वो चेहरे याद आते है
वो चेहरे याद आते हैं: ऊंचे पर्वतों पर बीकानेर का नाम लिखने वाली शख्सियत
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राजसूय। मरुनगरी बीकानेर भाग्यशाली है कि इस धरती के बेटों ने समय- समय पर इसे विभिन्न क्षेत्रों में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर गौरव दिलाया है। जिस व्यक्तित्व का जिक्र हम यहां करने जा रहे हैं उन्होंने तो अपने साहस से दुनिया की बहुत ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं पर बीकानेर का नाम अंकित कर दिया था। वे सहज- सरल व्यक्तित्व के धनी थे अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पर्वतारोही मगन बिस्सा।
प्राचीन संस्कृति और रीति-रिवाजों को जीने वाले बीकानेर में मगन बिस्सा जैसा एडवेंचर मैन न तो उनके पहले कभी हुआ और न ही उनके बाद। पर्वतारोहण एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी तासीर बीकानेर के मिजाज से बिल्कुल अलग है लेकिन मगन बिस्सा जैसे कुछ लोग विशिष्ट उद्देश्यों से ही धरती पर जन्म लेते हैं, इसलिए साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा, चिकित्सा और व्यवसाय आदि कार्यों की जगह उन्होंने अपने जीवन में पर्वतारोहण को चुना।
इसकी प्रेरणा उन्हें विश्व विख्यात पर्वतारोही तेनजिंग नॉर्गे से मिली। यह मगन बिस्सा के जीवन का वो निर्णय था जिस पर उनके शुभ चिंतकों द्वारा पुनर्विचार करने का परामर्श कई बार दिया गया होगा। लेकिन चूंकि वे एक साहसी और दृढ़ निश्चयी व्यक्ति थे, इसलिए निर्णय बदलने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। वे अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु कठोर परिश्रम करने लगे। इस परिश्रम ने कुछ ही समय में उन्हें पर्वतारोही और एडवेंचर मैन के रूप में स्थापित कर दिया।
बिस्सा ने 1978 में एम. कॉम करने के बाद हिमालयन पर्वतारोहण संस्थान दार्जिलिंग से तेंनजिंग नॉर्गे की देखरेख में ही उन्होंने पर्वतारोहण का प्रशिक्षण लिया। वे 1984 में पहली बार उस राष्ट्रीय एवरेस्ट अभियान के सदस्य बने जिसमें बछेंद्री पाल शामिल थी। वे भारतीय पर्वतारोहण संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन चुके थे। कुल मिलाकर अब खतरों से खेलना ही उनका जीवन बन चुका था।
जीवन संगिनी ने भी बढ़ा दिए कदम पर्वतों की ओर
मगन बिस्सा भारत भर में एक साहसिक पर्वतारोही के रूप में पहचाने जाने लगे ही थे कि उनका विवाह हो गया। मगन बिस्सा ने अपनी धर्म पत्नी श्रीमती सुषमा बिस्सा को भी पर्वतारोहण के लिए प्रेरित किया। इस तरह बीकानेर को एक और पर्वतारोही डॉ. सुषमा बिस्सा के रूप में मिली। उन्होंने भी मगन बिस्सा की प्रेरणा, साथ, सहयोग और मार्गदर्शन में कीर्तिमान स्थापित किए हैं। वर्ष 1985 में मगन बिस्सा भारतीय सैन्य एवरेस्ट अभियान दल में शामिल थे।
वे एवरेस्ट के सबसे मुश्किल रास्ते दक्षिण-पश्चिम से ऊपर चढ़ चुके थे। दुर्योग से बिस्सा का उस समय संतुलन बिगड़ गया, जिससे वे 700 मीटर की ऊंचाई से नीचे गिर गए थे। नीचे गिरने से मगन बिस्सा के पैर में बड़ा फ्रेक्चर हुआ, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 2009 में पत्नी डॉ. सुषमा बिस्सा के साथ वे नेहरू पर्वतारोहण संस्थान उत्तरकाशी का हिस्सा बने। प्रकृति ने उनके साहस की एक बार फिर परीक्षा ली। पांच दिन के रेस्ट के लिए नीचे आते समय हिमस्खलन की चपेट में आने से मगन बिस्सा की आंतों में गेगरीन हो गया। नाजुक हालत में उन्हें रेस्क्यू कर काठमांडू लाया गया। वहां उन्हें इंस्टीट्यूट ऑफ लीवर एंड वाइलरी साइंस अस्पताल में एक साल तक भर्ती रखा गया। जान बचाने के लिए उनकी छोटी आंत तक काटनी पड़ी थी। ये उनके जीवन का बहुत बड़ा हादसा था।
पद्म पुरस्कार के हकदार थे, राजनीतिक उदासीनता के कारण नहीं मिला
मगन बिस्सा इतनी उपलब्धियों के बावजूद हमेशा अपने धरातल से जुड़े रहे। उनका व्यवहार हमेशा सहज बना रहा। उनके चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान सदैव दिखाई देती थी। मगन बिस्सा ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में पीड़ादायक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना किया लेकिन कभी भी अपने दर्द को अपने चेहरे पर नहीं आने दिया। उन्होंने सैकड़ों युवाओं को एडवेंचर और पर्वतारोहण के क्षेत्र में आगे बढ़ाया। वैसे तो मगन बिस्सा ने कई बड़े अवार्ड भी अपने नाम किए थे लेकिन वे पद्म पुरस्कार के हकदार थे। राजनीति में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों और तत्कालीन सरकारों ने उनके योगदान का सही मूल्यांकन किया होता तो उनको वे सम्मान मिलते जिनके वे अधिकारी थे।
मगन बिस्सा राजस्थान के महाराणा प्रताप खेल अवार्ड, नेशनल एडवेंचर क्लब के भारत गौरव मेडल, भारतीय पर्वतारोहण संघ के गोल्ड मेडल, सेना मेडल वीरता पुरस्कार और पंडित किशनसिंह नैन अवार्ड से सम्मानित हो चुके थे। वर्ष 2020 में फरवरी माह का वो एक काला दिन था जब पुणे में एक सड़क हादसे में बीकानेर का यह लाल हमें हमेशा के लिए छोड़कर चला गया। मगन बिस्सा का परिवार डॉ. सुषमा बिस्सा के नेतृत्व में आज भी पर्वतारोहण की अलख जगाए हुए। सरकार को मगन बिस्सा की स्मृति में एक एडवेंचर एकेडमी की स्थापना करनी चाहिए।
लेखक
संजय आचार्य 'वरुण'
बीकानेर की महान दिवंगत हस्तियों की स्मृतियों को ताजा करते हुए लिखे जाने वाले कॉलम 'वो चेहरे याद आते हैं' के लेखक संजय आचार्य 'वरुण' जाने-माने कवि व शायर हैं। राजसूय के समाचार-समन्वयक।