मुद्दा
ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा बनाम देश में निष्पक्ष चुनाव
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का मुद्दा इन दिनों गरमाया
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राजसूय। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का मुद्दा इन दिनों गरमाया हुया है। दरअसल पिछले कुछ समय से चुनाव आयोग विपक्ष के निशाने पर था। विपक्ष का मानना है कि चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा को गिराने से देश की पूरी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठ खड़ा होगा। साथ ही जनादेश भी इस तरह कटघरे में लिया जा सकेगा। विपक्ष इस समय एक और नया नरेटिव बना रहा है कि देश में चुनाव निष्पक्ष नहीं होते। तथ्य है कि पिछले दस महीनों के दौरान दोनों चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने चौदह बार अलग-अलग मुद्दों पर अपना विरोध दर्ज किया है।
यानि एक तरीके से कहा जा सकता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तानाशाही रवैया रखते हैं। जबकि एक और तथ्य यह भी है कि भारतीय चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत तय की गई है। संविधान के लिखे जाने के समय चुनाव आयोग एक एकल सदस्य कमीशन था। सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त ही होता था जिसके नाम की प्रधान मंत्री अनुशंसा करते थे और राष्ट्रपति उसकी नियुक्ति करते थे। 1950 से 1993 तक यही व्यवस्था निर्बाध रूप से बनी रही। लेकिन 1993 में कुछ ऐसा हुया कि चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय आयोग बना दिया गया। हुया यूं कि प्रधान मंत्री नरसिंहा राव को चुनाव आयुक्त टी एन शेषन का कार्य करने का तरीका पसंद नहीं था। इस कारण से उन्होनें चुनाव आयोग का स्वरूप बदल कर बहु-सदस्यीय बना दिया।
लेकिन ऐसा हो जाने के बावजूद टी एन शेषन ने वीटो का अधिकार मुख्य चुनाव आयुक्त होने के नाते स्वयंभू ही खुद को दे दिया। यह विवाद जब सुप्रीम कोर्ट के सामने आया तो सुप्रीम कोर्ट ने वीटो के इस अधिकार को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार तीनों चुनाव आयुक्त अधिकार में बराबर हैं सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त फर्स्ट अमंग इक्वल्स हैं यानि बराबरी में प्रथम हैं। अब प्रश्न यह था कि चुनाव आयोग में फैसला कैसे होगा? तो तय यह पाया गया कि या तो फैसला आम सहमति से होगा और ऐसा न होने पर फैसला बहुमत से होगा।
यानि अगर दो चुनाव आयुक्त एक फैसला कर लें तो वह लागू होगा। और तीन में से दो चुनाव आयुक्त चाहें तो किसी भी फैसले को रद्द भी करवा सकते हैं फिर चाहे मुख्य चुनाव आयुक्त उस फैसले के खिलाफ या पक्ष में ही क्यों न हों। अब अगर चुनाव आयुक्त किसी फैसले को लेकर ऐतराज कर रहे हैं तो इसका सीधा अर्थ ये है कि या तो वे चुनाव आयोग की कार्य पद्धति से अनजान हैं या फिर वे गलतबयानी कर रहे हैं। अगर दो चुनाव आयुक्त संधु और जोशी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के के किसी प्रस्ताव के खिलाफ थे तो वे उसके खिलाफ प्रस्ताव ला कर उसे गिरा सकते थे, इसक अधिकार उन्हें चुनाव आयोग देता है।
लेकिन इस बात का कोई प्रमाण अब तक सामने नहीं आया है कि ज्ञानेश कुमार ने जो नियम बनाने की कोशिश की उसके खिलाफ दोनों चुनाव आयुक्तों ने कोई प्रस्ताव पेश किया था। चुनाव आयोग ने जो स्पष्टीकरण जारी किया गया है उसमें स्पष्ट है कि पिछले एक साल के दौरान हुए सभी फैसले चुनाव आयोग में सर्वसम्मति से लिए गए हैं। गौरतलब है कि एसआईआर का फैसला भी इसी दौरान लिया गया था जिसे लेकर विवाद सबसे पहले शुरू हुया था। इसके अतिरिक्त अगर चुनाव आयोग के भीतर कोई विवाद उठ खड़ा होता है या कोई काम संविधान की व्यवस्था के विरुद्ध हो रहा हो तो इसकी सूचना राष्ट्रपति को देनी होती है।
