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राजसूय। टेढ़ी-मेढ़ी घाटी की सड़क पर कार कभी तेज तो कभी धीमे चल रही थी। भीतर बैठे तीनों यात्री अपनी सांस रोके केवल ड्राईवर की तरफ कातर निगाहों से देख रहे थे। दूसरा कोई चारा भी नहीं था उनके पास। सांसें कभी तेज होती तो कभी थमती-सी प्रतीत होती। मगर ड्राईवर इससे बेखबर लगातार घाटी की चढ़ाई को मात देता अपनी ही धुन में गाड़ी चला रहा था। उसकी बेफिक्री भीतर बैठे यात्रियों की चिंता को बढ़ाने का काम कर रही थी। क्योंकि सुना था, यह घाटी खतरनाक है। ड्राईवर जरा-सा चूका तो कार हजारों फीट नीचे खाई में, कुछ भी तलाशना फिर तो मुश्किल। पढ़े-लिखे यात्री थे, अखबारों में अनेक बार दुर्घटनाओं की खबरें पढ़ चुके थे। भय उनके चेहरे पर था, पर जानते थे कि अब चुप रहने के अलावा कोई उपाय नहीं। जीवन का सारथी तो अब यह ड्राईवर ही है, इसे कुछ कहना खतरे से कम नहीं।
पचास किलोमीटर की इस घाटी से पार पाना था, दूसरा कोई विकल्प नहीं था। घाटी चढ़ने के बाद ही देवभूमि शिमला पहुंच सकते थे। शिमला पहुंचने में इतनी तकलीफ है, इसका उनको भान नहीं था। यदि होता तो इस पर्यटन नगरी के सुख का विचार ही त्याग देते। अब पछताने से कुछ हासिल तो होना नहीं था। समय काटना था और शिमला पहुंचना था।
घाटी चढ़ते-चढ़ते मन में कई बुरे विचार आते रहे। अच्छे विचार तो यात्रा पूरी होने पर ही आने संभव थे। आदमी वर्तमान में जीता है और उनका वर्तमान कठिन घाटी की यात्रा था। इसी वजह से वर्तमान को जी नहीं पा रहे थे, भविष्य का सोचना तो संभव ही नहीं था। जाहिर है, घाटी का भूतकाल ही रह-रहकर उनको याद आ रहा था, जिसे स्मृति के आधार पर अच्छा तो कहा ही नहीं जा सकता। समय भारी होने की बात उन तीनों को आज समझ आई थी। अब तक तो इस कहावत को सुना ही था। तीन यात्रियों में एक अधेड़ भी था। उसके मन में घबराहट होनी स्वाभाविक थी। यह उम्र वैसे भी व्यक्ति में असुरक्षा का भाव ला देती है। जिंदगी को लेकर वह ज्यादा गंभीर हो जाता है। जीने की ललक इसी उम्र में अधिक होती है, क्योंकि व्यक्ति को पता होता है कि ज्यादा नहीं जीना। मौत को मात देने की चाह उसे अतिरिक्त सजग भी कर देती है।
इसी सजगता को ध्यान में रखकर वह अधेड़ लगातार मन ही मन भगवान का स्मरण कर रहा था। विपदा में ही भगवान याद आता है, यह तो तय है। साथ में बैठे दोनों लोगों को इस बात का भान हो गया था, इसलिए वे मंद-मंद मुस्करा रहे थे। दोनों ने आंखों ही आंखों में इशारा किया। उसमें से एक ने डर की उस लंबी चुप्पी को तोड़ा-
‘‘मनोज, अभी पहाड़ पर पहुंचने में कितना समय लगेगा?’’
मनोज जवाब देता उससे पहले ड्राईवर बोल पड़ा, ‘‘लगभग दो घंटे।’’
‘‘तुम्हें कैसे पता?’’
‘‘साहब, 27वीं बार इस रूट पर आया हूं। इस घाटी का चप्पा-चप्पा जानता हूं।’’
‘‘ओह! फिर तो तुम्हें सब पता होगा।’’
‘‘हां, हर खतरनाक मोड़ के बारे में पता है। तभी तो आपको आराम से यहां तक ले आया। कोई नया ड्राईवर तो इस घाटी पर गाड़ी चला ही नहीं सकता। डगमगा जाता है। इधर स्टेयरिंग पर उसके हाथ डगमगाए, उधर गाड़ी सड़क छोड़ देती है। फिर कहां जाए, भगवान जाने!’’
