राजनीति
रजीनीति: लड़ते रहे राहुल-अखिलेश तो फिर छिटक जाएगा उत्तर प्रदेश
भाजपा को तब ही फायदा जब योगी रहें सीएम फेस
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राजसूय। उत्तर प्रदेश में फरवरी-मार्च में होने वाले चुनाव पर भाजपा की नजरें गड़ी हुई हैं। भाजपा बनाम एनडीए इस चुनाव से सत्ता में वापसी तब ही कर पाएगा, जबकि इंडिया ब्लॉक से अखिलेश यादव यानी समाजवादी पार्टी अलग होगी।
अगर यह चुनाव राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने मिलकर लड़ा तो योगी आदित्यनाथ की वापसी मुश्किल हो जाएगी। हालांकि, जिस तरह के हालात बन रहे हैं, उससे इंडिया ब्लॉक का यहां रहना मुश्किल लग रहा है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी विधानसभा सीटों की जिस तरह से डिमांड कर रहे हैं, अखिलेश यादव किसी भी सूरत में नहीं देने वाले।
अगर राहुल और अखिलेश अपनी जिद पर अड़े रहे तो संभव है कि योगी आदित्यनाथ के लिए रास्ता सुगम हो जाए। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए ज्यादा सीटें मांग रहे हैं और उन्हें लगता है कि इस बार कांग्रेस उत्तर प्रदेश में जीतने की स्थिति है। एक बात और सामने आ रही है कि भले ही इंडिया ब्लॉक की ओर से अखिलेश यादव को सीएम-फेस बनाने की चर्चा हो, लेकिन इसी ब्लॉक में कांग्रेस के रहने पर प्रियंका गांधी सीएम-फेस हो सकती है।
कांग्रेस के पास अगर सीटें अधिक आती हैं तो यह मांग खड़ी हो सकती है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए हमेशा ही उर्वर रहा, लेकिन पिछले कुछ सालों से यहां कांग्रेस लगभग समाप्त होती नजर आई। समाजवादी पार्टी ने अपना प्रभाव बनाए रखा।
यहां तक कि अमेटी और रायबरेली जैसी कांग्रेस की परंपरागत सीटों के विधानसभा क्षेत्रों में भी समाजवादी पार्टी की दबदबा बना रहा और संभवतया यही कारण है कि अखिलेश यादव ने अपनी चुनावी कार्यक्रम का आगाज रायबरेली से किया है, जिसे लेकर कांग्रेस के नेता सहमे हुए हैं। कांग्रेस के नेता दबी जुबान से यह कहते हुए भी नहीं सकुचा रहे हैं कि अखिलेश यादव अगर राजनीतिक संदेश देना था तो गोरखपुर से रथयात्रा शुरू करते, क्योंकि उनका मुकाबला तो सीएम से है।
कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय नेताओं ने यहां तक कहना शुरू कर दिया है कि वे भी सैफई और कन्नोज स में कार्यक्रम करेंगे। इस पर समाजवादी पार्टी के नेताओं का कहना है कि रायबरेली लोकसभा की छह विधानसभाओं में समाजवादी चार सीटें जीतती आई हैं, इसलिए विधानसभा का अभियान यहां से शुरू करने में कोई दिक्कत नहीं है। उनका यह भी तर्क है कि समाजवादी पार्टी इन सीटों पर कांग्रेस के सामने कोई प्रत्याशी खड़ा नहीं करती, इसलिए यह यह कहना कि रथयात्रा कांग्रेस को चुनौती है, बेतुकी बात है। उत्तर प्रदेश में 2017 से भाजपा की सरकार है।
इस बार अगर भाजपा यहां से जीत जाती है तो यह हैट्रिक होगी, लेकिन स्थितियां जो है, उसके अनुसार भाजपा की जीत का फैक्टर योगी आदित्यनाथ है। अगर योगी आदित्यनाथ का चेहरा बतौर सीएम नहीं रखा जाता है तो भाजपा को सरकार बनाने के लिए नई रणनीति पर काम करना होगा। अगर योगी आदित्यनाथ ही सीएम-फेस होते हैं और योगी ही टिकटों के निर्धारण में निर्धारक की भूमिका निभाते हैं तो रणनीति बदले बगैर भी सरकार बनाई जा सकती है। यूपी से यह बात भी उभरकर सामने आ रही है कि भाजपा के कुछ विधायकों से भी लोगों की नाराजगी है।
दूसरी ओर इंडिया ब्लॉक के लिए जरूरी कहें या मजबूरी, राहुल और अखिलेश को साथ मिलकर ही चुनाव लडऩा पड़ेगा। यह समझौता दोस्ती के आधार पर होता है या पार्टी के प्लेटफार्म पर, लेकिन ऐसा हुए बगैर अगर अगर भाजपा के सामने कांग्रेस या सपा अलग-अलग आती है तो सपा तो फिर भी भाजपा के सामने टिक पाएगी, कांग्रेस तीसरे नंबर की पार्टी ही बनी रह जाएगी। जरूरत इस बात की है कि कांग्रेस और सपा को एक साथ रहने, चुनाव लडऩे और सरकार बनाने जैसे मुद्दों पर भावुक होने की बजाय यथार्थवादी होकर सोचना होगा।
लेखक
हरीश बी शर्मा
पत्रकारिता का लंबा अनुभव। दैनिक भास्कर सहित लोकमत, निर्भय कलम, लॉयन एक्सप्रेस आदि अखबारों में बतौर पत्रकार कार्य किया। राजसूय के सलाहकार संपादक। राजसूय के संस्थापकों में से एक।