BREAKING

ज्ञान परंपरा

ज्ञान परंपरा: कुशा के खेत बड़े महत्वपूर्ण

कुशा के खेत बड़े महत्वपूर्ण
राजसूय
ad1
ad2
ad3
ad4

राजसूय । भादौ की अमावस बैल पोला और कुशा संग्रहण का सुंदर अवसर होता है। इस पर्व पर कुशा संग्रह का काम जब से समझ आई, तब से हो रहा है। कई बार उदयपुर की मशहूर झील उदयसागर के पिछवाड़े के खेतों से कुशा का संग्रह किया और उसके पूले मित्रों तक पहुंचाये। कुशा के प्रयोग की सबको जानकारी है। महिलाएं कुछ ज्यादा ही ध्यान रखती हैं क्योंकि ग्रहण, सूतक, अर्पण - तर्पण आदि के दौरान हम से ज्यादा स्त्रियां ही कुशा को याद और उपयोग करती हैं। 

सीता के काल से ही स्त्रियों को मालूम है कि कुशा रावण जैसी बला को टाल सकती है तो वे ही आगे चलकर बेटे का नाम कुसला या कुश रखती हैं! कुसल भूमि पर कितने कोसल, कौशल या कुशलगढ़ बसे और कुश उत्पाटन में दक्ष व्यक्ति को ही कुश या कुशल नाम मिला! कुशाग्र नामकरण का आधार क्या है? संस्कृत वाले इस घास के बारे में और भी जानते होंगे लेकिन चेटक विद्या और अंत्यकर्म प्रवीण लोग जानते होंगे कि कुशा के पुत्तल (पुतले) कब और क्यों बनते हैं? और, कुशा से कुशवाह, दाभ से दाभी जैसे वंशों की कहानियों के पीछे क्या कारण हैं? यह विचारणीय है।

कुशा उत्पादन वाले, बेड़च नदी के डब्बा छोर के एक खेत का नाम ही "कुसला" है, ऐसा पता चला। मित्र श्री उपेन्द्रसिंह अधिकारी और मैं वहां की तुलसीबाई के खेत पर जा पहुंचे और उनके परिवार के वृद्ध भेराजी द्वारा बताए कोने में कुशा उखाड़ने में जुट गए। बात - बात में पता चला कि कुशा मीठे पानी वाली भूमि पर होती है। मुझे तुरंत याद आया कि भेराजी और तुलसीबाई ने कब वराहमिहिर को पढ़ा जिसने मुंज, काश और कुशा को मीठे पानी का संकेत देने वाली वाली घास बताया है! (दकार्गल विद्या) वराह ने कुशा के आधार पर मीठे पानी का ज्ञान इस देहात से ही लिया हो और इसके गुण - धर्म को पहचान कर अध्येता वैदिक महर्षि बने।

कुशा हमारे घर में बारहों मास होनी चाहिए, यह मां का आदेश है! कहती थीं : पशुओं ने इसको नहीं खाया, मानवों के हित में छोड़ रखा है ताकि वे मीठे पानी की पहचान कर सकें, सूतक जैसे उत्पातों से निजात पा सकें। इसीलिए वह भादवी अमावस को हमें खेत पर लेे जाती थीं और कहानी में कहती थीं तुम जिसको घास कहते हो, उसने क्या - क्या नहीं दिया! पूछती जाती : क्यों कुशा का आसन बनाया गया! कब बना? कुशा उत्पादन कहां होता है और क्यों होता है? कुश द्वीप, हिन्दू कुश, कुशावर्त... जैसे नाम कैसे पड़े! यही उपयोगी घास मानी गई जिसके रज्जू से लेकर आसन और वितान तक बने, अंगूठी और मृदभांड रखने के लिए इंडोनिया (अंग्रेजी नाम नहीं) बनाई गईं... आदि मानव भी इसको जानता था और इसी कारण ज्ञानियों ने भी बात को आगे बढ़ाया लेकिन उन्होंने संस्कृत भाषा में कहा जबकि यह सब लोक के ज्ञान में है।

श्रीकृष्ण जुगनू

लेखक

श्रीकृष्ण जुगनू

भारतीय ज्ञान परंपरा के विद्यार्थी श्रीकृष्ण जुगनू प्राचीन लोक कला और स्थापत्य सहित अनेक विषयों के गहन-विश्लेषक हैं। देश के नामी प्रकाशकों ने इनकी पुस्तकों का प्रकाशन किया है। राजसूय में 'ज्ञान परंपराÓ कॉलम लिखते हैं।

2 प्रकाशित खबरें सभी देखें →