खबर सबसे पहले
राजसूय
अहा!
मैं जाऊंगा किराए की कार करके
अपनी पत्नी को पीहर से लाने
हालांकि मेरा ससुराल जानता है
नहीं है मेरे पास ख़ुद की कार
लेकिन जंवाई जी इतने अच्छे हैं
कि धचके नहीं देना चाहते अपनी पत्नी को -
मेरे बस में नहीं वरना
उड़ता हुआ जाता
और पलकों पर बिठा कर लाता अपनी पत्नी को!
---
अहा!
मैं उतरूँगा मेरे ससुराल में घर के आगे
जैसे ही उतरूँगा
मेरी पत्नी के भाई के छोटे छोटे बच्चे
मेरे पाँव से लिपट जाएंगे
अपनी तोतली बोली में बोलेंगे :
फूंफा जी! मेली तौफी दो!
फूंफा जी! मेला चिप्स का पैकेट!
फूंफा जी! मेली लिमोत वाली काल!
और फूंफा जी
बिछ जाएंगे उनके आगे
फूंफा जी के थैले में से निकलेंगे डेरी मिल्क, कुरकुरे और खिलौने :
सस्ते खिलौने
मगर अच्छे खिलौने!
---
अहा!
मुझे मेरा साला मिलेगा
मुझे मिलेंगी मेरी सालियाँ
जिनके साथ होंगे मज़ाक़
ऐसे वैसे कैसे भी मज़ाक़
वे मुझसे कहेंगे :
"आख़िर आ ही गए जीजाजी / मन नहीं लगा हमारी प्रिया बिना"
और जीजाजी शर्मा जाएंगे!
---
अहा!
मनुहार होगी मेरी
बड़ी कुर्सी पर बिठाया जाएगा कपड़ा मारकर
बर्फ वाला पानी आएगा
मीठी चाय आएगी दाल कचौरी के साथ
फिर खाना होगा
खाने में होगी कैर सांगरी की सब्जी,
आलू की झोल वाली सब्जी,
दही बड़े,
काजू कतली,
रसगुल्ले,
मिर्ची के टपोरे,
तेल की अजवायन वाली पूरी!
---
अहा!
मेरी जंवारी होगी
पांच के नोट दिए जाएंगे
पत्नी सिसकेगी
कि दो चार दिन और रह लेती
मैं हँसूंगा कि रह तो ली तुम पंद्रह दिन
सास उतारेगी आरती
परिंडे में पितर जी के आग सर झुकाया जाएगा
कोई बुआ पीठ पर देगी थापी
मेरे ससुर किसी कोने में अकेले खड़े
देखेंगे फिर से
बेटी को विदा होते
मेरे काळजे में उठेगी हूक
लेकिन मैं कुछ न कर सकूंगा
बैठेगी प्रिया कार में
शीशा ऊँचा नहीं करेगी
हाथ हिलाएगी भीगी आँखों के साथ
बच्चे बोलेंगे :
फूंफा जी! जल्दी आना!
---
रास्ते में
एक चुप्पी रहेगी
मैं बहुत कोशिश करूंगा पत्नी को हँसाने की
लेकिन वह हँसेगी नहीं
लेकिन जैसे ही आने वाला होगा घर
वैसे ही वह मांगेगी चाबी
खोलेगी दरवाज़ा
दूध वाले को फोन करेगी :
आज से फिर डेढ़ लीटर दूध लेंगे -
और ज़बरदस्ती हँसते हुए पूछेगी मुझसे :
चाय पियोगे आप? तो जाओ! आधा लीटर सरस दूध की थैली ले आओ!
---
इस तरह मुक़म्मल होगी
अपनी तरह की पहली कविता
जिसके लिए तरस गई थी समकालीन हिंदी कविता
"पत्नी को पीहर से लाने जाना"!
2.
एक तीस वर्षीय मजदूरनी भाभी के पांवों का सौंदर्य
____________________________________
देखा उसे ईंट के टीले पर
रबर के एक पाइप से पानी का छिड़काव करते -
पांवों में हवाई चप्पल
गुलाबी टखनों पर धूल
पाँव की अंगुलियों में बिछिया
मज़बूत पिंडलियां
जो चमकती हैं जब भी उठाती है वो बोझ
कमर से ऊपर तो देख ही नहीं पाया उसे
कि उस मजदूरनी की
जिससे शादी हुई है
वह मजदूर
मेरे लिए मेरे बड़े भाई राम सामान है
और मैं
उस मजदूरनी का लक्ष्मण हूँ
जो मेरी भाभी है
यह रिश्ता क्यों और कैसे बना :
जानती है केवल मेरी आत्मा!
