहने के बाद शुरू हुए। खासतौर से औद्योगिक क्षेत्र से शुरू हुए दुर्गापूजा महोत्सवों में अब गुजराती संस्कृति के प्रभाव से गरबा के आयोजन भी होने लगे हैं। बीकानेर शहर के बड़े-बड़े खेल मैदान गरबा के लिए बुक होने लगे हैं। आसपास के कस्बों में भी नवरात्र के दौरान गरबा होने लगे हैं। इसी दौरान रामलीलाएं भी होने लगी। माना जाता है रेलवे की नौकरी में उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश से आए कार्मिकों ने यहां रामलीला शुरू की। लालगढ़ की रामलीला एक समय में काफी प्रसिद्ध हुआ करती थी। फिर शहरों कई जगह पर रामलीला शुरू हुई, लेकिन नियमितता नहीं रही। बहुत कम आयोजक रामलीला का आयोजन नियमित कर पाए। लगभग दस दिन चलने वाले इस आयोजन में पारसी थिएटर की याद ताजा हो जाती है। इस रास्ते से बीकानेर के रंगकर्म को अनेक कलाकार मिले।
1956 से मनाया जा रहा है बीकानेर में दशहरा
बीकानेर में दशहरा उत्सव 1956 से मनाया जा रहा है। मैंने बीकानेर में हुआ पहला दशहरा देखा है। उस समय आर्काइव्ज ऑफिस क्षेत्र में रावण चौक हुआ करता था, जहां 1951 में पहली बार पंजाबी समाज ने दशहरा उत्सव का कार्यक्रम रखा। रावण को तीर मारने के उस समय के महाराज करणीसिंह पधारे थे। अगली बार से स्टेडियम में यह आयोजन होने लगा। रावण परिवार के पुतले बनाने के लिए उत्तर प्रदेश से कारीगर आते हैं। जनता की मांग को देखते हुए बीकानेर में तीन स्थानों पर अब रावण दहन होने लगा है। इस दौरान निकलने वाली झांकियों में भी नवाचार होते हैं।
- सुभाष भोला
संस्थापक महासचिव,
रामलक्ष्मण दशहरा कमेटी
जनसहयोग से चलती है रामलीला
बीकानेर शहरी क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही श्रीराम कला मंडल की रामलीला के प्रति लोगों का उत्साह है। कलाकार एक महीने पहले से ही रिहर्सल करने लगते हैं। यह आयोजन जन सहयोग से होता है। बड़ी संख्या में हर दिन यहां भीड़ उमड़ती है। अगर इस आयोजन के लिए प्रशासन समय रहते सहयोग कर दे तो हम और अधिक बेहतर आयोजन कर सकते हैं।
- गिरिराज जोशी, पार्षद
ग्यारह दिन होती है रामलीला
पिछले तीस सालों से रामलीला में भागीदारी कर रहा हूं। कभी छोटे-छोटे रोल निभाया करता था, अब श्रीराम कला मंदिर द्वारा लक्ष्मीनाथ पार्क में होने वाली रामलीला के निर्देशन का दायित्व है। रामलीला में प्रॉ प्टर की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। हम यहां ग्यारह दिन तक रामलीला का मंचन करते हैं। कुछ स्थानों पर दस दिन रामलीला चलती है। रामलीला का चार स्क्रिप्ट मिलती है। हम लोगों ने चारों को मिलाकर कथानक तैयार किया है।
- अभिराम गौड़, रामलीला निर्देशक
लेखक
हरीश बी शर्मा
पत्रकारिता का लंबा अनुभव। दैनिक भास्कर सहित लोकमत, निर्भय कलम, लॉयन एक्सप्रेस आदि अखबारों में बतौर पत्रकार कार्य किया। राजसूय के सलाहकार संपादक। राजसूय के संस्थापकों में से एक।