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इतिहास: यारबाश मक्खन जोशी और उनके समकालीन

यारबाश मक्खन जोशी और उनके समकालीन
राजसूय
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राजसूय। इस शहर को आज भी मक्खन जी जैसे सदाशयी, यारबाश, व्यवहारकुशल और बहुविध रुचिसंपन्न जनप्रतिनिधि की उडीक (चाह) है। सक्रियों में ऐसा कोई नजर नहीं आ रहा।

विधायक गोपाल जोशी मक्खन जी के बचपन में मित्र रहे, राजनीति करना साथ शुरू किया। अपने अनुभवों को सदाशयता से सुनाते। गोपाल जी ने बताया कि सन् 1962 में निर्दलीय रह बीकानेर शहर विधानसभा सीट के इस चुनाव को लड़ने के लिए मक्खन जी ने न केवल हुड़े की हद तक प्रेरित किया बल्कि पूरे चुनाव अभियान को संभाला भी। उल्लेखनीय है कि उस चुनाव में डॉ. छगन मोहता जैसे मनीषी ने भी गोपाल जोशी के समर्थन में सभाएं कीं, व्यावहारिक राजनीति में डॉ. मोहता की वैसी सक्रियता का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता।

विधायक मुरलीधर व्यास को सन् 1967 के विधानसभा चुनावों में विधानसभा से बाहर रखने की रणनीति के तहत मुख्यमंत्री सुखाड़िया ने गोकुलप्रसाद पुरोहित को पर्याप्त समयपूर्व पैराशूट से मैदान में उतार दिया और सफल भी हुए। उस चुनाव में जोशीद्वय गोपाल जी और मक्खन जीको गोकुल जी के साथ लगने के अलावा कुछ करने की गुंजाइश नहीं मिली। लेकिन सन् 1970 में लंबे समय बाद जब नगर परिषद् चुनावों की घोषणा हुई तो इन मित्रद्वय को फिर अवसर मिल गया। बकौल गोपाल जी मक्खन जी ने उन्हें पार्षद का चुनाव लड़ने को तैयार किया। बिना पार्टी सिंबल लड़े गये उस चुनाव में कांग्रेस समर्थित दोनों मित्रों ने चुनाव जीता भी।

उस चुनाव संबंधी दो उल्लेखों का जिक्र जरूरी है, जिनमें से एक का जिक्र खुद गोपाल जोशी ने किया। गोपाल जी के सामने जनसंघ समर्थित उम्मीदवार के तौर पर मक्खन जी के श्वसुर मैदान में डटे थे, मक्खन जी ने किसी तरह का लिहाज न बरतते हुए मित्र गोपाल जोशी के लिए प्रचार किया। दूसरा उल्लेख अशोक आचार्य का जरूरी है, नगर परिषद् के इन चुनावों में वे चमकदार उम्मीदों के साथ उभरे थे लेकिन नहीं पता क्यों वे उल्कापात के हश्र को हासिल हो लिए।

गोपाल जोशी ने यह भी बताया कि चुनाव जीतने के बाद परिषद् में कांग्रेस समर्थक पार्षद अल्पमत में होने के बावजूद मक्खन जी ने न केवल उन्हें सभापति का चुनाव लड़ने को तैयार किया बल्कि रणनीति बनाकर उन्हें जितवाया भी। सन् 1969 में हुए राष्ट्रपति के चुनावों में हुई कांग्रेस की आपसी खींचातानी के बाद इंदिरा गांधी ने प्रदेश कांग्रेस क्षत्रप मोहनलाल सुखाड़िया को निस्तेज कर दिया। इन बदलावों के बाद गोकुलप्रसाद पुरोहित का प्रभाव कम हुआ, परिणामस्वरूप सन् 1972 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के टिकट बंटवारे की राजनीति में उनके अनुगामी गोपाल जोशी ने ही मात दे दी।

गोपाल जोशी कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर जीतकर विधायक बन गये। रिक्त हुए पद पर नगर परिषद सभापति का चुनाव होना था। मक्खन जोशी उम्मीदवार थे, मित्रता निभाने की जिम्मेदारी अब गोपाल जोशी की थी। इस बीच दोनों के बीच क्या कुछ हुआ, इसकी जानकारी नहीं है। हां, उस चुनाव में गोपाल जोशी ने कोलायत विधायक कांता कथूरिया के साथ मिल अपने मित्र मक्खन जोशी को हरवा दिया। यहीं से मक्खन जोशी को समझ आ गया कि राजनीति करनी है तो रास्ता बदलना होगा। शहर कांग्रेस की राजनीति में उनके लिए संभावनाएं नहीं बची। प्रगतिशील विचारों के मक्खन जोशी को जनसंघ में जाना नहीं था, न तब तक जनसंघ की राजस्थान में कोई खास उपस्थिति थी। मुरलीधर व्यास के निधन के बाद शहर की समाजवादी राजनीति में संभावनाएं थी।

मक्खन जी के मित्रों का रुझान भी वही था सो वे कांग्रेस विरोध की राजनीति में आ लिए। सन् 1975 में लगे आपातकाल में 19 माह जेल में रहे। 1977 ई. के लोकसभा चुनावों में शहर राजनीति में मक्खन जोशी सर्वाधिक लोकप्रिय नेता के तौर पर उभरे। मान लिया गया था कि होने वाले विधानसभा चुनावों में नई बनी जनतापार्टी में शहर सीट से वह ही उम्मीदवार होंगे। लेकिन टिकट वितरण की अव्यवस्थित प्रक्रिया में विचारों से समाजवादी महबूब अली टिकट ले आए। बावजूद इसके सभी जानते हैं मक्खन जोशी ने खुद को उम्मीदवार मान कर चुनाव अभियान चलाया, महबूब अली को चुनाव जीतना ही था। इस चुनाव में चूके मक्खन जोशी ही नहीं, बड़ी चूक गोपाल जोशी से भी हुई, हारने के भय से उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवारी से तब जो पांव पीछे किए, उसका बड़ा खमियाजा उन्होंने लंबे समय तक भुगता। वे शहर कांग्रेस की राजनीति से हमेशा-हमेशा के लिए बाहर कर दिए गये।

मक्खन जोशी के राजनीतिक जीवन में प्रतिकूलताओं ने पीछा कभी नहीं छोड़ा, फिर वह चाहे सन् 1973 का नगर परिषद् के सभापति का चुनाव हो या फिर सर्वाधिक अनुकूलता लिए 1977 ई. का विधानसभा चुनाव। जनता में जनतापार्टी से मोहभंग की शुरुआत चाहे वर्ष 1980 के लोकसभा-विधानसभा चुनावों को भले ही मान लें, बावजूद इसके तब के कांग्रेस विरोधी तासीर वाले इस शहर में सन् 1980 के विधानसभा चुनाव में भी मक्खन जोशी की जीत लगभग तय थी।

दीपचंद सांखला

लेखक

दीपचंद सांखला

वाग्देवी प्रकाशन के संस्थापक। साप्ताहिक विनायक के संपादक। वरिष्ठ पत्रकार और विचारक दीपचंद सांखला बीकानेर के राजनीतिक इतिहास पर आधारित कॉलम इतिहास के लेखक हैं। राजसूय के संरक्षक।

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