---
बजरी में धंसते हुए उसके पाँव
जैसे एक गुलाबी भंवर
मटमैले दरिया में
लाल ईंटों से मुक़ाबला करती
उसकी गुलाबी एडियाँ
पिंडलियों पर वे रोएँ
जो नहीं होते किसी ब्यूटी पार्लर में "वैक्स"
बल्कि सूरज की रौशनी ही
जलाती है उन रोओं को
वह लाल किनारी की उधड़ी हुई साड़ी
जिसमें दस बीस रुपये के नोट
जिनसे वह खरीदेगी मिर्च और छाछ
पति के लिए पव्वा
बच्चों के लिए गुड़ मूंगफली
कितना धन्य हूँ मैं
कि मैंने देखी
माँ अन्नपूर्णा आज इस रूप में!
---
अहा!
यह न्यूरो स्पाइन हॉस्पिटल के सामने
एक नलकूप
जिससे बहता है पानी
हीरे जैसा पानी
और इस पानी में रगड़ रगड़ कर साफ़ करती है
यह मजदूरनी मेरी भाभी
अपनी एडियां
ऊबड़ खाबड़ कोटा स्टोन पर!
अहा!
जहाँ जहाँ भी जाएगा यह पानी
उस धरती को हरा कर देगा
जिस जिस पेड़ की जड़ में
जाएगा यह पानी
उस उस पेड़ पर खिलेंगे सबसे सुर्ख़ फूल
अहा!
मेरा जी करता है
एड़ियों का मैल उतारने वाले इस पानी को
कहूँ गंगाजल
कहूँ आबे ज़मज़म
अपनी आत्मा के होंठों से छुआऊँ
यह चरणामृत
अपनी हस्ती को वुजू करवाऊं
सजदा करूँ
इस धरती को
जो अब भी पैदा करती हैं
ऐसा कच्चा और ख़ालिस सौंदर्य!
---
नाम नहीं जानता मजदूरनी का
जिसे भाभी समझ बैठा हूँ
जिसे कमर से ऊपर नहीं देखा अभी
उस बड़े भाई को नहीं पहचानता
जिसे राम कहता हूँ मन ही मन
काश!
कि एक बार छू सकता
मजदूरनी भाभी के पाँव
उन्हें सहला सकता
कर सकता सरसों के तेल की मालिश
चाहता हूँ
कि एक गर्म पानी की बाल्टी लाऊँ
डुबाऊं उसमें मजदूरनी भाभी के पाँव
उन्हें सुखाऊं अपनी पलकों से
पौंछूँ अपने शर्ट की आस्तीन से
और उन बॉलीवुड की महारानियों के आस-पास ही रख दूँ
यह पाँव -
जो चमकते हैं "वीट" और "दस हज़ार की रेगुलर वैक्स से"
---
आह!
यह पाँव
बजरी में धंसने के लिए नहीं बने हैं
यह पाँव तो
अपने साजन के वक्ष पर
धरे जाकर
चुम्बनों के फूलों के लिए बने हैं
ओ मेरी भाभी!
यह लाचार देवर
कैसे पहुँचाए तुझे इस बनते हुए अय्याश मकान से
एक सजे हुए रंग महल तक
जहाँ मेरा राम जैसा भाई
पंखा करे तुम्हारे चेहरे पर अपनी फूंक से
प्यार करे तुझे!
---
मुझे क्षमा करना भाभी
कि यह जानते हुए भी
कि किन रावनों ने तेरा हरण किया है
मैं उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता!
जब तक
कुछ कमीने करते हैं
इस सुंदर धरती पर शासन
तब तक महाकवि निराला के शब्दों में
तुम पत्थर ही तोड़ती रहोगी
चाहे इलाहबाद हो चाहे सीकर ( राजस्थान )
---
जाता हूँ भाभी माँ!
कॉलेज में पढ़ाने जाता हूँ
जहाँ पढ़ाने हैं मुझे
संविधान के मूल अधिकार
अपनी आत्मा को बंदी बनाना है
उस सोने की लंका में
जहाँ विभीषण की तरह राम राम जपता हूँ
रहता हूँ
जैसे जीभ रहती है अकेली
बत्तीस दाँतों के बीच!
