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रिपोर्ट: जीवन में कश्मकश होना जरुरी-विशारद

'सरल ' होना कठिन है, फिर भी 'सरल' रहकर इतिहास रचा

जीवन में कश्मकश होना जरुरी-विशारद
राजसूय
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राजसूय। बीकानेर में शायद पहली बार किसी साहित्यकार, रंगकर्मी, पत्रकार का ऐसा जन्मदिन मनाया गया जिसमें उसी की लिखी  कविताओं और गीतों से अभिषेक किया गया, इस तरह का नवाचार बीकानेर में ही देखने को मिल सकता है।  एक साहित्यकार, ईमानदार पत्रकार जो अपने जीवन के 88 वसंत पूरे करता है और 89 वें वसंत को मनाने के लिए आगे बढ़ता है। वह महान व्यक्तित्व कोई और नहीं बीकानेर का जाया जन्मा सरल विशारद है। जिनका नाम सरल, जीवन भी सरल, व्यवहार भी सरल, लेखन भी सरल, लेकिन इन सभी सरलताओं के पीछे एक कठिन संघर्ष,  जो हमेशा पर्दे के पीछे ही रहा। सरल जी के जीवन में जन्मदिन मनाने की कोई परंपरा नहीं थी और जन्मदिन बसंत पंचमी को या फिर 11 अक्टूबर को यह भी एक शोध का विषय था। खैर सभी अटकलों के बाद 11 अक्टूबर को जन्मदिन मनाने की बात बीकानेर के कुछ युवा साहित्यकारों (खुरापाती, नवाचारी दिमाग़ ) में आई। इस संबंध में हरीश बी शर्मा ने कहा कि यह बात दिमाग में आने भर से काम नहीं चलने वाला था क्योंकि सरल जी को जन्मदिन मनाने के लिए राजी करना भी बहुत बड़ा कार्य था। इसके लिए साहित्यकार बुलाकी शर्मा जी से संपर्क किया गया, उनके माध्यम से डॉ. नंदकिशोर आचार्य को कहा गया। जब इन दोनों की सहमति बन गई तब इन दोनों की सहमति की बात कहते हुए सरल जी को जन्मदिन मनाने के लिए सिर्फ इतना ही कहा गया कि आप आए या ना आए जन्मदिन का प्रोग्राम तो होगा। शायद इतना जिद प्रेम में ही होता है। फिर क्या था तैयारियों को अंतिम रूप दिया गया, जिसमें अध्यक्षता डॉ नंदकिशोर आचार्य ने की।  आपने  पत्रकारों और साहित्यकारों के इतिहास में सरल जी को एक ईमानदार पत्रकार बताया, वहीं कुछ पत्रिकाओं का जिक्र करते हुए 'वातायनÓ जैसी पत्रिका को जारी रखने के लिए सरल जी ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आपने यह भी कहा कि उस समय में 'घर फूंक कर' किसी पत्र-पत्रिका को चलाने का काम सरल जी ने किया जिसमें हरीश भादाणी, पूनम दईया आदि का जिक्र भी डॉ. नंदकिशोर आचार्य ने किया। जहां पुरस्कार लेने की होड़ मची होती है वहां सरल जी ने पुरस्कार लेने से मना करके एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। आयोजन के मुख्य अतिथि हरि गोपाल हर्ष 'सन्नू' ने सरल विशारद को खुली किताब बताया और कहा कि आप हमेशा खुली किताब की तरह रहे, कोई भी, कहीं भी, किसी भी तरह से इनको पढ़ सकता है। सरल विशारद ने अपनी उद्बोधन में 'मैं ऐसा क्यों हूंÓ पर अपनी बात कही कि मेरे पास पुरखों का आशीर्वाद था और आप सबका प्रेम इसी कारण से मैं ऐसा बना पाया। आपने मुझे महान मान लिया जबकि महान- वाहन जैसा कुछ नहीं है मेरे अंदर। 
