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राजसूय। “मेरी आत्मकथा में आप का हिस्सा सबसे बड़ा होगा रमेश भाईसाहब“ बाइक के पीछे बैठे राहुल ने रमेश की पीठ पर दोनों हाथ रखकर बड़े शान से ये बात कहीं। ये बात सुनकर रमेश भी खुद को कुछ विशेष महसूस कर रहा था। किसी की आत्मकथा का हिस्सा बनाना वो भी एक विशेष ये भाव रमेश को रोमांचित कर रहे थे। वैसे हम सब किसी ना किसी की आत्मकथा के भाग होते ही है। कभी जानबूझकर तो कभी अनजाने में । पर रमेश इस बात से इतना अधिक खुश था कि उसने भी वापस कहा कि मैं भी जब आत्मकथा लिखूंगा तो तुम सबसे खास भाग बन जाओगे। रमेश और राहुल की इस धमाकेदार दोस्ती को अभी 2 साल ही हुए थे। रमेश एक शिक्षक है और बच्चों को हिंदी पढ़ाता था उसके पढ़ाने के अंदाज से बच्चों में बड़ा क्रेज था उसका। राहुल अभी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है उसे पता चला तो उसने व्याकरण पढ़ाने का आग्रह किया पर रमेश केवल 12 वीं तक के विद्यार्थियों को ही पढ़ाता था उसे प्रतियोगी परीक्षाओं में पढ़ाने का अनुभव नहीं था। पर राहुल ने जब ज़ोर देकर आग्रह किया तो रमेश मान गया। रमेश ने राहुल बुलाया और कहा कि - देखो तुम मेरे हमउम्र हो तो मैं तुम्हारा शिक्षक नहीं बल्कि साथी बनूंगा जो तुम्हें आए तुम पढ़ाना और जो मुझे आए मैं पढ़ा दूंगा। जैसा भी हो मैनेज कर लेंगे। इससे राहुल बहुत ईजी हो गया। अक्सर जब हम सीमाओं के दायरे बढ़ाते है तो गैर जरूरी हस्तक्षेप भी बढ़ने लगता है। राहुल और रमेश अब दोस्त थे। रमेश ने तो कुछ दिन ही उसे पढ़ाया था जल्द ही क्लास पर पूरा नियंत्रण राहुल का होने लग गया पर इससे रमेश को कोई दिक्कत नहीं थी और शायद उस समय तक राहुल को भी नहीं। दोनों के मध्य ये अलिखित संधि थी कि हम रोजाना 2 घंटे पढ़ेंगे पर ये संधि ज्यादा लंबी नहीं टिक पाई संधि की शर्तों को आपसी रज़ामंदी से तोड़ा गया था इसलिए इसका सारा दोष परिस्थितियों पर डालकर दोनों ने संधि तोड़ने के पाप से एकदूसरे को बचाया। कालांश 2 घंटे से 4 घंटे हो गया पर पढ़ाई आधे घंटे भी नहीं हो पाती थी। राहुल और रमेश एक जैसी पृष्ठभूमि के दो नवयुवक थे वे जब मिलते तो बातों का सिलसिला खत्म ही नहीं होता था। क्लासिक साहित्यकारों की बड़ाई और समकालीन साहित्य की स्थिति पर चर्चा करना उनका पसंदीदा विषय होता था। किसी किताब में कुछ नया पढ़कर या किसी कवि की किसी पंक्ति को देखकर वे झूम जाया करते थे। रमेश प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी लगभग छोड़ चुका था या यूँ कहूं कि घरवालो को दिखाने के लिए फॉर्म भरता था और पेपर देकर आ जाया करता है। दूसरा अब उम्र भी बढ़ रही थी। वैसा जोश नहीं था। पर राहुल ने इस बुझ चुकी सी अनल को फिर हवा दे दी। वो बोला करता था " रमेश भाईसाहब आप तैयारी क्यों नहीं करते? आप कर सकते है।