---
कमर से ऊपर नहीं देखा तुम्हें भाभी
कमर से नीचे ही देखा है -
मेरा विश्वास करना ओ मजदूरनी!
3.
भैंस के बारे में
__________
बचपन से सुनता आया हूँ
गाय हमारी माता है
लेकिन मेरे दिमाग़ में अक्सर आता है यह प्रश्न -
गाय हमारी माता है
तो फिर भैंस का हमसे क्या रिश्ता है?
___
भैंस
जिसे गाय के बराबर कभी नहीं बिठाया गया -
जिसे इतनी गर्मी लगती है
कि इस पर हर थोड़ी देर में पानी छिड़कना पड़ता है
जैसे सब्ज़ी वाला छिड़कता है
टिन्डे, लौकी, तोरू, टमाटर, भिंडी पर पानी!
---
भैंस
कि जिसकी गर्दन अपने ही बोझ से
थोड़ी झुकी हुई रहती है
जिसके मुँह से टपकती है राल
ज़मीन को छूती हुई
कि जिसके सींग पकड़ कर
मैं बचपन में "भुर्र भुर्र" करके गाड़ी चलाता था!
---
भैंस
जिस पर सवार हो कर
मैं घर के सामने वाले गंदे पानी में
इस तरह उतरता था
जैसे माइकल फेलप्स उतरता था
स्विमिंग पूल में!
---
भैंस
कि जिसकी खुरदरी पीठ पर
मोटी मोटी मक्खियां बैठती थीं
और
मैं झलता था पंखा लगातार
भैंस
कि जिसकी पीठ पर
कौवा खाता था रोटी और भैंस कुछ न कहती थी
ऐसे दृश्य को देखकर ही
क्या पता
मुझमें पड़ा हो कविता का संस्कार!
___
भैंस
कि सर्दियों में जिसे ढकता था मैं जूट की बोरी से
भैंस
कि जिसके नथुने फूल जाते थे गुस्से में
भैंस
कि जिसकी आँखों में
बिलकुल गाय की तरह आँसू आते थे
जब मैं उसे दुलारता था
भैंस
कि जिसे नहलाने के लिए
मैं एक गंदा कपड़ा रगड़ता था गीला करके
भैंस
कि जिसका पेशाब गोमूत्र न था
कि जिसका मल गोबर न था
---
यह भैंस ही थी
जिसका दूध मेरे भीतर स्याही बनकर बोल रहा है
यह भैंस ही थी
कि जब गाय का दूध महंगा था
तो मेरी माँ ने भैंस के दूध की डेयरी बांधी
यह भैंस ही थी
कि जिसका घी था गाय के घी से ठोस
कि जिसका दूध था गाय के दूध से जाडा
कि जिसका दही था गाय के दूध से थोड़ा लाल
---
गाय के चलते
भैंस पर कभी ध्यान ही नहीं गया मेरा
जैसे भाई के चलते
बहन पर नहीं गया ध्यान
जैसे माँ के चलते
पिता पर नहीं गया ध्यान
जैसे इन दिनों
पत्नी के चलते
माँ पर नहीं जाता ध्यान
---
यह कविता
एक क्षमा पत्र है
भैंस नाम की मौसी या बुआ के नाम
जिसने मुझे करवाया स्तन पान
___
भैंस
तेरे नाम से हँसी आती है लोगों को
लेकिन मेरी तो आँखें भीग जाती हैं
तेरा काला रंग
जैसे रात का आकाश
और उससे निकलता हुआ
तारों के रंग का दूध
बाल्टी में बनते हुए झाग
एक एक झाग में सूरज की सतरंगी आभा
---
ऐ दूसरी माँ!
ऐ मेरी जसोदा मैया!
मेरा प्रणाम स्वीकार कर!
4.
