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हाई शुगर है दिल के लिए भी खतरे का संकेत

केवल अतिरिक्त वसा नहीं ,अतिरिक्त शुगर भी कारण है हृदय रोगों का

हाई शुगर है दिल के लिए भी खतरे का संकेत
राजसूय
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राजसूय। लंबे समय तक अनियंत्रित मधुमेह केवल रक्त में शुगर बढ़ाने वाली स्थिति नहीं है, बल्कि यह धीरे-धीरे पूरे हृदय-रक्तवाहिका तंत्र को प्रभावित कर सकती है। जब रक्त शुगर लगातार सामान्य से बहुत अधिक रहती है, तो रक्त वाहिकाओं की आंतरिक परत पर मेटाबॉलिक स्ट्रेस बढ़ता है। इसके साथ इंसुलिन रेजिस्टेंस, रक्त में वसा के असामान्य स्तर, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और दीर्घकालिक सूजन जैसी प्रक्रियाएँ जुड़ जाती हैं। 

वसा में कैसे बदलती है हाई ब्लड शुगर??

भोजन से प्राप्त कार्बोहाइड्रेट ग्लूकोज़ में बदलते हैं और शरीर इसका उपयोग ऊर्जा के लिए करता है। कुछ ग्लूकोज़ ग्लाइकोजन के रूप में संग्रहित होता है। लेकिन जब ऊर्जा की आवश्यकता की तुलना में ग्लूकोज़ और कुल ऊर्जा की उपलब्धता लगातार अधिक रहती है, विशेषकर इंसुलिन प्रतिरोध की स्थिति में, तो यकृत अतिरिक्त कार्बोहाइड्रेट से वसा बनाने की प्रक्रिया बढ़ा सकता है। इस प्रक्रिया से फैटी एसिड और ट्राइग्लिसराइड बनते हैं तथा यकृत इन्हें विभिन्न लिपोप्रोटीन कणों (LDL, VLDL) के रूप में रक्त में भेजता है। इसलिए लंबे समय तक अनियंत्रित मधुमेह में केवल रक्त शुगर ही नहीं, बल्कि वसा का चयापचय भी असंतुलित होने लगता है। हालाँकि यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि रक्त की सारी अतिरिक्त शुगर सीधे जाकर धमनी में वसा के रूप में जमा हो जाती है। वास्तविक प्रक्रिया अधिक जटिल है—अधिक शुगर, इंसुलिन प्रतिरोध और असामान्य वसा-चयापचय मिलकर हृदय के विकारों के लिए अनुकूल वातावरण बनाते हैं।

रक्तवाहिका की पहली चोट कहाँ से शुरू होती है?

रक्तवाहिका की आंतरिक परत पर उच्च रक्त शुगर, उच्च रक्तचाप तथा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण सूक्ष्म क्षति या घाव हो जाता है। इस क्षतिग्रस्त स्थान पर वसा के कण (LDL AND VLDL) रक्तवाहिका की दीवार में प्रवेश कर सकते हैं और ऑक्सिडाइज्ड होकर वहां सूजन उत्पन्न करते हैं। प्रवाहित होने वाले रक्त में उपस्थित श्वेत रक्त कणिकाएं WBC इन परिवर्तित वसा-कणों को ग्रहण करके फोम कोशिकाओं में बदल जाती हैं। धीरे-धीरे वसा, कोलेस्ट्रॉल, मृत कोशिकीय पदार्थ और रेशेदार ऊतक जमा होकर एथेरोस्क्लेरोटिक पट्टिका का निर्माण करते हैं। यही प्रक्रिया आगे चलकर धमनी के संकुचन और रक्त प्रवाह में कमी का आधार बनती है।  यहीं से हृदय की रक्त वाहिका में ब्लॉकेज या एथेरोसिलेरोसिस की नींव पड़ती है। जैसे-जैसे पट्टिका बढ़ती है, धमनी के अंदर रक्त के लिए उपलब्ध स्थान कम होने लगता है। यदि यह प्रक्रिया हृदय की कोरोनरी धमनियों में हो, तो हृदय की मांसपेशी तक पहुँचने वाले रक्त और ऑक्सीजन की मात्रा कम हो सकती है।

कैसे होता है रक्त वाहिका में कैलशिफिकेशन??