“ रमेश को इसी दिन का इंतजार था कि कोई उसके कंधे पर हाथ रखें और उसे हिम्मत से भर दे। वास्तव में हम सभी अपनी क्षमताओं से परिचित होते है पर उसे बहानों की कम्बल से ढ़क देते है और इंतजार करते है कि कोई आए और एक झटके में उस कम्बल को खींच दे हालांकि जब जब सच ऐसे सामने आता है तो हममें वो हिम्मत नहीं बचती कि हम उसे स्वीकार कर पाएं। हम छटपटाते है, परेशान होते है और अंततः या तो उसे दुबारा ढ़क देते है या यूंही छोड़ देते है उसे नंग-धडंग। राहुल ने भी रमेश भाईसाहब को अपनी क्षमताओं से परिचित करवा दिया था। राहुल के घर में भी रमेश भाईसाहब खूब सम्मान था। राहुल के अन्य सभी दोस्तों को घर के दरवाजे तक ही आने की अनुमति थी पर रमेश भाईसाहब सीधे बेडरूम तक जाते थे। राहुल के घरवाले भी राहुल को लेकर चर्चा भी रमेश भाईसाहब से करते थे। ये सम्मान रमेश की उम्र और अनुभव दोनों का था। हालांकि इस बात से राहुल को कैसा लगता था? ये तो पता नहीं पर वो अक्सर रमेश भाईसाहब को रमेश जी कहकर अपनी मम्मी की एक्टिंग किया करता था। रमेश भी सिर्फ कहने को भाईसाहब नहीं था वो राहुल का ध्यान उनके अभिभावकों जैसी देखभाल करने लग गए थे। राहुल के कहने पर उन्होंने नेट का फॉर्म भी भर दिया था। राहुल का साहित्य के प्रति रुझान पहले से भी अधिक बढ़ गया था। अब वो रमेश भाईसाहब से पढ़ता नहीं बल्कि रमेश भाईसाहब को पढ़ाने लग गया था। भाईसाहब भी उसे पढ़ने लग गये बिना ये सोचे कि राहुल उनसे बहुत छोटा है पर उम्र के इस अंतराल को उन्होंने बिना कोई लागलपेट के पाट दिया था। इसी क्रांतिकारी कदम ने धीरे धीरे रमेश भाईसाहब के संबोधन में परिवर्तन कर दिया था। राहुल के लिए कब रमेश भाईसाहब से रमेश जी और कब केवल रमेश हो गए ये शायद राहुल भी नहीं जानता था पर रमेश भाईसाहब जानते थे। उन्होंने इसे कभी अपनी नियति मानकर मन हीं मन शोक किया तो कभी ये सोचकर प्रसन्न हो जाते कि वे भी राहुल के हम उम्र हो रहे है। हर बच्चे में बड़े होने की और हर बड़े में छोटे होने की लालसा चीर स्थाई है। राहुल, रमेश भाईसाहब के लिए संजीवनी बन कर आया था लेकिन रमेश भाईसाहब राहुल के वो मास्टरस्ट्रोक नहीं बन पाएं। राहुल को धीरे धीरे लगने लगा था कि रमेश भाईसाहब उसके लिए अब उपयोगी नहीं रहे है उन्हें पढ़ना खुद का टाइम वेस्ट करना है। उपयोगितावाद पर आधारित इस समाज में प्रेम, घृणा, क्रोध सबकुछ मापने के लिए एक ही तराजू है और वो है उपयोगिता। जिस दिन आपकी उपयोगिता समाप्त उस दिन से समाज आपको धक्का देकर हाशिये तक का ले जायेगा और धीरे धीरे बाहर निकाल देगा। राहुल भी रमेश को कुछ ऐसे ही हाशिये तक ले जा रहा था, वो धक्का भी दे सकता था पर रमेश की प्रतिष्ठा और रमेश का अपनत्व उसे ऐसा करने से रोक रहा था। नेट पेपर हुआ। रिजल्ट आया। राहुल सिलेक्ट हो चुका