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१.ज़मीन
पैरों के पास सिर्फ यही है खड़ा होने के लिए
टिकने के लिए जमीन
उड़ने के लिए पंख की तरह है
जिनके पास पंख है
वे उड़ लेते हैं देर-सबेर
जमीन का एक धुर
पृथ्वी का एक हिस्सा है
एक टुकड़ा उम्मीद
बस जरा सा पानी फटे हुए सूखे कंठ के लिए
लेकिन इतने से जान बच जाती है
जो अपनी जमीन नहीं बनाते हैं
उनके लिए मुश्किल बहुत है
उनकी जिंदगी घास फूस खर पतवार की
एक ऐसी दुनिया है
जिससे निकलने में खत्म हो जाती है उम्र।
२.पोखर किनारे
आबाद पानी में न जाने कितने जीव सांस लेते हैं
वे कभी जलकुंभी के बीच में सिर उठाते हैं
कभी किनारे बैठ कर छलांग लगाते हैं पानी के बीच
तब लहरों से पता चलता है कि
पोखर में सांस की लहर उठती है
यही पोखर सूख जाएगा एक दिन वैशाख के बाद
कटोरी की तरह खाली हो जाएगा
तब कहां जाएंगी ये सिर उठाने वाली सांस
वे पंख जो डुबकी लगाकर देह हिलाते थे पानी के बीच
फिर कहां अपनी चोंच धंसाएंगे
कहां जाएगी यह पसरी हुई जलकुंभी
कहां जाकर खिलेंगे जलकुंभी के नीले फूल
पोखर किनारे पैरों की छाप चलती थी कभी
अब पोखर किनारे उड़ती है गर्म धूल
जो उठती है पोखर के गर्भ से हवा के साथ और
फैल जाती है शोक संदेश की तरह सभी दिशाओं में।
३.घड़ी का रंग
चीजें अक्सर बदल जाती हैं समय के साथ
जैसे घड़ी का रंग बदल जाता है
उड़ती हुई धूल कलाइयों पर पहले जगह बनाती है
फिर समय के भीतर तक जाती है पहुंचधीरे-धीरे
जो दरवाजे बंद रहते हैं बहुत दिनों तक
उसके छप्पर पर गिर जाता है एक अदृश्य पहाड़
और पूरा घर एक दिन खंडहर में बदल जाता है
पहले भी कोई नहीं रहता था
अब और कोई पलट कर देखने नहीं आता है
पानी जमा हुआ पीने लायक नहीं होता
छूटे हुए पंख उड़ने लायक नहीं होते
टूटी हुई नींद सोने लायक नहीं होती
सूखे हुए फूल हंसने लायक नहीं होते
रेत में बदल गई नदी बहने लायक नहीं होती
रुकने से एक तो गति टूट जाती है
दूसरी टूट जाती है सांस
फिर उस रफ्तार को पाना बहुत कठिन होता है
जो वर्षों का हासिल थी
समय के साथ सिर्फ घड़ी का रंग नहीं उड़ता
समय का रंग भी धूसर हो जाता है
चमकता हुआ समय एक दिन हो जाता है मटमैला
कीचड़ में सना हुआ इतना कि पहचान में नहीं आता
लोग उसकी तस्वीर दीवार से उतार कर नदी में बहा देते हैं
या छोड़ आते हैं किसी पीपल की जड़ में एक दिन।
४.तुम्हारे हाथ
छूने के लिए बढ़ते मेरे हाथ
हवा में टहनियों से लिपट जाते हैं
उनके पास फूल की एक ऐसी कोमलता है जो
बताती है कि इस कठिन और ऊसर समय में भी
स्पर्श की भाषा बची हुई हैं
वही स्पर्श भरोसे की नींव है
जिसपर टिका मैं हवा में
उम्मीद से लहराया करता हूं
तुम्हारे हाथ में फंसा कर अपना हाथ
जैसे एक टहनी फंस कर दूसरी से
आंधियां झेला करती हैं वर्षों।
५.पुल का ढहना
इन दिनों रोज कहीं न कहीं गिर रहे हैं पुल
जो नए बने थे कुछ दिन पहले नदी के ऊपर
या बने थे साल भर पहले सड़क के बीच
या अभी बन रहे थे दो धार के बीच
पुल की नींव मजबूत थी
उसका शिलान्यास ठोस था
उसके पत्थर में पहाड़ की जिद थी
उसके सीमेंट में भरोसे का लोहा था
फिर भी कुछ काम नहीं आया पुल के
पुल ढह गया एक रात
कभी सुबह में पुल ढहा जब सूरज निकलता है
कभी रात में ढह गया और
चीख चार गांवों तक गूंजती रह गई
कभी भरी दोपहर में
जब बच्चे खेल रहे थे आसपास
एकाएक जोर की आवाज हुई और
पुल नदी की छाती में
धंस गया एक कील की तरह
दूरी पैदा कर अपनी रोटियां सेंकने के समय में
पुल तो बहुत तरह के थे जो बन रहे थे
लेकिन कितने मजबूत थे
ये कोई नहीं बता सकता
उनके ढहने का कारण सिर्फ यही था कि वे पुल थे
वे जोड़ सकते थे दो छोर
वे पाट सकते थे तनाव की दूरियां
लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं
उनका पुल होना उनके गिरने के लिए काफी था
लेखक
शंकरानंद
देश की लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होने वाले कवि शंकरानंद शिक्षक हैं। साहित्य लेखन के साथ अनुवादकर्म भी सतत जारी है।