महा-भोग
_______
किशनगढ़ - अजमेर - जयपुर डिपो की
राजस्थान रोडवेज की बस से उतरी है वह स्त्री
गोदी में चार - पांच बरस का बच्चा
कंधे पर विष्णु साड़ी भंडार का झोला
नाक में नथनी
हाथों में लाख की चूड़ियाँ
गले में काला धागा
पाँव में रेगजीन की चप्पल
लाल साड़ी फूलों वाली
काला ब्लाउज पसीने से भरा
---
देखकर उसे लगता था
कि बस में जी घबराता रहा उसका
इसीलिए तो वह गई "डोली पुचका सेंटर" के ठेले पर
और उसने पूछा :
"दस के कितने पुचके"
"तीन पुचके एक पापड़ी" सुनकर उदास हुई वह
लेकिन उसने मांगी एक प्लेट
और पहले पुचके के साथ जब खोला अपना मुँह
तो बच्चे ने पकड़ लिया पल्लू
---
पुचके का पानी पिया स्त्री ने
पुचका खिलाया बच्चे को
आलू में से प्याज़ खाया ख़ुद
आलू खिलाया बच्चे को
सड़क के किनारे खड़ा मैं
देखता रहा इस महा - भोग को
---
फिर वही पुचका
पानी पिया स्त्री ने
पुचका खिलाया बच्चे को
आलू में से प्याज़ खाया ख़ुद
आलू खिलाया बच्चे को
---
फिर वही पुचका
लेकिन आख़िरी पुचका
कैसे रोकती वह बाईस - तेईस बरस की स्त्री ख़ुद को
सो, इस बार पूरा पुचका नहीं खिलाया बच्चे को
आधा खिलाया बच्चे को
आधा खाया ख़ुद
और इस जुर्म की सज़ा उसने ख़ुद को यूं दी
कि पुचके का पानी नहीं पिया उसने
बिखेर दिया सड़क पर
अहा!
हे ईश्वर!
तूने माँ को कैसा अजीब और कितना बड़ा दिल दिया है!
---
एक मुड़ा हुआ
पसीने से भीगा बीस का नोट निकाला उसने ब्लाउज से
पकड़ाया पुचके वाले को
पुचके वाले ने दस वापस दिए
और एक पापड़ी में लगाकर हल्की-सी मिर्च और नमक
बच्चे को बोला : "आ कर"
बच्चे के मुँह में डाल दिया!
हे ईश्वर!
मर्द भी इतना बुरा नहीं होता जितना सोचा जाता है!
---
चली गई वह स्त्री
कंधे पर लादा उसने विष्णु साड़ी भंडार का थैला
बच्चे को उठाया गोद में
तबेले मार्केट की टैक्सी की
बीस के बदले पंद्रह का सौदा पटाया
---
कितना स्वार्थी हो गया हूँ इन दिनों
कि सोचता हूँ
काश वह स्त्री कुछ और देर रुकती
तो कविता की दस - पंद्रह पंक्तियाँ और मिल जातीं
---
आँखों के आगे से
हट नहीं रही है वह स्त्री
मेरा दिल एक बड़े पुचके में बदल गया है
मेरा जी करता है
मेरा लहू
पोदीने का नमकीन खट्टा पानी बन जाए
मुझ पर
कोई पुचके वाला नमक मिर्च लगाए
मुझे आधा कोई बच्चा खाए
मुझे आधा कोई स्त्री खाए
और बाक़ी का मैं सड़क पर बिखर जाऊं
---
घर जाना था मुझे
वरना मैं कुछ और देर रुकता डिपो पर
किसी और स्त्री को देखता
रींगस - पलसाना - सीकर की बस से उतरते
देखता उसे "छोटू चुस्की वाला" पर चुस्की चूसते
उसका भी शायद जी घबराया हो बस में
वह भी उल्टी करती आई हो खिड़की से
उसका भी कोई बच्चा हो जो मचलता हो पल्लू पकड़ कर
---
ऐ ऐसे ही महान दृश्यो!
तुम मंदिरों की भीड़
तुम क्रांतियों की भीड़
तुम राशन की भीड़
तुम थिएटर की भीड़ से बहुत अलग हो
बहुत बड़े हो
बहुत रंगीन हो
बहुत ज़रूरी हो
मुझ सादा-दिल के जीवन में
तुम आते रहना
तुम आते ही रहना!
5.