    सरल जी ने साहित्य में पागल हो जाने को महत्वपूर्ण बताया आपने कहा कि जो पागल नहीं होता वह साहित्यकार या कवि नहीं हो सकता। कुछ पागलों के उदाहरण देते हुए डॉ. नंदकिशोर आचार्य और हरीश भादाणी का नाम भी लिया। आपने जीवन में कशमकश होने की बात को  रेखांकित करते हुए कहा कि अगर जीवन में कशमकश नहीं है तो वह जीवन नहीं है, हां अगर आप आराम से रहना चाहते हो तो नौकरी करो, पूजा करो, आरती करो, मंदिर जाओ बस। लेकिन कशमकश रखोगे तो डॉ. नंदकिशोर आचार्य बनोगे, हरीश भादाणी बनोगे। आपने अपनी ही रचना 'हँसता रहता है चुन्नीलाल...का जिक्र करते हुए कहा मेरी तरह हँसते रहो, खुश रहो। सरल जी को सम्मान स्वरूप शाल, श्रीफल और एक अभिनंदन पत्र सम्मानित मंच द्वारा दिया गया। अभिनंदन पत्र में हरीश बी शर्मा के शब्दों को आवाज़ दी उद्घोषक और रंगकर्मी रामसहाय हर्ष ने। अभिनंदन पत्र की एक पंक्ति का जिक्र करना चाहूंगा 'हमने देखा है सरल को वाकई विरल होने के लिए जरूरी है सरल होना.....'सरल जी के बहु आयामी व्यक्तित्व पर विशेष महानुभावों ने प्रकाश डाला गया जिसमें साहित्य, पत्रकारिता, सृजनधर्मी, रंगकर्मी और इनके जीवन का सबसे बड़ा आयाम सीधे सरल सहज व्यक्तित्व के धनी होने के बारे में अलग-अलग विचार रखे गए। जयपुर से पधारे गोविंद माथुर ने सरल जी के व्यक्तित्व को विरल बताया। एक व्यक्ति घर परिवार समाज और अपने कार्यक्षेत्र में किस प्रकार रहता है उसी से उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व बनता है। सरल जी परिवार में कैसे है इस पर युवा कवि विप्लव व्यास ने कहा कि बाबू जी जिसा सच्चा मिनख दिखणा बंद हो गिया। परिवार में अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने का एक उदाहरण देते हुए विप्लव  कहते है कि परिवार में जद कोई रिश्तो तय होतो तो रसम ने पूरी करण खातर 1 रुपियो लेता अर देता अर पछे केता अबे कदई मिलो जणे पान खिलाई दिया। साथियों इस पहले नवाचारिक जन्मदिवस समारोह 'सरल समारोहÓ की दो बातें बहुत महत्वपूर्ण रही पहली तो यह कि सरल जी को उन्हीं के लिखी कविताएं सुना कर उनका 'साहित्यिक अभिषेक' किया गया दूसरा इसी सरल समारोह में यह विचार आया कि आगामी जन्मदिन पर इन्हें इन्हीं के साहित्य को प्रकाशित करवा कर भेंट किया जाए।  
इनके कुछ लिखे हुए को जो प्रकाशित नहीं हुआ हैं उन्हें हम मिलकर प्रकाशित करवाएं और वही साहित्य इन्हें भेंट करें तो एक साहित्यकार के लिए इससे बड़ा उपहार क्या हो सकता है इस विचार पर तुरंत सबकी सहमति बन गई। एक और खास बात रही कहते हैं कि जब देवता प्रसन्न होते हैं तब वह आसमान से उन बूंद के सहारे अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। सरल समारोह में आरंभ से लेकर विराम तक इंद्र भगवान की मेहरबानी रही और उन्होंने सरल जी को अपना आशीर्वाद उन फुआरों के जरिए दिया। सरल समारोह का सरल संचालन कवि, गीतकार संजय आचार्य 'वरुणÓ ने किया वहीं इस आयोजन में बीकानेर के युवा, वरिष्ठ साहित्यकार, कवि, कथाकार, सृजनधर्मी, रंगकर्मी और प्रबुद्ध जनों की उपस्थित ने समरोह की गरिमा बढ़ाई।

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लेखक

महेश उपाध्याय

जनसरोकारों से जुड़े आयोजनों की तत्स्थलीय रिपोर्ट करने वाले महेश उपाध्याय आकाशवाणी से जुड़े हैं।

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