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नवरात्रि विशेष: थाली बोले...मन के भाव खोले!!
भोजन के त्रिगुण जो नियंत्रित रखते हैं शरीर, मन और चेतना का संतुलन
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राजसूय। नवरात्रि का पावन पर्व हमारे शरीर, मन और चेतना की शुद्धि का एक पौराणिक और आध्यात्मिक उत्सव है। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी आराधना के साथ विशेष प्रकार के भोजन और व्रत उपवास का धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्त्व भी है। भोजन की यह पद्धति धार्मिक मान्यताओं, संयम और सात्त्विकता से जुड़ी है। इस समय ऋतु परिवर्तन का भी विशेष प्रभाव पड़ता है। शरद ऋतु के आगमन पर दिन और रात के तापमान में अंतर, वातावरण की शुष्कता तथा संक्रमण की संभावना में बदलाव शरीर की अनुकूलन क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं, नवरात्रि के दौरान किए जाने वाले भोजन की मात्रा, विविधता और समय में परिवर्तन होने से ऊर्जा, जल तथा पोषक तत्त्वों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसलिए नवरात्रि का भोजन केवल धार्मिक परंपरा तक सीमित न रहकर ऋतु के अनुरूप हल्का, सुपाच्य, संतुलित और पौष्टिक होता है, ताकि आस्था के साथ स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जा सके।
जैसा आहार, वैसी प्रवृत्ति : भोजन और त्रिगुण
हमारा भोजन केवल शरीर को ऊर्जा और पोषण ही नहीं देता, बल्कि हमारी मनोदशा, व्यवहार और कार्यक्षमता को भी प्रभावित कर सकता है। भोजन में उपस्थित पोषक तत्त्व मस्तिष्क की कार्यप्रणाली, हार्मोनल संतुलन और तंत्रिका तंत्र के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में भोजन को केवल शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि मन और विचारों को प्रभावित करने वाला माध्यम भी माना गया है। सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भोजन की अवधारणा इसी दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें आहार और मानवीय प्रवृत्तियों के बीच संबंध स्थापित किया गया है
भारतीय दर्शन के अनुसार, सृष्टि की तरह भोजन को भी तीन गुणों (त्रिगुण) में वर्गीकृत किया गया है, जो हमारे व्यवहार, विचारों और मानसिक स्थिति को सीधे प्रभावित करते हैं।
(क) सात्विक भोजन — शांति, स्पष्टता और संतुलन का प्रतीक स्वरूप: सभी ताजे खाद्य पदार्थ जो मन और शरीर को स्पष्ट, शांत और संतुलित बनाते हैं। सात्विक भोजन में मुख्य रूप से ताजे फल, हरी पत्तेदार और मौसमी सब्जियां, अंकुरित अनाज, दूध और उससे बने शुद्ध डेयरी उत्पाद (जैसे मक्खन, घी और पनीर), साबुत अनाज (जैसे गेहूं, चावल, जौ और जई), तथा हल्के व प्राकृतिक मेवे एवं बीज शामिल होते हैं। इस प्रकार का भोजन पूरी तरह से शाकाहारी होता है, जिसमें प्याज और लहसुन जैसे तामसी पदार्थों का भी उपयोग नहीं किया जाता है। यह भोजन चेतना को पोषित करता है, आंतरिक शक्ति व शांति प्रदान करता है। इससे शरीर भारी महसूस नहीं होता और मन में एक नई तार्किकता और सजगता आती है। ईईजी (EEG) अध्ययनों (2006) से यह सिद्ध हुआ है कि सात्विक भोजन मस्तिष्क में अल्फा वेव्स (Alfa Waves) उत्पन्न करता है, जो मानसिक शांति और स्थिरता की स्थिति को दर्शाती हैं। इसके सेवन से शरीर का वजन भी नियंत्रित रहता है। ‘जर्नल ऑफ़ द अमेरिकन कॉलेज ऑफ़ न्यूट्रिशन’ के अध्ययन के अनुसार, इस प्रकार का प्राकृतिक आहार मेटाबोलिक स्वास्थ्य और वजन संतुलन में प्रभावी है। यह पाचन तंत्र को स्वस्थ रखकर शरीर की ऊर्जा दर (metabolic rate) को संतुलित और स्थिर रखने में वैज्ञानिक रूप से सहायक माना गया है।