तीनों के चेहरे पर भय की रेखाएं खिंच गईं। अधेड़ बोला, ‘‘इस तरह की अशुभ बातें मत बोलो। दिन में एक बार हर व्यक्ति के मुख से सरस्वती बोलती है, इसलिए बोलते समय सदा ध्यान रखना चाहिए।’’
ड्राईवर चुप हो गया। गाड़ी के भीतर माहौल गंभीर हो गया। ड्राईवर की बात ने सभी पर कुछ न कुछ असर डाला था। यह साफ परिलक्षित हो रहा था। गंभीर माहौल के बीच मनोज बोला, ‘‘अनिल, चलो एक बात का तो संतोष है।’’
‘‘किस बात का?’’
‘‘हमारा सारथी कम से कम इस रास्ते का जानकार और अभ्यस्त है। हमें कोई खतरा नहीं। सफर आसानी से पूरा होगा।’’
इस बात ने अधेड़ सोहनलाल को भी राहत दी। उसने एक लंबी सांस ली और बोला, ‘‘जाने में दिक्कत है। पहाड़ से वापस आते समय कोई परेशानी नहीं होगी।’’
साफ लग रहा था कि वह वापसी के लिए साहस जुटा रहा है।
‘‘अंकल, मुझे तो जाने में भी कोई दिक्कत नहीं लगी।’’
‘‘अनिल बेटा, इस रास्ते के बारे में बहुत बुरा सुना हुआ है न!’’
‘‘अंकल, सुनी-सुनाई बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। यह तो सर्वमान्य बात है।’’
‘‘वह तो ठीक है। मगर....
‘‘मगर-वगर की बात ही नहीं। ड्राईवर जानकार है।’’
‘‘तभी तो कुछ जी जमा है। नहीं तो, अब तक बुरे विचार ही उमड़-घुमड़ रहे थे।’’
अनिल और मनोज को हंसी आ गई।
‘‘मेरी उम्र तक पहुंचोगे तो इससे भी बुरी हालत होगी तुम्हारी। समय बुरे से बदतर की तरफ जा रहा है। आदमी इस दौर में सर्वाधिक आशंकाओं में जी रहा है। सोचो, इस बात पर।’’
इस बात को सुनकर अनिल और मनोज खामोश हो गए। बात जब सही हो तो चुप्पी ही विकल्प में बचती है। मनोज को लगा कि सफर तीन दिन का है, तब तक अधेड़ अंकल के साथ रहना है। इसलिए विषय बदलना ही ठीक रहेगा। उसने ड्राईवर से कहा, ‘‘सुनो भाई सारथी!’’
‘‘जी साहब।’’
‘‘इस रास्ते में केवल पहाड़ ही नहीं, कोई होटल भी तो होगी न।’’
‘‘बिलकुल है।’’
‘‘तो कहीं रुक कर चाय तो पीने का अवसर दो। इस बहाने शरीर की अकड़ खोलने का अवसर भी मिल जाएगा।’’
मनोज की इस बात पर अनिल और अंकल ने सहमति दी। अब तो चाय पीने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया था। ड्राईवर को तो यूं लगा, जैसे उसके मन की बात कह दी हो। क्योंकि ड्राईवर को खाने के बजाय सदैव पीने में ही आनंद आता है, फिर वह चाय हो या मदिरा।
‘‘साहब, अगली होटल आते ही रोकता हूं। आधे से अधिक रास्ता तो तय हो ही गया है।’’
अंकल के चेहरे से तनाव अब गायब हो गया था।
‘‘चाय ही हमारे में विश्वास जगाती है। इस उम्र में चाय तो अमृत का काम करती है।’’
सभी इस बात पर हंसने लगे। क्योंकि उनको पता था कि उम्रदराज लोग चाय के बहाने ही अपना समय काटते हैं अन्यथा समय उन पर भारी होता जाता है और उसके बोझ तले दबकर वे अवसाद में चले जाते हैं। उम्र के अपने रंग हैं। युवा हो तो दिन-रात के चैबीस घंटे भी कम लगते हैं और अधेड़ के लिए तो यह घंटे एक साल जितने लंबे हो जाते हैं।
पहाड़ की तलहटी में सड़क के किनारे एक छोटी होटल पर ड्राईवर ने गाड़ी रोक दी। गाड़ी के रुकते ही सभी नीचे उतर गए। काफी देर से टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर चलने के कारण शरीर अकड़ा हुआ था। इसीलिए सभी को नीचे उतरने की जल्दी थी।
‘‘मैं चाय का आर्डर देता हूं। अंकल, आपकी चाय तो बिना शुगर वाली है न?’’