सत्तर-पिचहत्तर बरस देख चुके एक कवि के बारे में
______________________________________
पचास बरस हो गए
लिखते-लिखते कविताएँ
किसको कहूँ
गोल्डन जुबली कितनी चुपचाप गुज़र गई
किसी कवि-गोष्ठी में जाता हूँ
तो बना दिया जाता हूँ
अध्यक्ष - मुख्य अतिथि या विशिष्ट अतिथि
अपनी राय तब रखता हूँ
जब आयोजकों और श्रोताओं को
कार्यक्रम के समाप्त होने की जल्दी रहती है
कितनी ज़रूरी पुस्तकें हैं मेरे पास
अखबारों और पत्रिकाओं के शानदार वार्षिकांक
कौन करेगा इनकी सार-संभाल मेरे जाने के बाद
बेटों को ज़िम्मेदारियों से ही फ़ुर्सत नहीं
और पोते-पोतियों के
ऐसे संस्कार नहीं कि वे भाषा में गहरे पैठें
स्मृति-चिन्हों से भरी पड़ी है अलमारी
मैं जब तब निहार लेता हूँ इन्हें
मेरी पत्नी को यह कोई ख़ास उपलब्धि नहीं लगती
कम से कम मुझे तो वह ऐसा ही दिखाती है
अकेले में शायद वह भी निहारती होगी इन्हें
पत्नियों के बारे में ठोस राय नहीं बनाई जा सकती
कितने अच्छे-भले और अपनी कविताओं से
इस दुनिया को बदलने की इच्छा रखने वाले
मेरे स्कूल-कॉलेज के साथी अलविदा कह चुके
नई कलमों में धार भी है और आग भी
लेकिन मेरा इतना परिचय नहीं है उनसे
चरण-स्पर्श और सादर नमन का ही रिश्ता है बस
फेसबुक पर अकॉउंट भी है मेरा
कभी-कभार कविताएँ भी पोस्ट करता हूँ
बहुत कम लाइक्स और कमेंट्स आते हैं वहाँ
सोचता हूँ कि क्या ये वही कविताएँ हैं
जिन्हें तीस-चालीस बरस पहले जब मैं पढ़ता था
तो मेरे वरिष्ठ इनमें नए युग के संकेत का सूत्रपात देखते थे
मैंने हमेशा यही कहा यही लिखा
कि किसी भी कवि का मूल्यांकन
उस कवि के मरने के बाद होता है
लेकिन यह एक कहने की बात है
कौन मार सका है अपनी महत्वाकांक्षा को
कम से कम इस उम्र में आकर
मुझे बची-खुची बेईमानी भी खुरच कर फेंक देनी चाहिए
अब जब क़ब्र में लटके हैं पाँव
साँस का कोई भरोसा नहीं
तो यही कह सकता हूँ मैं
मुझमें जितना जीवन और उसका अनुभव है
वह सारा का सारा
किसी के द्वारा निचोड़ लिया जाए
क्या ही विडम्बना है कि अब
जब अपना सब कुछ उलीचने को तैयार हूँ
किसी को पनपाने और सींचने को तैयार हूँ
मुझे दूर-दूर तक एक भी ऐसा आदमी नहीं मिलता..
जीवन भर कविताएँ लिखी मैंने
मगर अब जाकर समझा हूँ
कि एक अच्छी
मगर अधूरी कविता का दर्द क्या होता है..!
6.
सौदा
____
एक भिखारी को मैंने दस का नोट दिया -
दस के नोट के बदले
उस भिखारी ने मुझे कई दुआएं दीं :
जैसे ख़ुश रहो
जैसे तेरी नौकरी लगे
जैसे तेरा नाम चले दुनिया में
जैसे तेरी तिजोरी भरी रहे
अगर दस के नोट के बदले
भिखारी मुझे इतनी दुआएं नहीं देता...
तो यह "सौदा" बराबर का "सौदा" नहीं होता!
7.
रिश्ता
____
अगर मैं अच्छा कवि हूँ
तो कवियों को ख़ुश होना चाहिए था
कि उनका एक भाई अच्छा कवि निकला -
अगर मैं बुरा कवि हूँ
तो कवियों को चिंता होनी चाहिए थी
कि उनका एक भाई
अभी तक समझदार क्यों नहीं हो रहा -
लेकिन कवियों का
यह कैसा संसार है प्रभु
कि मैं उन्हीं के वंश में पैदा हुआ हूँ
और वे कहते हैं :
ख़ून का रिश्ता तो दूर
मनमीत से हमारा जान-पहचान तक का रिश्ता नहीं!
8.