(ख) राजसिक भोजन — उत्तेजना, गतिशीलता और लालसा का प्रतीक स्वरूप: यह तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करता है और मेटाबॉलिज्म की गति को बढ़ाता है। राजसिक भोजन के मुख्य स्रोतों में अत्यधिक तीखे, नमकीन, खट्टे, कड़वे, मसालेदार और तले-भुने खाद्य पदार्थ शामिल हैं—जैसे कि लाल व हरी मिर्च, तेज मसाले, प्याज, लहसुन, चाय, कॉफी, कोको, एनर्जी ड्रिंक जैसे कैफीन युक्त पेय, रिफाइंड चीनी, मैदे से बनी वस्तुएं, बाजार के प्रसंस्कृत या प्रोसैस्ड स्नैक्स और अत्यधिक नमकीन अचार। भोजन पर किए गए कई वैज्ञानिक शोध यह प्रमाण देते हैं कि राजसिक भोजन में मौजूद कैप्साइसिन और कैफीन जैसे उत्तेजक घटक सिम्पैथेटिक तंत्रिका तंत्र को सक्रिय कर थर्मोजेनेसिस के जरिए अल्पकालिक रूप से मेटाबोलिक रेट और ऊर्जा व्यय को बढ़ाते हैं, परंतु अत्यधिक वसा और मसालों के कारण यह पाचन तंत्र में में सूजन व गैस्ट्रिक एसिड का अत्यधिक स्राव पैदा कर पाचन को बाधित करता है। इसके अतिरिक्त, ऐसे उत्तेजक और प्रसंस्कृत आहार का निरंतर सेवन शरीर में कोर्टिसोल स्तर को बढ़ाकर दीर्घकाल में इंसुलिन प्रतिरोध और चयापचय असंतुलन का जोखिम उत्पन्न करता है। अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रिशन’ के शोध के अनुसार, कैप्साइसिन और कैफीन जैसे आहार संबंधी घटक अल्पकालिक रूप से फैट ऑक्सीडेशन और ऊर्जा व्यय को बढ़ाते हैं।
(ग) तामसिक भोजन — जड़ता और अज्ञानता का प्रतीक स्वरूप: तामसिक भोजन के अंतर्गत बासी, सड़े-गले, अशुद्ध, अत्यधिक पके हुए, संरक्षित डिब्बाबंद और फ्रोजन खाद्य पदार्थों के साथ-साथ मांसाहारी भोजन (मांस, मछली, अंडे), मशरूम, और शराब जैसे मादक पदार्थ शामिल होते हैं, जो शरीर और मन पर भारी प्रभाव डालते हैं। रासायनिक और शारीरिक दृष्टिकोण से, इस प्रकार के भारी और प्रसंस्कृत आहार को पचाने के लिए पाचन तंत्र को अत्यधिक ऊर्जा लगानी पड़ती है, जिससे सुस्ती, ऊर्जा की कमी और सुदृढ़ चयापचय में रुकावट पैदा होती है। बासी या अशुद्ध भोजन में ऑक्सीडेटिव तनाव और आंतों में हानिकारक बैक्टीरिया को बढ़ावा देने वाले तत्व होते हैं, जो क्रॉनिक सूजन (systemic inflammation) और सुस्त मेटाबोलिक दर का कारण बनते हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसे भारी और विषाक्तता से युक्त आहार का निरंतर सेवन इंसुलिन प्रतिरोध, वसा संचय और दीर्घकालिक मेटाबोलिक विकारों (जैसे मोटापा और सुस्त चयापचय) के जोखिम को काफी हद तक बढ़ा देता है। ‘न्यूट्रिएंट्स’ जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, अत्यधिक प्रसंस्कृत और बासी (अल्ट्रा-प्रोसेस्ड) खाद्य पदार्थ आंतों के माइक्रोबायोम को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं, जिससे प्रणालीगत सूजन और मेटाबोलिक शिथिलता उत्पन्न होती है।
भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारे गुण, व्यवहार और मानसिक तरंगों को तय करने वाला मुख्य आधार है। नवरात्रि के दौरान विशेष सात्विक भोजन की परंपरा हमें शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक शांति और आत्म-संयम की एक अनूठी वैज्ञानिक व आध्यात्मिक राह दिखाती है।
लेखक
डॉ.कविता शर्मा
आहार और पोषण के विषय में होने वाले नवोन्मेषों से अवगत करवाने के लिए कॉलम 'न्यूट्री ट्रेंडसÓ लिख रहीं डॉ.कविता शर्मा अपने विषय में गोल्ड मैडलिस्ट है।