था पर रमेश भाईसाहब कुछ अंकों से चूक गए। रमेश भाईसाहब इससे दुःखी नहीं हुए ये कहना गलत होगा। उनको दुःख हुआ बहुत दुःख हुआ। इस बात का दुःख हुआ कि वे कुछ विषयों पर यदि अधिक गौर करते तो आज वे भी सिलेक्ट होते है किंतु उनके मन में राहुल को लेकर कोई द्वेष नहीं था। उन्होंने तो राहुल और उसके ममी पापा को बधाई भी दी। वे तो उसकी सफलता में अपनी व्याकरण का अंश ढूंढ रहे थे और प्रसन्न हो रहे थे। अपने मन को शांत करते हुए रमेश भाईसाहब ने गहरी साँस ली और खुद से कहा कि कोई नहीं, ये तो केवल एक एलजीबीटी टेस्ट है मुख्य पेपर के लिए वे पहले से तैयारी रखेंगे। राहुल का उत्साह चरम पर था। उसने मम्मी से कुछ पैसे लिए और रमेश के लिए मिठाई का डिब्बा ले आया। राहुल की बातचीत में अब संबोधनों का उल्टा क्रम में चल रहे है । रमेश, रमेश से रमेश जी और पुनः रमेश भाईसाहब बन रहे थे। रमेश को अच्छा लगा क्योंकि राहुल को उन्होंने कभी प्रतिद्वंद्वी नहीं माना हमेशा अपना विद्यार्थी ही माना। रमेश ने राहुल को शाबाशी देते हुए व्यंग्य में पूछा अब वापिस कब से पढ़ाओगे सर? रमेश के लिए ये वाक्य का क्या उत्तर होगा ये महत्वपूर्ण नहीं था महत्वपूर्ण ये था कि राहुल भी इसी वाक्य की ताक पर था कि कब रमेश भाईसाहब ये पूछे और मैं उन्हें पढ़ाना शुरू करूं। राहुल को अभी ऐसा ही लग रहा था कि इसका सिलेक्शन भाईसाहब को पढ़ाने के कारण ही हुआ है। विज्ञान के इस नियम को हम कभी कभी जीवन का भी एक सत्य मान लेते है कि एक निश्चित क्रिया को करने से निश्चित फल मिलता है। जैसे कभी किसी लाल रंग के शर्ट को पहन कर आप किसी काम को गए तो आप अपने पुरुषार्थ से अधिक इस बात का महत्व करने लगते है कि आपने जिस लाल रंग की शर्ट पहनी ये सब उसी कारण हुआ है और यहीं घटना यदि भाग्य से दो तीन बार घटित हो जाए तो फिर तो उस घटना की पूरी जिम्मेदारी शर्ट की ही बन जाती है। राहुल भी कुछ ऐसा ही था उसके लिए अब अपनी पढ़ाई से भी अधिक महत्वपूर्ण था रमेश भाईसाहब का संसर्ग। उसे लगा रमेश भाईसाहब के उसके जीवन में आने से ही ये सब घटित हुआ है। इसलिए कुछ भी हो मुख्य परीक्षा पास करने के लिए रमेश भाईसाहब का होना जरूरी है या बोले तो उपयोगिता है। तो जब रमेश भाईसाहब ने उससे पढ़ाने के बारे में पूछा तो वो तुरंत तैयार हो गया। इधर रमेश भाईसाहब भी उतने ही जोश से तैयार थे लेकिन उनके जोश के सामने अब प्रश्न था कि छुट्टियों के वे समय कैसे मैनेज करेंगे पर उन्होंने अपने मन को सहमत किया कि करना ही होगा। दोनों ने समय तय किया और पढ़ाई का सिलसिला फिर से शुरू हुआ। ये सिलसिला भी जल्द ही बिखरने वाला था क्योंकि स्कूल शुरू होते रमेश भाईसाहब को समय कहां मिलने वाला था। पर राहुल पढ़ना चाहता था क्योंकि उसे इसी क्रिया से पहले भी प्रतिक्रिया मिली है इसलिए किसी भी कंडीशन में रमेश