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काव्य

काव्य: नंद भारद्वाज की कविताएं

नंद भारद्वाज की कविताएं
राजसूय
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राजसूय 

रेत के समंदर में

चिलचिलाती धूप के उस पार 

फैला हुआ जो दीखता है दूर तक दरिया 

छितराई दीठ में हर पल 

अनवरत   आगे और आगे - 

जिसे पाने की उम्‍मीद में 

चराचर भागते रहते हैं दिशाहीन

और थका-हारा सूरज 

रोज विलग जाता है रेत के समंदर में  

थक कर सो जाते हैं 

सूखी आंखों के अनमने सपने 

एक उदासी पसर जाती है इस रूखे संसार में !  

 

बरसों बाद 

जब उन्हीं पगडंडियों को खोजते  

पलटकर आते हैं वही पांव

थोड़ी-सी नमी

और सूनी आंखों में छुपाते 

एकाकी मन की प्यास 

इस कोसों पसरे थार के अधबीच,

छितरे दरख्त और कंटीली झाड़ियां 

धीरज बंधाते हैं कि कहीं 

गहरे में सहेजकर रखती है पृथ्‍वी 

अपना जीवन-जल !   

सांय-सांय बजती 

अराजक आंधियों के पार 

बची रहती है

जीवन की अनंत संभावना ! 

                

सुबह की पहली किरण से 

उजास के अन्तिम छोर तक 

सब कुछ जैसे सिमटकर रह गया है 

रेत के अंतहीन विस्‍तार में।  

प्‍यासी हवाएं बेरोक निकल जाती हैं 

इस अधबने जीवन के आर-पार 

जिसे बसाया था हमारे पुरखों ने 

बेशक न सुझा पाएं कोर्इ निरापद रास्‍ता 

पर रातों में हवा की नमीं 

अक्‍सर याद दिलाती है 

कि एक दरिया पसरा है कहीं गहरे में – 

इतनी निर्जल भी नहीं हैं हमारी स्‍मृतियां 

और न इतना अलक्षित अन्‍त:सलिला का आवेग !

 

बेहतर समय की आस में 

 

एक बेहतर समय की आस में  

अपने को बहलाए रखा यों ही बरसों बरस, 

कहीं कुछ होने की उम्‍मीद में 

गुजर जाते रहे दिन-रात -  

न मिला कभी बांह को संबल,  

न पलक भर आंख ही झपकी 

जिस अन्‍यतम की आस में 

गुजार दी आखी उम्र   

जाने कितने दिवस-महीने-साल।  

 

क्षितिज तक फैली धुंध के अध-बीच  

खोजता रहा इसी सयानी दुनिया में  

किसी अनन्‍य के होने के आसार    

किनारों से लौट जाती रहीं 

समय की लहरें बेआवाज 

समंदर की अतल गहराइयों में 

यों ही मर्ज होता रहा गूंगा शोर 

ज्‍वार चढ़ता उतरता रहा 

बनती-बिखरती उम्‍मीदों के 

अनमने अभ्‍यास में। 

 

अपने एकान्‍त से 

 

एक सहज-सी मुस्‍कान 

सजाए अपने चेहरे पर

                                                                                                                                जब भी आता हूं 

अपने एकान्‍त से बाहर, 

अन्तराल के पायदानों पर रखता 

अपने पांव, उतर जाता हूं  

अन्तस की गहराइयों में मौन 

न उभरती है कोई आशंका

न कोई कामना अव्‍यक्‍त । 

 

करीब से गुजरते समय के साथ 

जब भी उलझने लगते हैं मेरे सवाल    

सहमने लगता है अनायास  

पनीली स्‍मृतियों का अधबना संसार   

आधी रात में  किसी टूटते तारे की 

लकीर-सी खिंच जाती है अकस्‍मात

एक अनाम अनिश्‍चय पसर जाता है 

मन के अनंत आकाश में । 

 

अपनी इस अथाह बेचैनी  को लेकर 

अब कहाँ जाऊं मैं, 

किस ओट रखूं  उलझे मन की गुत्थियां, 

किसे दिखाऊं अपने अंतस का संताप, 

दौड़ता रहता है जो देह की धमनियों में अहर्निश,  

कोई भी तो नहीं है स्वायत्त अन्तर्मुक्त , 

जिसे सौंप दूं अपना असमंजस  निर्विघ्न 

और विलीन कर दूं बचा हुआ अस्तित्व 

उसी के आगोश में !

 

यही विडम्बना है जीवन की,  

अपनी ही बीहड़ उलझनों में 

उलझे हुए हर पल, 

हर रास्ता अवरुद्ध लगता है 

और हम अपने ही एकान्‍त में आबद्ध ।

 

कहीं तो होंगे अभयारण्य

 

जब उलट-पलट गई हो सारी कायनात 

हवा के शोर में डूबी भयातुर चिड़ियों की चहकार

कौन जाने कितने पेड़ बच रहे होंगे

कितने परिन्दे रहे होंगे सलामत   कितनी झाड़ियां 

प्रजातियां कौन-कौन-सी शेष रह गई होंगी    

                   इस अशान्त बियाबान में !

 

सूक्ष्म जीव-जन्तुओं की नियति को 

यदि छोड़ भी दिया जाय उन्हीं के हाल पर,

तब भी अंवेरने संवारने को 

बहुत कुछ बच गये होंगे 

संभावित जीवन के अवशेष

                इस तूफान में ।

 

इस सामने दीखते 

घायल बरगद की छांव में 

कितने शरणागतों को मिला होगा आसरा

जिसे पुरखों ने बड़े चाव से 

उगाया था बस्ती के बीचो-बीच

ऐसे न जाने कितने और दरख्त 

उखड़ कर बह गये होंगे 

समय के टूटते प्रवाह में !

 

परिन्दे नहीं जानते कि समय 

कैसा बरताव करेगा उनके साथ

जब सारे हलके में कहर मचा होगा

वे उड़ते रहेंगे क्षितिज के आर-पार 

जहां हरे-भरे खेत होंगे - 

            लहलहाती फसलें होंगी

ढलानों पर दूर-दूर तक पसरी होगी हरियाली 

कहीं तो होंगे अभयारण्य 

दुर्लभ पक्षियों के समूह 

अचानक उड़ जाने का अनचाहा अहसास 

इन रूखे-सूखे दरख्तों की देह में

ऐसे ही आएगी बहार 

ऐसे गुजर जायेंगी 

        समय की बेरहम दुश्‍वारियां !

नंद भारद्वाज

लेखक

नंद भारद्वाज

हिन्दी और राजस्थानी में कवि, कथाकार, समीक्षक और संस्कृतिकर्मी के रूप में सुपरिचित। कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, संवाद और अनुवाद आदि विधाओं में निरन्तर लेखन और प्रकाशन। जनसंचार माध्यमों में सम्पादन, लेखन, कार्यक्रम नियोजनऔर पर्यवेक्षण के क्षेत्र में चार दशक का अनुभव।

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