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राजसूय। विजय दशमी का पर्व दशानन रावण वध से जुड़ा हुआ है। शमी वृक्ष पूजन, नीलकंठ पक्षी को देखने, रावण के पुतलों के दहन और रामलीला मंचन के साथ नौरता और दशहरा पर्व मनाया जाता है।
भारतीय मूर्तिकला में रावण और राम युद्ध का चित्रण ही नहीं मिलता बल्कि रावण को कैलास पर्वत उठाते हुए महाबली के रूप में भी दिखाया जाता है और इस रूप की मूर्तियां बड़ी लोकप्रिय रही हैं। यदि एकलिंग माहात्म्य को आधार माना जाए तो 15 वीं सदी तक मेवाड़ में यह विश्वास था कि मुनि विश्रवा का आश्रम आहोर दुर्ग ( झाड़ोल) में था। वहीं पर रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण।का जन्म हुआ और वहां उनकी मूर्तियां थीं। आज लोक विश्वासों में वहां कमलनाथ महादेव को रावण द्वारा अपना सिर चढ़ाने की मान्यता मिलती है। रामायण का एक ऐसा अज्ञात स्वरूप भी रहा है जो रावण के नाम है : दशग्रीव राक्षस वध चरितम्। वाल्मीकि रामायण की कथा के बहुत निकट इसका प्रणयन हुआ है। कोलकाता की विदुषी श्रीमती अनसूया भौमिक ने आग्नेय पुराण (अन्य नाम : वह्नि पुराण) का संपादन किया तो उसके अंत में रामायण का एक अन्य स्वरूप भी मिला। उन्होंने पुराण के अतिरिक्त अंश के रूप में उसका संपादन किया तो प्रकाश में आया दशग्रीव राक्षस वध चरितम। दो बरस पहले एशियाटिक सोसायटी, कोलकाता ने पहली बार इस रामायण के प्रकाशन को जारी किया। यह सोसायटी भारत में लगभग 1800 ई. से संस्कृत आदि भारतीय भाषाई ग्रंथों का नियमित प्रकाशन कर रही है। उसके पास पांडुलिपियों का बड़ा संग्रह भी है। इस अनोखे राम चरित का अनुवाद बाकी है। मेवाड़ कलम में चित्रित राम - रावण युद्ध का चित्र देश की बड़ी थाती है। इसमें मातली के रथ पर आसित राम और लक्ष्मण हैं। राम द्वारा रावण वध, संतप्त विभीषण को सांत्वना, जामवंत सहित वानर यूथ पतियों से धन्यवाद सहित मिलन और देवताओं द्वारा पुष्प वर्षण दिखाया गया है। महाराणा जगत सिंह कालीन चित्रकार साहबदीन द्वारा 1649 - 1653 ई. में रामायण के युद्धकांड का चित्रण किया गया। रावण के वेश - मुखौटे भी लोकप्रिय हैं। सहयाद्री के पर्वतीय अंचलों में बसी ठाकर, ठाकूर, कोकणा, कातकरी, वारली जैसी जनजातियाँ बोहाड़ा उत्सव हर वर्ष मनाती हैं। चैत्र मास में बोहाडा उत्सव का प्रारंभ होता है। बोहाडा लोक देवी देवताओं का उत्सव होता है जिसमें पुरूष अलग-अलग मुखोटे पहनकर सोंग बनाते हैं। रावण का मुखौटा लोकप्रिय है। गणपति, सारजा, राक्षस, इंद्रदेव, शनिदेव, वाघोबा, अग्निदेव, खंडोबा, बहिरोबा, चंद्र- सूर्य, नरसिंह तथा देवी के सोंग भी इसमें होते हैं। शहनाई, संभल, चौघडा तथा ढोल इन वाद्यों पारंपरिक नृत्य किए जाते हैं जो बहुत ही आकर्षक होते हैं।
इस उत्सव का आनंद उठाने रिश्तेदार और गांव के लोग तथा दूर-दूर से लोग आते हैं। मय दानव जो रावण का ससुर था, महा शिल्पी था और पर्वतीय गुफाओं सहित समुद्र में दुर्ग निर्माण में निपुण था। मय कृत वास्तु शास्त्र मयमत का हमने अनुवाद कर पाया कि विश्वकर्मा के नाम से प्रारंभिक शिल्प शास्त्र मय के ख्यात रहे। हमें मयमत ही ही नहीं, मयशास्त्र, मय संग्रह, मय दीपिका आदि भी मिले हैं। रावण कृत शिशु स्वास्थ्य रक्षा विषयक ग्रंथ चतुर्ज्ञान मिलता है और आयुर्वेद का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उसने सुषेण जैसे वैद्य को अपने दरबार में रखा जो भारतीय उप महाद्वीप में मिलने वाली समस्त औषधियों और उनके प्रयोग के बारे में लंका में बैठा जानता था।
लेखक
श्रीकृष्ण जुगनू
भारतीय ज्ञान परंपरा के विद्यार्थी श्रीकृष्ण जुगनू प्राचीन लोक कला और स्थापत्य सहित अनेक विषयों के गहन-विश्लेषक हैं। देश के नामी प्रकाशकों ने इनकी पुस्तकों का प्रकाशन किया है। राजसूय में 'ज्ञान परंपराÓ कॉलम लिखते हैं।