तो एक कुत्ता होता
_____________
पिता को नहीं पता
अकेले में मैंने उनकी रूमाल सूंघी है
माँ को नहीं पता
अकेले में मैंने उसकी साड़ी सूंघी है
बहन को नहीं पता
अकेले में मैंने उसका क्लचर सूंघा है
भाई को नहीं पता
अकेले में मैंने उसका बैट सूंघा है
पत्नी को नहीं पता
अकेले में मैंने उसके चुम्बन सूंघे हैं
अगर मैं
इतना कुछ नहीं सूंघता
और अकेले में नहीं सूंघता...
तो एक कुत्ता होता -
आदमी नहीं!
9.
ख़ून और दूध
_________
मेरी दादी के पड़ोस में
एक स्त्री के बच्चा हुआ
लेकिन उसके दूध नहीं उतर रहा था
मेरी दादी ने
उस स्त्री की ननद से कहा
(जो कुछ दिन पहले ही माँ बनी थी)
"बाई! तू इसे बोबा (स्तन) दे दे"
ननद ने स्तन दिया
और बच्चे को आराम मिल गया
मैंने तब जाना यह सबक़ -
ख़ून :
A पॉजिटिव
B पॉजिटिव
O पॉजिटिव
O नेगेटिव हो सकता है...
लेकिन माँओं का दूध एक ही तरह का होता है!
10.
जब मेरा काम हो जाएगा
_________________
मैं इन पत्थरों से
मूर्तियाँ नहीं बना रहा
मैं इन पत्थरों से
छोटे-बड़े पहाड़ बना रहा हूँ -
जब मेरा काम हो जाएगा
तो इन्हें पूजने के लिए नहीं
इन पर चढ़ाई के लिए बुलाऊंगा..
आप सब को!
11.
माँ की एड़ियाँ
_________
ओ मेरी अँगुलियो!
मेरी माँ
मुझे वैसलीन नहीं लगाने दे रही..
इसलिए तुम
माँ की फटी हुई एड़ियों में
वैसलीन की तरह भर जाओ..!
12.
डगर पनघट की
_______________
तुम कितने मुतमइन हो
कि पानी तुम्हें डुबा देगा-
जबकि मैं
ऐसे कितनों को जानता हूँ
जिन्हें पानी ने
हल्का समझकर..
ख़ुद से बाहर फेंक दिया!
13.
थोड़े ज़्यादा दिन
___________
मैं नहीं कहता
अपने जाने के बाद
आपको हमेशा याद आऊंगा
मुझे भूल जाना
आपका हक़ बनता है
और इससे ज़्यादा
आपकी ज़िम्मेदारी
लेकिन मैं
थोड़े ज़्यादा दिन याद आऊंगा!
14.
जीवन की तरह
__________
अरे बाप रे!
एक कविता में इतने सारे शब्द?
क्या इस कवि ने
कविता को भी
जीवन की तरह बकवास समझ लिया है?
15.
इस फूल को
________
इस फूल को ध्यान से देखो :
यह फूल किसी का चेहरा है
जैसे बनता हुआ चेहरा!
इसी फूल को और ध्यान से देखो :
यह फूल किसी की मुट्ठी है
जैसे खुलती हुई मुट्ठी!
16.
कच्ची मौत
________
जैसे सब चुपचाप कोई कहानी सुन रहे हों
और एक आदमी खड़ा हो कर कहे
आप सब बहुत बुरी तरह बोर कर रहे हैं
और वह दरवाज़ा भचीड़ कर चलता बने -
जैसे किसी को समझ नहीं आए :
हुआ तो हुआ क्या?
हुआ तो हुआ कैसे?
17.
जब तक
______
कितना मुश्किल है
लावे को लावा रखना
कि जब तक
किसी साँचे में नहीं ढल जाए-
कितना मुश्किल है
कविता को कविता रखना
कि जब तक
कोई इसे नहीं पढ़ ले!
18.
आग
____
हम किसी को
आग नहीं लगाना चाहते -
लेकिन हम
अब तक इसीलिए बचे हुए हैं
कि हमारे घरों के चारों ओर
आग लगी हुई है!
19.
कला में भी
___________
कला में भी
यह आईपीएल का समय है-
हम
जो रणजी खेल रहे हैं
हमें शायद ही कभी गिना जाए!
20.
कविता से ज़रूरी
_____________
ख़ाली बैठे रहने से
या सिर्फ़ इंतज़ार करने से
या माहौल बनाने से नहीं आएगी कविता
बहुत ज़रूरी काम कर रहे होगे
दिमाग झोंक रखा होगा सारा
जीने मरने जैसी दिनचर्या के बीच आएगी कविता
तुम बेचैन हो जाओगे
कहां लिखूं
न काग़ज़ होगा न कलम
मोबाइल होगा मगर वक़्त नहीं होगा
हर ज़रूरी को धता बताते हुए आएगी कविता
साबित करेगी कविता
कि कविता से ज़रूरी कुछ ज़रूरी नहीं होता !