एथेरोस्क्लेरोसिस के आगे बढ़ने के साथ पट्टिका के भीतर कोशिकीय क्षति, स्वेलिंग और डेड टिश्यू जमा होते रहते हैं। इसी परिवर्तित वातावरण में कैल्सीफिकेशन की प्रक्रिया विकसित हो सकती है। इसलिए हृदय की धमनियों में कैल्शियम का जमाव केवल भोजन में कैल्शियम अधिक लेने का परिणाम नहीं माना जाना चाहिए। यह प्रायः पहले से मौजूद एथेरोस्क्लेरोटिक पट्टिका के भीतर होने वाली जटिल जैविक प्रक्रिया का हिस्सा है। रक्तवाहिका की चिकनी पेशी कोशिकाओं में भी ऐसे परिवर्तन हो सकते हैं जिनसे वे अस्थि-निर्माण करने वाली कोशिकाओं ओस्टियोब्लास्ट्स जैसी विशेषताएँ प्राप्त करने लगती हैं और कैल्शियम-फॉस्फेट जैसे खनिज पदार्थों के जमाव को बढ़ाने लगती है। अर्थात धमनी में कैल्शियम का जमाव एक सक्रिय जैविक प्रक्रिया है, जिसमें मधुमेह से उत्पन्न उच्च शुगर, ऑक्सीडेटिव तनाव और सूजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्वस्थ धमनी लचीली होती है। वह रक्तचाप में होने वाले उतार-चढ़ाव के साथ फैल और सिकुड़ सकती है। लेकिन जब धमनी की दीवार में कैल्सीफिकेशन बढ़ता है, तो उसकी लोच कम हो सकती है और वह कठोर होने लगती है। यहाँ दो प्रक्रियाएँ एक साथ चलती हैं। जहां एक ओर धमनी के अंदर का मार्ग संकरा करती है। वहीं दूसरी और धमनी की दीवार को कठोर और कम लचीला बनाता है। इसीलिए हृदय की धमनियों में कैल्शियम का बढ़ना केवल एक अलग समस्या नहीं है, बल्कि अक्सर लंबे समय से चल रहे मधुमेह तथा एथेरोस्क्लेरोटिक रोग का संकेत होता है।

ब्लॉकेज आखिर कैसे बनती है?

पट्टिका धीरे-धीरे बढ़ती जाती है तो धमनी का अंदरूनी मार्ग संकरा हो सकता है। रक्त को संकरी जगह से गुजरने में अधिक कठिनाई होती है और हृदय की मांसपेशी तक पहुँचने वाले रक्त की मात्रा कम हो सकती है। शारीरिक परिश्रम के समय हृदय को अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। यदि संकरी धमनी उस आवश्यकता के अनुरूप रक्त नहीं पहुँचा पाती, तो सीने में दर्द या दबाव, साँस फूलना तथा अन्य लक्षण दिखाई दे सकते हैं। लेकिन समस्या यहीं समाप्त नहीं होती। कभी-कभी एथेरोस्क्लेरोटिक पट्टिका की सतह फट जाती है। इसके संपर्क में आने पर रक्त का थक्का बन सकता है और धमनी अचानक बहुत अधिक संकरी या पूरी तरह बंद हो सकती है। यही प्रक्रिया गंभीर कोरोनरी घटना या हृदयाघात का कारण बन सकती है।

डायबिटीज में यह प्रक्रिया अधिक गंभीर क्यों हो सकती है?

डायबिटीज में कई जोखिम एक साथ काम करते हैं। लगातार उच्च रक्त शुगर रक्तवाहिका को नुकसान पहुँचाती है वहीं दूसरी और इन्सुलिन रेजिस्टेंस की वजह से अतिरिक्त शर्करा वसा ट्राइग्लिसराइड तथा लिपॉप्रोटीन में बदलकर शरीर में जमा होने लगती है। यह अतिरिक्त जमा वसा कई प्रकार के विकारों का आधार बनती हैं। उच्च रक्तचाप, मोटापा, गुर्दे की बीमारी और धूम्रपान जैसे कारक जुड़ने पर रक्तवाहिकाओ  पर दबाव और बढ़ सकता है। इसलिए मधुमेह वाले व्यक्ति में हृदय की बीमारी को केवल रक्त शुगर के स्तर से समझना पर्याप्त नहीं है। रक्त शुगर, रक्तचाप, रक्त-वसा, शरीर का वजन और समग्र हृदय-जोखिम—सभी को एक साथ देखना आवश्यक है। इसलिए लंबे समय तक बहुत अधिक रहने वाली रक्त शुगर को केवल तत्काल मधुमेह नियंत्रण की समस्या नहीं, बल्कि भविष्य के हृदय-रक्तवाहिका जोखिम से जुड़ी स्थिति के रूप में देखना चाहिए। समय पर रक्त शुगर, रक्तचाप और रक्त-वसा का नियंत्रण तथा चिकित्सकीय हृदय-जोखिम मूल्यांकन इस पूरी प्रक्रिया को समझने और रोकथाम की रणनीति बनाने में महत्वपूर्ण हैं।

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डॉ.कविता शर्मा

लेखक

डॉ.कविता शर्मा

आहार और पोषण के विषय में होने वाले नवोन्मेषों से अवगत करवाने के लिए कॉलम 'न्यूट्री ट्रेंडसÓ लिख रहीं डॉ.कविता शर्मा अपने विषय में गोल्ड मैडलिस्ट है।

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