भाईसाहब को पढ़ाने के लिए तैयार था। तय हुआ कि रमेश भाईसाहब रात को 9 बजे फ्री होते है। वे सीधे घर ना जाकर राहुल के घर जायेंगे और पढ़ेंगे। राहुल भी पूरी तैयारी करके बैठा इंतजार करता था। इंतजार एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके पूरे होने में वो रस नहीं जो अधूरे रह जाने में। इसी अधूरे इंतजार ने हमें कितनी कहानियां दी है, कितनी कविताएं दी है और कितनी ही क्रांतियां दी है। हर नयी रचना एक इंतजार से गुज़री से है। इंतजार की ऐसी कितनी ही खूबियां क्यों ना गिना दी जाएं पर इंतजार भोगने वाला ही इंतजार की पीड़ा जानता है। कुछ दिन ही बीते थे कि राहुल भी इसी इंतजार की पीड़ा में सुलगने लगा। रमेश शुरुआत के कुछ दिनों तक तो टाइम टेबल सेट करके समय पर पहुंच जाता था पर धीरे धीरे रात नौ का समय सवा नौ बजे, सवा नौ से साढ़े नौ बजे तो कभी पौने दस। कुछ दिन तो बिल्कुल अनुपस्थित होने लगा। जब रमेश रात को पहुंचता तो भी पढ़ने में उसका मन नहीं लगता था। वो बीच बीच में लंबी उबासी लेकर तो कभी अपने दोनों हाथों को खींचकर सुस्ताता रहता। ये सुस्ताना रमेश के लिए कैसा था ये तो रमेश जी जाने पर राहुल के लिए इस प्रकार सुस्ताना उसे अपनी बेइज्जती लगती थी। उसे बहुत गुस्सा आता था कि वो इतनी तैयारी करके रखता है पर भाईसाहब बीच में ही सोने लगते है। रमेश भाईसाहब की इन्हीं हरकतों से एक बार फिर राहुल के मन में रमेश भाईसाहब के लिए सम्बोधनों की उल्टी सीढ़ी तैयार हो गई । वे फिर से रमेश भाईसाहब से रमेश जी और फिर केवल रमेश बन गए। इस बार दुबारा संबोधनों की सीढ़ी उतरना रमेश के लिए कष्टकारी था इससे बेहतर तो ये रहता कि राहुल उसे इस सीढ़ी पर दुबारा चढ़ाता ही नहीं। नीचे ही मिट्टी में रेंगते रेंगते वे खुद चलते या तो गिरते या फिर सीखते। नहीं भी कभी चढ़ पाते तो कम से कम राहुल के बराबर तो हो जाते क्योंकि ऊपर चढ़कर आप कभी बराबर नहीं हो सकते। पर रमेश को अब राहुल के व्यवहार से ज्यादा डर लग रहा था कि किन्हीं वो उसे धरती पर रेंगता छोड़कर ऊपर चढ़ ना जाए। तब वो राहुल से आँखें भी नहीं मिला पाएंगे। राहुल के लिए रमेश अब रेंग ही नहीं रहा था बल्कि बिल बनाकर पाताल में जा चुका था। जिसके लिए बराबर की दृष्टि नहीं हो सकती, उसके लिए तो नीचे देखना ही पड़ेगा वो भी हीनता के साथ। धीरे धीरे रमेश भी राहुल के व्यवहार में अपने। प्रति हीनता अनुभव कर रहा था। ऐसा नहीं रमेश ने अपनी और से कोशिश नहीं की। बार बार समय सेट करने की कोशिश की कभी सुबह सुबह जल्दी, तो कभी दोपहर में तो कभी रात में पर हर बार रमेश हार जाता था वो स्कूल और कोचिंग में इतना अधिक व्यस्त हो चुका था कि वो समय भी नहीं दे पा रहा था। उसे मन से ये लगा कि वो राहुल का समय खराब कर रहा था तो उसने स्वयं ही राहुल के घर जाना ही छोड़ दिया। राहुल ने रमेश को कॉल किए बात करने की कोशिश भी की पर रमेश ने राहुल को कोई जवाब नहीं दिया। राहुल भी इस आधे अधेड़ से परेशान ही था। ये क्रिया - प्रतिक्रिया के नियम को वो मानता है इसलिए बस रमेश को ढो रहा था। उसने तय किया कि वो लाइब्रेरी जाएगा और वहाँ बैठकर घंटों पढ़ाई करेगा।
