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काव्य

दृश्य: प्रियंवदा पाण्डेय की कविताएं

प्रियंवदा पाण्डेय की कविताएं
राजसूय
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1-दृश्य 
 
गवाक्ष के पार
जहाँ बैठकर कभी देखा करती थी 
बरसात की बूँदों मे नृत्य करती 
तुम्हारी भंगिमाएँ 
आसमान से बरसती धवल कणिकाओं से सराबोर धरा का सब्ज़ अंगिया
रह-रहकर दहकते पलाश-से
खिलते सूरज के साथ
चमकते सप्तरंग पृथ्वी के 
कैनवास पर 
 
सुनती थी तुम्हारे स्वर की मधुरिम पक्षियों की 
कलरव मे 
आज उसी पटल पर 
शान्ति के इन महान क्षणों 
मे जीवन लिख रहा है 
सबसे उदास कविता 
चुकती जा रही है आकान्क्षा की स्याही। 
साँस की नीरस कलम 
गाना चाहती है मर्सिया जोर-जोर से 
संसार के बृहद रंगमंच पर 
पल-पल बदलते चित्र और चरित्र के मध्य
गिर रहा है छद्म का परदा 
मर रहा है
प्रतिपल कोई जीवन नेपथ्य मे।
 
प्रियंवदा पाण्डेय 
 
2-शान्ति 
 
मैं यदि लेट जाऊँ
जीते जी कब्र की मुद्रा में 
मसलन बंद कर दूँ सभी तरह की अभिव्यक्ति
और प्रतिक्रियाएँ।
चुप रहूँ जैसे चुप रहता है 
पत्थर-पहाड़;
नदी और परछाईयाँ 
चुप रहता है पेड़ चुप रहती हैं 
जड़ें
शैवाल,कवक और काईयाँ।
ठहरकर देखती रहूँ समय का उपद्रव 
शीत-नदी की तरह।
कोई बताए मेरे दुश्मन 
तब नहीं करेंगे मेरा पीछा 
मेरा नुकसान 
निन्दाचार 
नहीं खेलेंगे कपट का कोई खेल?
खेलेंगे!
और जोरदार तरीके से खेलेंगे
तलाशेंगे बिन्दु-दर-बिन्दु 
जहाँ झपट लें मुझे
मेरे यह सोच लेने से कि नहीं है 
कोई मेरा शत्रु इस ब्रह्मांड में 
लोग नहीं बदलते 
बस 
मन शान्त हो जाता है
मिथ्या अपने काल्पनिक रूप में 
अत्यधिक सत्य है।
यद्यपि
शान्ति 
उस अधूरे पुल का नाम है 
जो सरकारें बदलने से अपूर्ण रह जाता है 
ख़त्म हो जाती हैं पीढ़ियाँ 
उसके स्वप्न आँखों में लिए।
 
प्रियंवदा पाण्डेय 
 
3- इस समय जब हम 
कुछ भी
लिखना भूल गए हैं
मन घनेरे स्याह बादलों से आच्छादित 
फटेपट-सा 
रह गया है।
कविता ने तैरना बंद कर दिया है 
आस-पास 
विचार भोथरे और पस्त पड़ गये हैं
नहीं बह रही है 
भाव की पवित्र और शीतल मंदाकिनी।
फूल खिल और मुरझा रहे हैं 
अपने संपूर्ण 
सौष्ठव में
आशा का कोई 
भ्रमर गुन्जार नहीं करता।
 
मछुआरे दौड़ रहे हैं 
इसपार से उसपार 
बेड़ा पार नहीं होता।
दिन हँस रहा है 
हमारी नादानियों पर 
अपनी प्रचंडता के साथ
और बढ़ती जा रही है 
उष्णता।
 
रात रोती है कुत्ते रोते हैं 
और रो रहा है वातावरण का 
सियापा।
तब जब घायल हो गयी है 
चेतना 
सुन-सुनकर 
करुण विलाप 
एक वाक्य गूंजता है 
मनुष्य ही मनुष्यत्व 
के विरूद्ध 
सबसे खतरनाक हथियार है!
 