‘‘हां, अनिल। इस उम्र तक आते-आते शुगर की बीमारी तो लग ही जाती है।’’
होटल के बाहर पड़ी बेंच पर अंकल और मनोज बैठ गए। ड्राईवर दूर जाकर टहलने लगा। दरअसल, उसे ही ईजी होने की ज्यादा जरूरत थी, क्योंकि गाड़ी चलाने वाले को शरीर और दिमाग, दोनों से एक साथ काम लेना पड़ता है।
अनिल होटल के काउंटर के पास पहुंचा। छोटी-सी जगह में सब-कुछ काम हो रहा था। आगे एक काउंटर था, जिसके भीतर स्नैक और दूसरी तरह की नमकीन, बिस्कुट के पैकेट पड़े थे। बीच में छोटा गेप था और पीछे एक पट्टी बनी थी, जिस पर छोटे-छोटे दो गेस के चूल्हे थे। एक पर लगभग सत्तर साल की एक महिला खाना बना रही थी। होटल के एक तरफ छोटा कमरा था, शायद स्टोर होगा। क्योंकि उसमें बहुत-सा सामान बेतरतीब तरीके से भरा हुआ था। दूसरी तरफ एक छोटा कमरा और था। उसमें एक खाट बिछी थी और उस पर बिस्तर बिछा हुआ था। पास में समेट कर रखे हुए बिस्तर भी पड़े थे। जाहिर है, यह उस होटल चलाने वालों का बेडरूम था। मगर होटल में उस वृद्ध महिला और एक युवक के अलावा कोई दिखाई नहीं दिया। सोने का कमरा इतना छोटा था कि उसमें दो लोग भी मुश्किल से सो सकते थे। अनिल सोचने लगा, इतना छोटा परिवार कैसे संभव है जबकि बुजुर्ग महिला की मांग भरी हुई थी।
अनिल के जिज्ञासु मन में कई तरह के सवाल खड़े हो गए और उनके जवाब जानने की उत्सुकता तीव्र हो गई। मन में सवाल जागना ही तो आदमी के जिंदा होने की निशानी है। जब तक सवाल है, तब तक उसके पास विवेक है। सवाल समाप्त तो विवेक का अंत। परिणामस्वरूप आदमी का अंत। उसने मन में ठान लिया कि सवाल तो करूंगा। तभी उसके पास मनोज भी आ गया।
‘‘चाय का आॅर्डर दे दिया, फिर यहां क्यों खड़े हो?’’
‘‘यार, एक करो न।’’
‘‘क्या?’’
‘‘तुम अंकल को बातों में लगाओ, कुछ समय बिताओ।’’
‘‘ऐसा करने के लिए क्यों कह रहे हो?’’
‘‘मुझे इस लड़के और औरत से बात करनी है।’’
‘‘तुम इनको जानते नहीं, फिर क्या बात करनी है? तुम्हारे इरादे तो ठीक है न!’’
‘‘गलत मत सोचो। इनकी दुकान देख रहे हो!’’
‘‘हां। इसमें क्या खास बात है, मुझे तो नहीं लगी।
‘‘मुझे लगी है, इसी कारण बात करना चाहता हूं। प्लीज।’’
‘‘ठीक है, पर ज्यादा समय मत लगाना। पहाड़ पर भी पहुंचना है। अंधेरा हो गया तो सग गड़बड़ हो जाएगा। अंकल का स्वभाव तो तुम जानते ही हो।’’
‘‘तुम चिंता मत करो, ज्यादा समय नहीं लगाऊंगा।’’
मनोज चला गया। अनिल ने राहत की सांस ली। काउंटर के पास पड़ी स्टूल पर बैठते हुए उसने लड़के से पूछा, ‘‘यहां बैठ सकता हूं न।’’
‘‘क्यों नहीं। आराम से बैठिए।’’
‘‘वो दोनों वहां बैठे बातें करेंगे। मैंने सोचा, मैं तुमसे बतिया लेता हूं। इस जगह पर पहली बार आया हूं न।’’
‘‘बहुत सुंदर जगह है। आप पहाड़ पर पहुंचेंगे तब आपको प्रकृति के सुंदर चितराम हर तरफ दिखाई देंगे। शायद ही कोई जगह बिना हरियाली के नजर आए। वैसे आप आए कहां से हैं?’’