इधर रमेश भी इस बात से संतुष्ट था कि वो राहुल का समय बर्बाद करने वाले पास से मुक्त हो गया है। रमेश ने अपनी इस मनोस्थिति का बयान अपनी पत्नी दीपा के समाने रखा। दीपा ने रमेश को समझाते हुए कहा कि तुम्हें अब केवल अपने बिजनेस पर फ़ोकस करना चाहिए। ये सोचो कि कैसे एक इंस्टिट्यूट को तुम डेवलप कर सकते हो। इस विचार करो। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाओ। अपने अनुभव को पैसे में रूपांतरित करो। दीपा के इन शब्दों ने जैसे रमेश की पीठ से सरकारी नौकरी वाला भार सदा सदा के लिए हटा दिया। उसने पूरे मन से अपनी संस्था पर काम किया।
राहुल भी ये तय कर चुका था कि लाइब्रेरी में उसे ज़रूर कोई ना कोई मिल जाएगा। जिसे पढ़ाकर वो जरूर सिलेक्ट हो जाएगा और फिर सपनों के आसमाँ से धरती को निहारेगा और यहाँ से उससे नीचे रह गए लोगों को धिक्कारेगा। उसने रमेश को अपनी प्रगति दिखने के लिए लाइब्रेरी भी ऐसी ज्वाइन की जो रमेश के घर के पास थी। ताकि रमेश आता जाता उसे देखे भी और जले भी। लाइब्रेरी ज्वाइन करते ही उसकी नज़रे ऐसे चेहरे को ढूंढ रही थी जो उसके जीवन में रमेश की क्षतिपूर्ति कर सके। पर उन अनेक चेहरों में एक भी ऐसा चेहरा नहीं था जो रमेश भाईसाहब जैसा हो।चारों तरफ कुछ था तो केवल किताबों का बोझ से लदे लड़के। पन्ने पलटने की सामूहिक आवाज़ जरूर तंद्रा भंग कर देती थी बाकी ऐसा लगता था सभी लोग किसी ध्यान मुद्रा में है। इस ध्यान में सबसे ज्यादा बाधा दोपहर में आती थी। जब लगभग हर बैच से 2-3 मिनिट में एक उबासी की आवाज आती थी बिल्कुल रमेश भाईसाहब जैसी।
रमेश ने नई राह पकड़ ली थी। अब उसके पास जो। 1 घंटा पहले बच रहा था वो भी नहीं था। हर समय उसके दिमाग में संस्थान को कैसे डेवलप किया जाएं। ये ही चलता रहता था। पर देर रात घर आते वक्त जब राहुल की मोटर साइकिल देखता तो उसके मन में एक संतोष होता कि राहुल पढ़ रहा है। राहुल प्रति जो स्नेह उसके मन में था उसमें अभी तक तो रत्ती भर भी कमी नहीं आई थी। रास्ते में एक दो बार दोनों का मिलना भी हुआ। पर मिलना नहीं, टकराना ही कहेंगे और टकराहट भी ऐसी जिसमें एक स्थिर है और दूसरा गतिशील। रमेश ने राहुल को जब बाजार में देखा तो जोर से चिल्लाया- राहुल सर। पूरे बाजार में जितने भी राहुल थे या जो नहीं भी थे उन सब ने रमेश की और देखा पर राहुल ने आँख तक नहीं फेरी। जैसे उसके कानों में जूं तक नहीं रेंगी। इस बात के बाद कोई बात शेष नहीं रह जाती। फिर भी रमेश के मन में राहुल के लिए आशीर्वाद ही निकला।