अतीत में इसका उदाहरण मिलता है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपाल स्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला के खिलाफ 14 पत्र राष्ट्रपति को लिखे थे जिनमे उन्होनें नवीन चावला के कामकाज को संदेहजनक बताया था। उन्होनें स्पष्ट लिखा था कि चुनाव आयोग की मीटिंग के दौरान वे बीच में से उठ कर बाहर जाते हैं और किसी को फोन करते हैं। आरोप था के वे 10 जनपथ में फोन कर के मीटिंग की पूरी जानकारी देते थे। एन गोपाल स्वामी ने राष्ट्रपति को सुझाव दिया था कि इस व्यक्ति को किसी भी जिम्मेदारी के पद पर नहीं बनाए रखना चाहिए।
शाह कमिशन ने भी यही रिपोर्ट किया था। लेकिन फिर सरकार बदली और काँग्रेस की सरकार आने पर नवीन चावला मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिए गए। लेकिन वो अतीत की बात है। वर्तमान में ऐसा नहीं किया गया, राष्ट्रपति तक कोई बात नहीं पहुंचायी गई बल्कि एक चुनाव आयुक्त ने कैबिनेट सचिव से इसकी रिपोर्ट की। एक और बड़ा सवाल यह उठाया गया है कि फॉर्म 6 में किया गया संशोधन संविधान विरुद्ध है। विवेक जोशी के अनुसार यह संशोधन चुनाव आयोग नहीं बल्कि सरकार कर सकती है। बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान सुप्रीम कोर्ट में भी यह मुद्दा उठाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग ने फॉर्म 6 के संशोधन के संबंध में जो फैसला लिया है वह पूर्णतः संविधान सम्मत है और चुनाव आयोग का यह संवैधानिक अधिकार है।
गौरतलब यह भी है कि स्वतंत्रता के बाद से देश में एसआईआर दसवीं बार हो रहा है। इससे पहले यह 2003 में किया गया था। इस मुद्दे को ठीक से समझने के लिए हम एसआईआर की फुल फॉर्म जानें: स्पेशल इन्टेन्सिव रिवीज़न ऑफ इलेक्टोरल रोल्स यानि मतदाता सूची का शुद्धिकरण। जो लोग गुजर चुके हैं उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जाएं, जिनके दो या अधिक जगह मतदाता सूची में नाम हैं उन्हें वर्तमान स्थान की सूची के अतिरिक्त अन्य जगह से हटा दिया जाए। यानि असली मुद्दा कुछ और ही है। असली मुद्दा है पश्चिम बंगाल से बांग्लादेश वासियों के बड़ी संख्या में हुए पलायन को जो एसआईआर की प्रक्रिया के चलते देखा गया। इतनी बड़ी संख्या में हुई वोटरों के हानि के लिए विपक्ष चुनाव आयोग को जिम्मेदार मानता है, इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त को निशाना बनाया गया है।
अब चूंकि पिछले एक साल के दौरान चुनाव आयोग द्वारा लिए गए किसी भी फैसले के दौरान कोई विवाद नहीं हुया और न ही किसी भी मुद्दे पर वोटिंग की गई तो स्पष्ट है कि हर फैसला सर्वसम्मति से हुया है। अब सवाल यह उठता है कि अगर दो चुनाव आयुक्त आयोग के किसी फैसले से सहमति नहीं रखते थे तो वे उस पर सवाल उठा कर उसे रद्द करवा सकते थे। लेकिन ऐसा कुछ हुया हो इसका प्रमाण नहीं मिला है। बल्कि चर्चा के बाद आम सहमति बनी और सर्वसम्मति से फैसले लिए गए। ऐसा हर संस्थान में होता है। जब भी कोई बड़ा निर्णय होता है तो चर्चा और वाद विवाद के बाद ही सर्वसम्मति अन्यथा बहुमत से फैसला लिया जाता है और अंतिम फैसला ही महत्वपूर्ण होता है।
इन सब बातों पर गौर करें तो दिखायी पड़ता है कि ज्ञानेश कुमार को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि विपक्ष को लगने लगा है कि यह चुनाव आयुक्त देश में निष्पक्ष चुनाव करवाने पर आमादा हैं और इस तरह विपक्ष चुनाव नहीं जीत पाएगा। विपक्ष पूरी तरह से इसी कोशिश में लगा हुया है। अब देखना ये है कि 2 अक्टूबर से शुरू होने वाले प्रस्तावित सीजेपी के जेल भरो आंदोलन का क्या हश्र होता है जिसमे अभिजीत दीपके ने प्रमुख मांग के तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है साथ ही एसआईआर को रोकने और चुनाव आयोग के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा समीक्षा किये जाने की मांग रखी है। क्या एक बार फिर केंद्र सरकार झुकेगी?
लेखक
प्रितपाल कौर
एनडीटीवी की रिपोर्टर के रूप में अर्से तक काम करने वाली प्रितपाल कौर दिल्ली की पत्रकार हैं। पत्रकारिता और साहित्य लेखन का लंबा अनुभव। राजसूय की दिल्ली ब्यूरो प्रमुख।