वो चेहरे याद आते है
अपनी मेहनत के दम पर शून्य से शिखर तक पहुंचने वाली शख्सियत
साहित्य और साहित्यकारों से अनुराग रखने वाले
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राजसूय। साहित्य और साहित्यकारों से अनुराग रखने वाले लोग तो बीकानेर में बहुत हुए हैं लेकिन एक व्यक्ति ऐसा भी हुआ था जो साहित्यकारों, कलाकारों और प्रतिभाशाली लोगों का मन से आदर करते हुए उनके सुख-दुख में शामिल हो जाता था। हर जरूरत मंद की मदद करना उन्हें अच्छा लगता था लेकिन इन बातों का प्रचार-प्रसार हो, यह उन्हें अच्छा नहीं लगता था। ये प्रेरक व्यक्तित्व थे उद्योगपति और साहित्यानुरागी नेमचंद गहलोत। इस नाम को बीकानेर में किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। बीकानेर के नाल क्षेत्र में स्थित बीकानेर का पहला आधुनिक वाटर पार्क और मनमोहक पिकनिक स्पॉट 'फन वल्र्डÓ नेमचंद गहलोत की ही देन है। जीवन में बड़ी सफलता प्राप्त करके जन जन के प्रिय बनने वाले नेमचंद गहलोत की आरम्भिक जीवन यात्रा बहुत ही पीड़ादायक रही। जीवन में एक- दो असफलताओं से निराश-हताश हो जाने वाले लोगों को नेमचंद गहलोत की संघर्ष गाथा बहुत सम्बल और प्रेरणा दे सकती है। जिस किशोर अवस्था में बच्चे मां- बाप को नाज- नखरे दिखाते हुए सुख- सुविधाओं के साथ आगे बढ़ते हैं, तेरह- चौदह साल की उसी उम्र में नेमचंद गहलोत के हाथ में एक थर्मस होता था, जिसमें कुल्फियां डालकर वे बीकानेर के नत्थूसर बास, जनता प्याऊ, सुजानदेसर, श्रीरामसर, भीनासर और किसमीदेसर क्षेत्रों में पैदल घूम- घूमकर बेचा करते थे। उन्हें पता था कि यदि उन्हें जीवन में सफल बनना है तो कठोर परिश्रम के अलावा उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। इसलिए वे अपने जीवन की जड़ों में निरन्तर अपना पसीना सींचते रहे। थर्मस आगे चलकर आइसक्रीम का गाडा बना। उस गाड़े पर उन्होंने सब्जियां भी बेची। उन्हें जीवन के किसी एक पड़ाव पर ठहरना नहीं था। आगे बढऩा उनका लक्ष्य था। कठिन परिश्रम से कुछ पूंजी जुटाई और पान के पत्तों का कारोबार शुरू किया। प्रतिष्ठान का नाम रखा- अजीत पान सेंटर। यहीं से नेमचंद गहलोत 'अजीत भाईÓ के नाम से भी पहचाने जाने लगे।
सफलता का सिरा आ चुका था अब हाथ में
एक बिन्दु पर आकर ठहर जाना नेमचंद गहलोत का जीवन दर्शन नहीं था। अब वे कुछ और बड़ा काम करना चाहते थे। उन्होंने सब्जियों आदि के उत्पादन के लिए जमीन खरीदी। जमीन पर तीन बार ट्यूबवेल खुदवाए। तीसरी बार में उपयोग करने योग्य पानी निकला। अभावों से भरा नेमचंद गहलोत का जीवन अब सामर्थ्य की ओर बढ़ चला था। उन्होंने अन्य व्यवसायों में निवेश किया। व्यवसाय की सफलता सही प्रबंधन और परिश्रम के निवेश पर निर्भर करती है। नेमचंद गहलोत अधिक पढ़े- लिखे नहीं थे। उन्होंने किताबों से कुछ नहीं सीखा, जो सीखा जीवन की ठोकरें खा- खाकर सीखा। पैंसठ साल की उम्र तक आते- आते उन्होंने अपने परिवार का उद्योग समूह स्थापित कर दिया जिसमें भुजिया नमकीन और पाइप निर्माण की उत्पादन इकाइयां शामिल हैं। नेमचंद गहलोत अपने समय से आगे बढ़कर सोचने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने मुम्बई के एस्सेल वर्ल्ड जैसे वाटर पार्क की कल्पना को बीकानेर में साकार कर दिया। बीकानेर के नाल क्षेत्र में उन्होंने विशाल भूखण्ड पर फैले 'फन वल्र्डÓ वाटर पार्क की स्थापना की। यह भीतर से एक अनूठी दुनिया है। दुर्लभ जीव- जन्तु, विस्मित कर देने वाले झूले, स्विमिंग पूल, वास्तविक लगने वाले हवाई जहाज, बच्चों को घुमाने वाली छोटी जीपें और घोड़ों वाले झूलों के साथ ही वह सब कुछ जो उस जमाने में बीकानेर के लिए हैरान कर देने वाला था। फन वर्ल्ड का प्रबंधन अंतिम समय तक नेमचंद गहलोत स्वयं ही देखते थे।
साहित्य के प्रति था बेहद अनुराग
किसी भी पुस्तक के लोकार्पण समारोह में यदि नेमचंद गहलोत उपस्थित होते तो एक मुश्त बड़ी संख्या में हाथोहाथ पुस्तकें खरीद लेते और उन्हें साहित्यिक रुचि के लोगों में बांटते। वे अपने घर पर और फन वर्ल्ड में समय-समय पर साहित्यिक आयोजन करते। साहित्यकारों- कलाकारों का मान- सम्मान करना उन्हें अच्छा लगता था। अनेक शिक्षण संस्थानों के कार्यक्रमों में अतिथि बनकर जाते तो संस्थान को किसी न किसी प्रकार का सहयोग अवश्य करते। कोई भी व्यक्ति अगर कोई आस- उम्मीद लेकर उनके पास जाता तो उसे खाली हाथ नहीं भेजते थे। उन्होंने अपने जीवन में लाखों का दान और सहयोग किया परन्तु अपने मुंह से कभी भी किसी के सामने इस बात का कोई जिक्र नहीं किया। बीकानेर में निरन्तर चलने वाली कवि चौपाल की स्थापना में नेमचंद गहलोत की अग्रणी भूमिका रही। वे अनेक अस्वस्थ और जरूरतमंद कलाकारों- साहित्यकारों को चुपचाप उनके घर जाकर आर्थिक सहयोग कर आते थे। उन्हें मेहमान नवाजी का बहुत उत्साह रहता था। वे स्वयं भी अपनी तरह से कविताएं भी लिखते थे। ऐसे सहज, सरल एवं सज्जन व्यक्तित्व नेमचंद गहलोत 10 मई 2025 को अपनी जीवन यात्रा को विराम देकर अनन्त में विलीन हो गए। आज भी लोग हर साहित्यिक- सांस्कृतिक आयोजन के समय गहलोत को हृदय से याद करते हैं।
लेखक
संजय आचार्य 'वरुण'
बीकानेर की महान दिवंगत हस्तियों की स्मृतियों को ताजा करते हुए लिखे जाने वाले कॉलम 'वो चेहरे याद आते हैं' के लेखक संजय आचार्य 'वरुण' जाने-माने कवि व शायर हैं। राजसूय के समाचार-समन्वयक।