राहुल के इस अकेलेपन को दूर करने कोई रमेश भाईसाहब तो नहीं मिले पर मिली रमा। रमा, राहुल की लाइब्रेरी में केवल दोपहर में देखी जाती थी। वैसे भी लाइब्रेरी में लिए सीट फिक्स होती है । राहुल की लाइब्रेरी में भी ये ही नियम था। लड़कों से भरी इस लाइब्रेरी में दोपहर की चमक कुछ ज्यादा बढ़ जाया करती थी। रमा की सीट भी फिक्स थी और वो भी स्पेशल वाली। शायद रमा लाइब्रेरीन की कोई रिश्तेदार थी। तभी जब मर्जी आती जब मर्जी जाती। आजकल के पुस्तकालय में पुस्तक को छोड़कर सब होता है। तेज चलने वाला नेट, आरामदायक कुर्सी, ऐ. सी. वाले कमरे, अच्छी लाइटिंग सब कुछ होता है। होती नहीं तो बस किताबें। तो रमा भी अपने पर्स में अंग्रेज़ी साहित्य की कुछ किताबें लाती थी रमा के साथ ही लाइब्रेरी में ऑस्टेन,जॉर्ज ऑरवेल और आर्थर कॉनन डॉयल लाइब्रेरी आते थे। साहित्य किसी भाषा में सहृदयी के मन में आकर्षण ज़रूर पैदा करता है। इसी साहित्य ने राहुल और रमा के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू किया जो कई बार रमा से जुड़ा तो कई बार राहुल से। राहुल ने रमेश भाईसाहब की पूर्ति रमा से करने का निश्चय किया।
रमेश ने अपनी कोचिंग का रजिस्ट्रेशन करवा लिया है और उसके पास पांच सौ से अधिक बच्चें पढ़ने के लिए आ रहे है। राहुल ने तो रमेश की परछाई ढूंढ ली पर रमेश राहुल की परछाई किसी को भी नहीं बना सका। उसने अपने जीवन में राहुल की पूर्ति कागज़ कर ली। उसने अपने अनुभवों को और अपनी भावनाओं को कागज़ पर लिखना शुरू कर दिया। रमेश कोचिंग के अलावा गीत, कविता, कहानी, उपन्यास आदि लिखने लगा। उसका लिखा पढ़ा जाने लगा। उस आधे अधेड़ पूरा अधेड़ होते होते युवाओं के मन पर राज कर लिया था। उसकी किताबें वैसे तो हर वर्ग के पाठक के लिए होती पर युवा वर्ग उसे विशेष पसंद करने लगा।
राहुल और रमा अच्छे दोस्त से कुछ अधिक होने लगे थे।पर इससे अधिक होना उनकी किस्मत में नहीं था शायद। रमा की सगाई की सूचना राहुल के लिए अब तक की सबसे भयानक सूचना हो सकती थी पर इससे भी अधिक भयानक था ये जानना कि ये सब रमा की मंजूरी से हो रहा है। कई बार कई सच अगर झूठ ही बने रहे तो अच्छा है हम सभी उस भ्रम में ज्यादा बेहतर जी सकते है। पर ये भी एक सच था वैसा ही जैसा रमेश भाईसाहब को मिला था सच बिल्कुल नंग धड़ंग।
रमेश की पत्नी दीपा एक कुशल प्रशासक के रूप में उभरी उसने और दीपा ने मिलकर उस छोटी सी संस्था को एक बड़े विद्यालय का रूप दे दिया। एक ऐसा विद्यालय जो शिक्षा, संस्कार और सृजनात्मकता के आकाश का एक ध्रुव तारा सिद्ध हुआ। रमेश की विचारधारा पहले ही हिंदुस्तान के हर कौने तक फैल चुकी थी दूसरा उसके विद्यालय के मॉडल की तारीफ भी सब जगह हो रही थी। दीपा को आइडिया आया कि क्यों ना हम इसे एक फ्रेंचाइजी मॉडल में तब्दील कर दे जिससे इस विद्यालय के संस्कार हर जगह फ़ैल सके । रमेश ने कभी ये सपना भी नहीं देखा था पर सच में ये अद्भुत था।
