मुद्दा
मुद्दा: वोट चोरी का मुद्दा उछालकर विपक्ष ने अभी से बिछाई बिसात
2027 में होने वाले चुनावों के सेमीफाइनल ने मोदी सरकार के सामने खड़ी की सियासी चुनौतियां
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राजसूय। भारतीय राजनीति में वर्ष 2027 को आगामी लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। सात राज्यों के संभावित विधानसभा चुनाव और जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के कारण यह साल राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए और कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के लिए यह केवल राज्यों की सत्ता का सवाल नहीं होगा, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव की रणनीति और राजनीतिक दिशा तय करने का अवसर भी होगा। कांग्रेस और इंडिया गठबंधन में शामिल समाजवादी पार्टी तथा आम आदमी पार्टी सहित विभिन्न विपक्षी दलों ने अपनी राजनीतिक गतिविधियां तेज कर दी हैं। आप इसको इस एंगल से भी देख सकते हैं कि लोकसभा के चुनाव 2024 में हुए थे। कांग्रेस 100 सीटों के अंदर सिमट के रह गई लेकिन उसने उस समय वोट चोरी का मुद्दा नहीं उठाया जबकि आज वर्ष 2026 के अंत में वोट चोरी का मुद्दे जोर शोर से उठाया जा रहा है क्योंकि 2027 में अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस इसको सेमीफाइनल मैच मान रही है उनको तथा समस्त विपक्षी दलों को लग रहा है कि यदि 2027 के विभिन्न राज्यों में होने वाले चुनाव में भाजपा व उसका एनडीए कुनबा हारता है तो फिर लोकसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता से हटाना आसान हो जाएगा। दूसरी ओर, भाजपा के सामने अपनी चुनावी बढ़त बनाए रखने, सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने और विपक्ष के हमलों का जवाब देने की चुनौती होगी। ऐसे में आने वाले महीनों में राजनीतिक बयानबाजी, विरोध-प्रदर्शन और जनहित के मुद्दों पर टकराव बढऩे की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। आने वाले महीनों में दिल्ली एक बार राजनीतिक बयानबाजियों, धरना प्रदर्शन का सबसे बड़ा केंद्र रहेगी।
वोट चोरी का मुद्दा इतनी देरी से क्यों लाया गया, ये भी बड़ा सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि लोकसभा चुनाव 2024 में संपन्न हो गए थे मगर उसे समय विपक्ष ने वोट चोरी का मुद्दा नहीं उठाया और अब 2026 में इसे उठाया जा रहा है क्योंकि 2027 की शुरुआत से ही अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है। इसलिए विपक्ष जानबूझकर इस मुद्दे को हवा दे रहा है और चुनाव आयोग के निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है। यह विपक्ष की कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी पार्टियों के रणनीति का हिस्सा है विपक्ष की राजनीति में मतदाता सूची, चुनाव प्रक्रिया और कथित वोट चोरी के आरोप प्रमुख मुद्दों के रूप में उभरे हैं। कांग्रेस सहित विपक्षी दल इन मुद्दों को लेकर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। वहीं, भाजपा और सरकार की ओर से विपक्ष के आरोपों का विरोध किया जाता रहा है। राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या ये मुद्दे केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहेंगे या इनके समर्थन में प्रस्तुत किए जाने वाले तथ्य, चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े सवाल और संस्थागत जवाबदेही की मांग व्यापक जनचर्चा का हिस्सा बनेंगे। विपक्ष के लिए इन मुद्दों को जनता के बीच प्रभावी ढंग से उठाना चुनौती होगी, जबकि चुनाव आयोग और सरकार के सामने पारदर्शिता तथा चुनाव प्रक्रिया पर जनता के भरोसे को बनाए रखने का सवाल रहेगा। हालांकि, किसी राजनीतिक दल की मंशा को लेकर निष्कर्ष निकालने के बजाय आरोपों और उनके जवाबों का आकलन उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
सात राज्यों में होगी सभी दलों की बड़ी परीक्षा
वर्ष 2027 में सात राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव प्रस्तावित हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में फरवरी-मार्च के आसपास चुनाव होने की संभावना है, जबकि हिमाचल प्रदेश और गुजरात में वर्ष के अंतिम महीनों में चुनाव हो सकते हैं। हालांकि, मतदान की तारीखों की आधिकारिक घोषणा चुनाव आयोग द्वारा ही की जाएगी। विभिन्न विधानसभाओं के होने वाले राज्यों के लिए ये चुनाव राजनीतिक दलों के लिए व्यापक जनसमर्थन की परीक्षा होंगे। इनमें उत्तर प्रदेश की 403 सीटें सबसे अधिक महत्वपूर्ण होंगी। इसके अलावा पंजाब की 117, उत्तराखंड की 70, गोवा की 40, मणिपुर की 60, हिमाचल प्रदेश की 68 और गुजरात की 182 सीटें शामिल हैं। इन चुनावों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक परिस्थितियां, स्थानीय मुद्दे और मतदाताओं की प्राथमिकताएं अलग हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा और विपक्षी गठबंधनों के बीच मुकाबले पर राष्ट्रीय राजनीति की नजर रहेगी। पंजाब में आम आदमी पार्टी के सामने अपनी सरकार के कामकाज के आधार पर जनता के बीच जाने की चुनौती होगी। वहीं, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भी सत्ता पक्ष तथा विपक्ष अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में उतरेंगे।
राष्ट्र्रपति चुनाव भी बढ़ाएगा राजनीतिक सरगर्मी
वर्ष 2027 में राष्ट्रपति चुनाव भी होना है। भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कार्यकाल 24 जुलाई 2027 तक है। राष्ट्रपति का चुनाव निर्वाचक मंडल करता है, जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य तथा राज्यों और संबंधित केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। फिलहाल इतना तय है कि 2027 की चुनावी बिसात पर सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को अपनी रणनीति साबित करनी होगी। एक ओर सरकार के सामने अपने कामकाज और नीतियों के आधार पर जनता का भरोसा बनाए रखने की चुनौती होगी, तो दूसरी ओर विपक्ष को आरोपों से आगे बढ़कर विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करना होगा। तब तक दिल्ली में धरना प्रदर्शन जारी रहेंगे।
लेखक
प्रमोद आचार्य
दैनिक भास्कर से जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद आचार्य इन दिनों उदय भास्कर का संपादन कर रहे हैं। पत्रकारिता का लंबा अनुभव।