21.
यहीं और इन सबके बीच
___________________
सूरज मेरे दादोसा हैं
धूप मेरी दादीसा हैं
आसमान मेरे पापा हैं
धरती मेरी मां है
चांद मेरे ताऊजी हैं
चांदनी मेरी ताईजी हैं
आंधी मेरी मासी है
धोरे मेरे चचेरे-ममेरे भाई हैं
बकरियां मेरी बहनें हैं
गाएं और भैंसें मेरी बहनों की सहेलियां
खेजड़ी मेरा बरामदा है
नीम मेरा कमरा है
पानी की टंकी मेरा घड़ा है जहां तक मेरा हाथ नहीं पहुंचता
बाजरा और कांदा मेरा खाना है
खेती मेरा पुश्तैनी काम है
गलियां मेरा बाज़ार है
सड़कें मेरे लिए परदेस
मैं
यहीं और इन सबके बीच जीना मरना चाहता हूँ !
22.
23.
तमीज़
_____
यह ठीक बात है
कविता से रोटी नहीं मिलती -
लेकिन कविता से
भूखे के साथ
रोटी बांटने की तमीज़ आती है !
24.
कवयित्री रेणुका सक्सेना जी के नाम
__________________________
B 98, मानसरोवर, जयपुर में रहती हैं
श्रीमती रेणुका सक्सेना, पूर्व PGT केंद्रीय विद्यालय
पति भी सेवानिवृत्त हो चुके हैं
बेटे सैटल हैं बंगलौर और चेन्नई में!
---
लेकिन इतना ही परिचय नहीं है
श्रीमती रेणुका सक्सेना का
किसी भी स्त्री का परिचय
नहीं आ सकता दो पंक्तियों में
स्त्री के परिचय के लिए
लिखी जानी चाहिए होती है एक कविता -
क्योंकि स्त्री : अनिवार्यतः एक कविता होती है :
अच्छी, औसत, बुरी, बहुत अच्छी
यह सब बाद की बात है!
---
शौकिया कविताएं लिखती हैं रेणुका जी
गले में मोतियों का हार
गुलाबी, फिरोजी या बैंगनी सलवार सूट
लम्बे खुले बाल उनमें एक छोटा क्लचर
माथे पर मोटी लाल बिंदी
कंधे पर रेगज़ीन का पर्स जो लेदर का लगता है
पाँव में हील की सैण्डल
ताकि हाइट पांच फुट एक इंच के बजाय
कम से कम पांच फुट चार इंच लगे
---
रेणुका जी को लगता है
कि वे बहुत काबिल कवयित्री हैं
लेकिन असल में ऐसा है नहीं
कविताओं के नाम पर
गिने चुने विषय हैं उनके पास
जैसे : मायके लौटी बेटी!
जैसे : बाबा! मुझे परदेस क्यों भेजा?
जैसे : चाँद बनकर आना तुम मैं चांदनी बन जाऊंगी!
जैसे : रात भर आँखों से गिरती रही ओस!
जैसे : नींद नहीं आई रात भर / करवटें बदलते रहे हम!
---
इन औसत और कामचलाऊ कविताओं से परे
उनके पास बस एक अच्छी कविता है
और वह कविता है :
सरस्वती माँ की वंदना
इसी सरस्वती वंदना के कारण
बुलाई जाती हैं रेणुका सक्सेना
छोटी-मोटी कवि गोष्ठियों में
इसी सरस्वती वंदना से
होती है शुरुआत
लोकल कवि सम्मलनों की
और इसी सरस्वती वंदना के कारण
रेणुका सक्सेना जी को यह वहम हो गया है
कि उनकी जल्दी शादी नहीं होती
तो वे भी होती कोई बड़ी कवयित्री
जयपुर, भोपाल, कलकत्ता, लखनऊ
कहीं तो ज़रूर होती वे
---
पांच कविता-संग्रह आ चुके हैं रेणुका जी के
पांचों कविता संग्रह अस्सी पन्नों के हैं
पांचों ही राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशित
कोई पूछता नहीं तब भी
रेणुका जी आगे से बढ़कर बताती हैं :
"मैं आपको मेरी पुस्तक देती लेकिन क्या करूँ प्रतियाँ समाप्त हो गईं"
---
और इस तरह
रेणुका जी उठाती हैं अपने क़द को
और इस तरह
रेणुका जी स्थापित करती हैं स्वयं को
साहित्य में गहरे तक
और इस तरह
रेणुका जी छठवें कविता संग्रह की
तैयारी करती हैं
और इस तरह
रेणुका जी
अपने जीने को देती हैं एक ज़रूरी मक़सद
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आपको लग रहा होगा
यह मनमीत
रेणुका जी का उपहास उड़ा रहा है
जी नहीं!
