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इतिहास: क्या बी डी कल्ला से जनार्दन कल्ला बेहतर जनप्रतिनिधि साबित होते?

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क्या बी डी कल्ला से जनार्दन कल्ला बेहतर जनप्रतिनिधि साबित होते?
राजसूय
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राजसूय।  बीकानेर के सार्वजनिक हितों के संदर्भ में—जनप्रतिनिधि के रूप में जनार्दन कल्ला क्या डॉ. बीडी. कल्ला से बेहतर होते?’ अपने इस प्रश्न की पड़ताल स्वयं से ही इस आलेख में की है।
जनार्दन कल्ला ने राजनीति औपचारिक रूप से पिछली सदी के सातवें दशक के मध्य महाविद्यालयी छात्र संघ चुनाव से शुरू कर दी थी, छात्र संघ अध्यक्ष चुने गये। सन् 1967 के चुनावों में स्थानीय मूल के भीलवाड़ा में मजदूर संगठनों की राजनीति करने वाले गोकुलप्रसाद को कांग्रेस ने समाजवादी मुरलीधर व्यास को पटखनी देने उतारा। गोकुलप्रसाद ने चुनावों से काफी पहले आकर जिस तरह जाजम बिछाई उससे लगने लगा कि वे चुनावी राजनीति की गोटियां सजाने में माहिर हैं। गोकुलप्रसाद के साथ तब जो सक्रिय दिखे उनमें गोपाल जोशी, मक्खन जोशी और जनार्दन कल्ला के नाम प्रमुख हैं जिन्होंने बाद की बीकानेरी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। यह तीनों ही कांग्रेसी जन सन् 1970 के नगर परिषद् चुनावों में पार्षद चुने गये और गोपाल जोशी परिषद् अध्यक्ष भी चुने गये।
जनार्दन ऊन के सामान्य व्यापारिक परिवार से थे, रिश्ता भी उन मक्खन जोशी और गोपाल जोशी से निकट का था जिनकी उन दिनों सामाजिक प्रतिष्ठा कल्ला परिवार से ज्यादा थी। गोपाल जोशी, मक्खन जोशी और जनार्दन कल्ला की इस तिकड़ी को सन् 1967 के विधानसभा चुनावों के बाद स्थानीय बोली में गोकुल जी के पट्ठे कहा जाने लगा। हो सकता है यह विशेषण इन्हें और इनके परिजनों को अब अच्छा नहीं लगे और यह भी हो सकता है कि उस समय गोकुल जी के पट्ठे कहलाने वाले कुछ और लोग भी मन मसोसें कि उनके नाम का उल्लेख क्यों नहीं हो रहा है।
जनार्दन कल्ला शुरू से ही जीवट वाले और महत्त्वाकांक्षी थे, पुश्तैनी व्यापार से अलग कुछ करने की भी ठानी। ‘परदेश’ भी गये, अनुकूलता न बनी तो लौट आए। ठेकेदारी और राजनीति में लग गये। यानी ठेकेदारी और राजनीति का याराना तब से ही है। तब की राजनीति में गोकुलप्रसाद, गोपाल जोशी और मक्खन जोशी से आगे निकलने या चुनौती देने का साहस सन् 1977 से पहले जनार्दन नहीं दिखा पाए। लेकिन सन् 1977 के विधानसभा चुनावों में जनार्दन ने बीकानेर शहर से तब दावेदारी का साहस दिखाया जब तब के विधायक गोपाल जोशी दिखती हार के कारण चुनाव लड़ने को तैयार न दिखे।
सन् 1972 के चुनावों में गोपाल जोशी की जीत और मुरलीधर व्यास की मृत्यु के बाद मक्खन जोशी अपने मित्रों की राय से व्यावहारिक राजनीति में सम्मानजनक हैसियत के मकसद से समाजवादी पार्टी में चले गये। सन् 1975 में लगे आपातकाल में जेल भी गये और सन् 1977 में घोषित लोकसभा चुनावों में मक्खन जोशी बीकानेर शहर से कांग्रेस विरोधी नेता के रूप में लगभग चुनौतीहीन व्यक्तित्व के तौर पर उभरे। कुछ तो सन् 1977 का कांग्रेस विरोधी माहौल और कुछ शहर में मक्खन जोशी की लोकप्रियता, इन दोनों ने विधायक गोपाल जोशी को सहमा दिया, क्योंकि सभी मान कर चल रहे थे कि बीकानेर शहर सीट से जनतापार्टी के उम्मीदवार मक्खन जोशी ही होंगे। लेकिन जैसे ही समाचार आया कि जनतापार्टी का टिकट तो मक्खन जोशी की जगह महबूब अली ले आए हैं, गोपाल जोशी दावेदारी पर उतर आए। बहनोई की यही बात साले जनार्दन के गले नहीं उतरी, वे पहली बार गोपाल जोशी के सामने हो लिए। कांग्रेस ने बीच का रास्ता निकाला और पार्टी से निष्कासित गोकुलप्रसाद को न केवल तुरत-फुरत कांग्रेस में शामिल किया, बल्कि टिकट देकर महबूब के सामने खड़ा भी कर दिया। जनता को तब कांग्रेस किसी भी रूप में स्वीकार नहीं थी, फिर वह चाहे गोपाल जोशी होते या जनार्दन कल्ला! गोकुलप्रसाद हार गये। इसी के बाद जनार्दन कल्ला और गोपाल जोशी के बीच जो सळ आया वह बढ़ता ही गया।
बीडी. कल्ला ने ‘भाईसा’ जनार्दन की देखा-देखी छात्र राजनीति करने की इच्छा जताई वह भी पुष्करणा होते हुए डूंगर कालेज में। जनार्दन कल्ला ने इसे चुनौती के रूप में लिया, क्योंकि तब डूंगर कॉलेज में राजपूत और जाटों का ही बोलबाला था। आजकल जिसे ‘डिनर डिप्लोमैसी’ कहा जाता है, जनार्दन ने राजनीति में पिछली सदी में तब ही शुरू कर दी थी। उस भोज राजनीति में बने रिश्ते लगभग चालीस वर्ष तक निभाए गए, बाद में क्यों दरके, उल्लेख का हेतु यह भी हो सकता है। तब भी जनार्दन कल्ला की ही चाल और चतुराइयों के चलते बीडी. कल्ला छात्रसंघ का चुनाव जीत पाए और तब से ही बीडी. कल्ला राजनीति के रुतबाई पेशे की हसरत अंदर ही अंदर पाल चुके थे। लेकिन आत्मविश्वासहीनता (जो अब भी उनमें देखी जाती है) के चलते मैदान में कूदने का साहस नहीं कर पाए। बीडी. को तब मक्खन भाई जी, बहनोई गोपाल जोशी और भाईसा जनार्दन कल्ला की हैसियत बहुत बड़ी लगती थी। पिछली सदी का आठवां दशक ऐसा था भी। आठवें दशक में इन तीनों का ही सामना करने से बीडी. या तो बचते थे या सहम कर ही मिलते थे।

दीपचंद सांखला

लेखक

दीपचंद सांखला

वाग्देवी प्रकाशन के संस्थापक। साप्ताहिक विनायक के संपादक। वरिष्ठ पत्रकार और विचारक दीपचंद सांखला बीकानेर के राजनीतिक इतिहास पर आधारित कॉलम इतिहास के लेखक हैं। राजसूय के संरक्षक।

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