राहुल रमेश की हजारों बातों में एक बात ये भी थी कि जब रमेश भाईसाहब स्कूल खोलेंगे तो उसका नाम होगा - सर्वांग। सर्वांग विद्यापीठ। रमेश ने दीपा को कहा कि क्या हम इस फ्रेंचाइजी मॉडल का नाम सर्वांग विद्यापीठ रख सकते है? इस पर दीपा ने कुछ नाराजगी भी व्यक्त की और कहा ये नाम बाबा आदम के जमाने का हैं। इससे बच्चे आकर्षित नहीं होंगे। इस पर चुटकी लेते हुए रमेश कहा कि हम भी कौनसे नए है? हमारे विद्यालय की यूएसपी भी यही होगी कि हम पुरानी मान्यताओं को नईं शैली में अभिव्यक्त करेंगे। दीपा इस तर्क के आगे मौन थी।
राहुल के लिए रमा का जाना कोई सामान्य घटना नहीं थी । रमा रमेश भाईसाहब की परछाई थी अब परछाई भी नहीं थी तो उसका जीवन उस कड़ी दोपहर खड़ा था जिसमें अभी ठीक 12 बज चुके थे। परछाई रहित। निपट अकेला। उसने जैसी भी टूटी फूटी तैयारी की। मुख्य पेपर दिया पर उसका सिलेक्शन नहीं हुआ। उसने सारे घटनाक्रम का अकेला जिम्मेदार रमेश भाईसाहब को माना और सिगरेट का धुँआ उछालते हुए रमेश भाईसाहब को निकालता रहा।
रमेश और दीपा का सर्वांग विद्यापीठ आज यूनिकॉर्न बन चुका है और रमेश भी अब साठ के आस पास है। उसने तय किया कि अब वो पढ़ाना छोड़कर स्वतंत्र लेखन ही करेगा और साहित्य की सेवा करेगा । उसके टीम मेंबर्स और कुछ साथियों का कहना था कि वो अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर एक आत्मकथा लिखें और उसे प्रकाशित करें ताकि आने वाली पीढ़ी उसमें अपने जीवन के लिए मार्गदर्शन ढूंढ सके। ऐसा ही हुआ रमेश ने अपनी आत्मकथा लिखी। हर व्यक्ति को धन्यवाद दिया जिसने रमेश को रमेश सर बनने में मदद की। इस आत्मकथा को उसने अपनी पत्नी दीपा को समर्पित किया। इस आत्मकथा में हर कोई था दीपा, रमेश के गुरु ज्ञानदीप जी, रमेश के पिताजी, माताजी और साथी टीचर्स यहां तक की कुछ बच्चों के नाम भी इसमें थे जिसने सर्वांग को सर्वांग विद्यापीठ बनाया। हर कोई इस पुस्तक में था सब किताब में अपना अपना नाम ढूंढ रहे थे और नाम मिलने पर उस पैराग्राफ को अंडरलाइन कर रहे थे। कुछ शायद बाद में पढ़ने के लिए अपने नाम वाले पेज को मोड़कर रख रहे थे। कुछ इतने उतावले थे कि अपने नाम वाले पेज का फोटो खींच तुरंत अपलोड कर रहे थे। विमोचन कक्ष के बाहर एक छोटा स्टेज और लगा था जिस पर रमेश अपनी आत्मकथा पर साइन करके अपने पाठकों को दे रहा था। तभी एक अधेड़ हाथ रमेश की ओर बढ़ा उसने बिना कोई ध्यान दिए अपनी बुक का पहला पन्ना साइन के लिए खोला जिस पर पेन से बड़ा बड़ा लिखा था राहुल।
लेखक
आनंद पुरोहित 'मस्ताना'
साहित्य और कला विषय पर चिंतन-परक आलेख लिखने वाले आनंद मस्ताना मोटीवेशनल स्पीकर और शिक्षक भी हैं। राजस्थानी व हिंदी के कवि-लेखक हैं।