बल्कि मैं तो
रेणुका सक्सेना को अपना आदर्श मानता हूँ
दरअसल कोई कवि औसत नहीं होता
अंदाज़-ए-बयाँ को थोड़ा-सा साधते ही
कोई भी साक्षर लिख सकता है ठीक-ठाक कविता
कविता कोई रॉकेट साइंस नहीं है
कविता नहीं है आई आई टी या नीट या जी का पेपर
कविता नहीं है आई ए एस की परीक्षा
कविता एक सीली बेचैनी है
कविता एक नीली आग है
कविता सूखी घास है आग के इंतज़ार में
कविता लावे का खौलता पानी है काले पहाड़ पर झरने-सा बहता
और मैं
अपनी हल्की फुलकी कविताओं की क़सम खाकर कहता हूँ
कि रेणुका सक्सेना
एक क़ाबिल कवयित्री हैं
हालांकि यह बात
उन मठाधीशों को समझ नहीं आएगी
जिनकी रोज़ी रोटी
रेणुका सेक्सेनाओं और मनमीत सोनियों को
खारिज करने के धंधे से ही चल रही है!
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रेणुका सक्सेना
कविताएं लिखकर
भुलाती हैं इस दुःख को
कि उनके बेटे नहीं आए दीवाली पर
रेणुका सक्सेना
कविताएं लिखकर
भुलाती हैं इस दुःख को
कि उनके पति उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद भी समय नहीं देते
रेणुका सक्सेना
कविताएं लिखकर
भुलाती हैं इस दुःख को
कि वे नहीं बन पाई टॉप की कवयित्री :
जबकि इतना मीठा तरन्नुम है उनका!
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इस बार
जब मैं जयपुर गया
तो मुझे मिली रेणुका सक्सेना जी
उनके चेहरे पर
इस बार सतही ख़ुशी नहीं
ठोस उदासी थी
मैंने
जब धोक खाई
तो उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया
न जाने
मुझे क्या हुआ
कि मैं भी फूट कर रोने लगा
शायद
मेरे भीतर भी बहुत गहरे में
एक टॉप का कवि बनने की इच्छा थी
मेरी इस इच्छा ने
रेणुका सक्सेना की इच्छा की सहेली को पाकर
बहुत देर तक अपना दुःख बाँटा!
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रेणुका सक्सेना जी ने
रेगज़ीन के पर्स से निकाली अपनी कविता-पुस्तक
थरथराते हुए हाथों से
किये उसके पहले पन्ने पर हस्ताक्षर
और लिखा :
"प्रिय मनमीत को! समीक्षा के लिए नहीं! बस पढ़ लेने के लिए!"
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दोस्तो!
इससे आगे मुझसे नहीं लिखा जाएगा
धूज रहे हैं मेरे हाथ
आँखों के आगे पानी आ रहा है
बस इतनी-सी बात कहना चाहता हूँ :
रेणुका सक्सेना जी के पास अब दो कविताएं हैं :
पहली : सरस्वती वंदना!
दूसरी : "प्रिय मनमीत को! समीक्षा के लिए नहीं! बस पढ़ लेने के लिए!"
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दोस्तो!
रेणुका सक्सेना
अब एक टॉप की कवयित्री हैं
क्योंकि
बची-खुची महत्वाकांक्षा का कीचड़ भी
धो दिया है
उनके आंसुओं के गंगाजल ने!
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मनमीत
लेखक
मनमीत सोनी
आज के दौर के खासे चर्चित बल्कि विवादों में रहने वाले युवा कवि मनमीत सोनी की अब तक चार किताबें आ चुकी हैं। सहायक आचार्य के रूप में कार्यरत हैं।