प्रियंवदा पाण्डेय
 
4-मेरा पता
 
उन्हें नहीं पता है
मेरा पता 
वह मुझे ढूंढतें हैं 
अपनी ही पाठ्यचर्या में 
और मैं 
कहीं नहीं मिलती
वह सोचते हैं 
मुझे स्वनिर्मित मानदंडों 
के भीतर और 
मैं फिट नहीं बैठती
वह देते हैं 
मुझे अलग-अलग
उपमाएं बार-बार 
हरबार ।
और मैं अनुपमेय 
रह जाती हूं 
मेरे व्यक्तित्व की 
हजार बार हत्या 
करने वालों को 
नहीं पता 
मैं कोई नाम नहीं 
कोई शब्द नहीं 
कोई वस्तु नहीं 
मैं सृष्टि का अधूरा पाठ हूं 
जिसे पढ़ा नहीं 
गया
अदद रात हूं जिसके अंधकार को 
भेदा न जा सका
वह चिड़िया हूं जो हर रात रोती रही 
संसार के परकोटे बैठ 
और किसी से सुना न गया
मैं सदियों से चली आ रही 
प्रताणना का अपठित पाठ हूं 
जिसे पढ़े जाने की प्रतीक्षा है 
ठीक-ठीक 
मौलिक रूप में ।
मुझे ढूंढना हो तो 
देखना किसी निरीह 
बच्ची की आंख 
जहां कोई ध्रुवतारा नहीं 
उगता
जहां पानी की जगह 
विशाल रेतागार है
जिसकी रक्तिम डोरियों में 
खून की जगह 
आग प्रवाहित होती है।
 
देखना नदी की दरकती
अरार 
जहां भटकती हैं अनंत 
आत्माएं 
अपने-अपने स्वर्ग की 
तलाश में ।
फड़फड़ाती पाल 
गाती है अगम का गान
प्रतिपल दौड़ता है 
मृत्यु का घड़ियाल और जीवन 
बलवान हो उठता है।
 
देखना वह कंदरा जहां 
कराहती है प्रेम में मारी गई औरत 
आज भी 
जहां खिलता है रक्त की जगह 
सफ़ेद पलाश 
काला पड़ गया है नदी का पानी 
वहीं मिलूंगी 
किसी रेतकण पर ठहरे 
ओसबिंदु में 
झिलमिल करती
पल-पल जन्म लेती 
पल-पल मिटती हुई।
 
प्रियंवदा पाण्डेय 
 
5- अनुपस्थिति 
 
जब हम बेहद उदास होते हैं 
यह दिन और 
रातें भी उदास 
लगती हैं 
नहीं दिखता है 
कोई 
रंग फूलों में;न गंध 
महसूस होती है।
 
आसमान दिखता है 
वैधव्य की चादर ओढ़े 
नहीं करती है
आनंद की 
जुगाली धूप
हमारी चौखट पर ।
वनस्पतियां गिरफ्तार होती हैं 
अज्ञात चुप में ।
किसी के विरह में शिथिल रहती है 
नन्हीं चिड़िया।
 
नहीं कूकता है कोई सारस साथी 
के प्रणय में ।
पुष्कर में प्राण खोने को विकल 
रहता है 
इंदीवर ।
 
एक निषेधाज्ञा-सी दिखाई देती है  
पूरी पृथ्वी पूरी प्रकृति पर।
 
प्रिय!
तुम्हारी अनुपस्थिति 
कितना कुछ बदल देती है।
 
प्रियंवदा पाण्डेय

प्रियंवदा पाण्डेय

लेखक

प्रियंवदा पाण्डेय

संस्कृत, हिंदी और मनोविज्ञान में परास्नातक प्रियंवदा पाण्डेय के अब तक चार कविता संग्रह आ चुके हैं। आलोचना के क्षेत्र में ख्याति।

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