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राजसूय। राहुल गांधी भी पिछले सप्ताह लगातार चर्चा में रहे। वे तीन दिन सड़क पर रहे। एक दिन राष्ट्रपति से मुलाकात के नाम पर उन्होनें मोर्चा निकाला। आखिरकार उन्हें अनुमति मिली और वे राष्ट्रपति से मिले भी। सोमवार को भी एक मार्च उन्होंने किया और कहा कि वे लगातार ये काम जारी रखेंगे। साफ दिखाई पड़ रहा है कि वे सरकार पर दबाव बनाए रखना चाहते हैं। देखा जाए तो यह विपक्ष का दायित्व भी है। वे वोट चोरी का आरोप सरकार पर लगा रहे हैं लेकिन साथ ही कहते हैं कि इसका सबूत चुनाव आयोग और सरकार दे कि उसने वोट चोरी नहीं की है। जबकि इससे पहले वे प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह दावा करते रहे हैं कि उनके पास वोट चोरी के सबूत हैं। वे राष्ट्रपति से भी कह कर आए हैं कि वे वोट चोरी के सबूत उन्हें सौंप देंगें। लेकिन अब उनका कहना है कि चुनाव आयोग और सरकार साबित करे कि उन्होनें वोट चोरी नहीं की है। उधर, इंडियन एक्स्प्रेस ने अपने संपादकीय में लिखा है कि काँग्रेस पार्टी की हार के लिए चुनाव आयोग या इवीएम नहीं बल्कि खुद काँग्रेस पार्टी जिम्मेदार है क्योंकि पार्टी आम आदमी से पूरी तरह कट चुकी है। इस बीच राहुल गांधी ने वोट चोरी मुद्दे और चुनाव आयोग के खिलाफ सीजेआई यानि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया से मिलने का समय मांगा जिस पर सीजेआई ने पत्र लिख कर और बयान देकर स्पष्ट कर दिया कि यह संभव नहीं है और अगर वे अपनी याचिका दायर कर देंगें तो अन्य याचिकाओं के साथ इस पर भी सुनवाई की जाएगी। सवाल ये है कि राहुल गांधी कुछ मामलों में स्वयं आरोपी है और जमानत पर रिहा हैं। इनमे धोखाधड़ी, मनी लोंडरिंग, भ्रष्टाचार और हाल ही में हुए प्रदर्शन के दौरान उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर भी शामिल हैं। और कोई भी जज किसी भी आरोपी से नहीं मिल सकता। ऐसी सूरत में याचिका दायर करना राहुल गांधी की मजबूरी बन गई और वे अखिरकर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट पहुंचे लेकिन उनकी याचिका उससे पहले दायर की जा चुकी थी। लेकिन उच्च स्तर के महंगे वकील होने के बावजूद उस याचिका मे चौदह कमियाँ पाई गईं जिनमे प्रमुख थी ग्यारह में से केवल दो याचिका कर्ताओं के वकालतनामे होना। इन्हीं चौदह कारणों की वजह से याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं किया गया। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि राहुल गांधी सीजेपी से पीछे नहीं रहना चाहते हैं और ना ही वे खुद को उनके समकक्ष रखना चाहते हैं।
बन सकता है मुद्दा जंतर मंतर, क्योंकि...
दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार ने सोमवार को आदेश जारी कर के दिल्ली के जंतर-मंतर को आधिकारिक धरना-प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया है। जंतर-मंतर की जगह अब दिल्ली में प्रदर्शनों के लिए तीन नए स्थान तय किए गए हैं: रामलीला मैदान , बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड। हालांकि इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। देखा जाए तो जंतर मंतर की भौगोलिक स्थिति बेहद संवेदनशील है। यह देश की राजधानी के केंद्र में स्थित है। राष्ट्रपति भवन, केन्द्रीय मंत्रालयों के दफ्तर, प्रधान मंत्री आवास, संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, हाई कोर्ट ऑफ दिल्ली, दिल्ली पुलिस का मुख्यालय, राष्ट्रीय संग्रहालय, आकाशवाणी भवन, दूरदर्शन भवन, मंडी हाउस क्षेत्र, सांसदों के आवास आदि ये सभी के बीच में स्थित जंतर मंतर एक बहुत छोटा सा क्षेत्रफल है। बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में जंतर मंतर के यंत्रों के चारों तरफ यह एक शांतिपूर्ण फूल पौधों से सजा बगीचा हुया करता था। जहां कॉलेज के दिनों में हम लोग तफरीह करने और कॉफी के लिए अक्सर आते थे। पिछले कुछ समय के दौरान हुई गतिविधियों के चलते यह कदम उठाया गया। इससे पहले जंतर मंतर पर आंशिक प्रतिबंध लगाया जा चुका है। जिसमें 3000 से अधिक की संख्या में लोगों को एकत्रित होने पर मनाही शामिल है। इससे पहले भी 2017 में नैशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल ने आदेश दिया था कि जंतर मंतर से धरना स्थल हटा कर रामलीला में स्थानतरित कर दिया जाए। लेकिन जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश से इस रोक को हटा कर यहाँ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने को अनुमति दे दी थी। इसके अलावा पूर्व में दिल्ली के कर्तव्य पथ पर जो पहले राजपथ था, स्थित बोट क्लब को कांग्रेस सरकार के दौरान एक बार हुई भारी अव्यवस्था के बाद प्रदर्शनों के लिए बंद कर दिया गया था। हाल ही में दो विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से इस बात का आग्रह किया था कि जंतर मंतर से प्रदर्शन का स्थल किसी और जगह स्थानांतरित कर दिया जाए। सीजेपी ने इस बात को भी मुद्दा बनाया था कि सरकार उनसे जंतर मंतर भी छीन लेना चाहती है। उधर, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने पोस्ट किया है कि जंतर मंतर की जगह लोक कल्याण मार्ग पर प्रदर्शन के लिए स्थान दे दिया जाना चाहिए था। जबकि यह भारत के प्रधान मंत्री के आवास के ठीक सामने है। लगता है आने वाले समय में विपक्ष इसे भी एक बड़ा मुद्दा बना सकता है।
प्रदर्शन के दौरान खड़े हुए अनेक सवाल...
राहुल गांधी की टी पार्टी में समाजवादी पार्टी के 22 सांसदों और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के सांसदों सहित कुल 22 विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए। इसमें चुनावी अनियमितताओं के आरोपों को लेकर सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध प्रदर्शन को आगे भी जारी रखने का संकल्प लिया गया। बैठक में गठबंधन से बाहर के संगठनों को भी साथ लिए जाने तथा आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी को फिलहाल इस मोर्चे से अलग रखने पर विचार हुया। इस बीच राहुल गांधी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के स्थान पर जेन-ज़ी नेता और एआईएसए की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को खासी अहमियत देते दिखाई दिए। मंगलवार की टी पार्टी में उन्होनें वरिष्ठ नेताओं से पहले माइक नेहा बोरा के हाथ में थमा दिया। एक तरफ जहां वे सुप्रीम कोर्ट की तरफ कूच करते हुए नेहा बोरा के कंधे पर हाथ रख कर चल रहे थे वहीं उन्होंने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार को पीछे धकेला। इसके कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। उधर काँग्रेस की केरलम इकाई के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल (एक्स) से भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के खिलाफ एक बेहद विवादित और आपत्तिजनक पोस्ट की गई, जिसे बाद में हटा दिया गया। लेकिन अभी तक उस पर पार्टी की तरफ से खेद प्रकट नहीं किया गया है। सवाल यह भी उठ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कन्टेम्प्ट ऑफ कोर्ट यानि न्यायालय की अवमानना के तहत कार्रवाई क्यों नहीं की है। दूसरी ओर मंगलवार को ही कॉकरोच जनता पार्टी के सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली पुलिस ने पाँच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया है। इन पर दिल्ली के जंतर-मंतर पर बिना अनुमति प्रदर्शन करने के लिए बैरिकेड्स पार करने, पहले से दिए गए शांति बॉन्ड व अन्य शर्तों का उल्लंघन करने, सरकारी काम में बाधा डालना और सोशल मीडिया के जरिए भीड़ जुटाने की कोशिश करने के आरोप हैं।
लेखक
प्रितपाल कौर
एनडीटीवी की रिपोर्टर के रूप में अर्से तक काम करने वाली प्रितपाल कौर दिल्ली की पत्रकार हैं। पत्रकारिता और साहित्य लेखन का लंबा अनुभव। राजसूय की दिल्ली ब्यूरो प्रमुख।