‘‘राजस्थान से।’’
‘‘ओहो, वहां तो बहुत गर्मी होगी इस समय।’’
‘‘बहुत भयंकर। पारा 47 से नीचे तो उतरता ही नहीं।
‘‘देश के सभी गर्म प्रदेशों से इस मौसम में यहां लोग घूमने आते हैं। यहां के लोगों की आजीविका पर्यटकों के बूते ही चलती है। ऊपर आपको हर जगह के लोग मिलेंगे। देश का पहले नंबर का पर्यटन स्थल है। कश्मीर तो अब रहा नहीं। आतंकवाद के कारण लोग वहां जाने से डरते हैं।’’
‘‘सही कहा। कश्मीर की सुंदरता को, केशर की क्यारियों को, झील को आतंकवाद ने बदरंग कर दिया। वरना कश्मीर तो धरती का स्वर्ग था।’’
‘‘सही कह रहे हैं आप। धारा 370 हटाने के बाद लोगों में विश्वास जगा था कि अब वहां शांति होगी, मगर बौखलाए आतंकियों ने ज्यादा ही कुछ करना आरंभ कर दिया है।’’
‘‘अब क्या करें! सरकार कोशि तो कर रही है आतंकवाद को रोकने की, लोगों को सुरक्षित करने की।’’
‘‘तभी तो पर्यटक अब यहां ज्यादा आने शुरू हो गए है। यह इलाका शांत है, यहां के लोग सहज हैं।’’
‘‘आदमी सुकून की तलाश में ही तो पर्यटन करता है। अब इसी जगह उसे ज्यादा सुकून मिल रहा है।’’
‘‘इसी वजह से यहां के लोगों के जीवन-स्तर में अब सुधार होना आरंभ हो गया है। दो वक्त की रोटी आराम से खाने लगे हैं। सारी भागदौड़ इस रोटी के लिए ही तो है।’’ अनिल ने बात बदलने के लिए एक लंबी सांस ली।
‘‘अब तो तुम्हारी यह होटल भी ठीक चल रही होगी?’’
‘‘हां, गुजारा हो जाता है।’’
‘‘दो लोगों को जीने के लिए ज्यादा चाहिए भी नहीं।’’
‘‘दो क्यों! हमारा तो पूरा परिवार है।’’
‘‘अच्छा, मगर यहां तो तुम दो ही दिख रहे हो। ये शायद आपकी माताजी होंगी।’’
‘‘हां, मां ही है। यहां रुकने वालों को भूख भी लगती है। तब उनके खाने के लिए मां चावल-कढ़ी या फिर चावल-राजमा बना देती है। इसके अलावा तो इससे कुछ बनता नहीं। भूखे आदमी को खाने के लिए इतना ही मिल जाए तो संतोष हो जाता है। मैं चाय, काॅफी आदि के साथ यह होटल चला लेता हूं।’’
उसके लड़के के जवाब से अनिल चैंक गया। पूरा परिवार है, मगर कहां? उसके दिमाग में अब तो कई सारे सवालों ने एक साथ जन्म ले लिया। परिवार के बारे में पूरा जानने की उसकी उत्सुकता बढ़ गई।
‘‘तुमसे इतनी बातें कर ली, मगर तुम्हारा नाम नहीं पूछा।’’
‘‘मेरा नाम आलोक है।’’
‘‘बहुत सुंदर नाम है। घर, परिवार को आलोकित करने वाला।’’
वह मुस्करा भर दिया। आलोक की मुस्कराहट के कई अर्थ थे। उन अर्थों में ही उसके, परिवार के जीवन की व्यथा-कथा छपी थी, यह बात अनिल ताड़ गया। आलोक शायद अपनी बातें बताने से परहेज कर रहा था इसलिए उसने बात को बदल दिया-
‘‘आपके साथी वहां आपकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।’’
‘‘अरे नहीं, वे अपनी बातों में मशगूल है। तुम चिंता मत करो।’’
आलोक ने फिर बात बदली-
‘‘चाय भी तैयार है। उनके साथ ही बैठकर पीओगे न आप?’’
‘‘नहीं, तुम उनको चाय देकर आ जाओ। मैं तुम्हारे पास बैठकर ही चाय पीऊंगा। तुमसे बातें भी होती रहेंगी। अभी हमारे अलावा यहां कोई ग्राहक भी नहीं है। वह आदमी और उसका परिवार तो भोजन करने रुका है। भोजन तुम्हारी मां तैयार कर रही है। कोई ग्राहक न आए तक तक हम बातें करेंगे।’’
आलोक को लग गया कि यह तो उठेगा नहीं। उसने चाय के तीन कप उठाए और अंकल, मनोज, ड्राईवर को देने चला गया। वापस आकर एक कप अनिल को पकड़ा दिया। उसे पता था कि ये उठेगा नहीं, इसलिए एक स्टूल लाकर उसके सामने बैठ गया।
‘‘हां तो आलोक, हम तुम्हारे परिवार के बारे में बात कर रहे थे। कौन-कौन है, बताओ तो सही।’’
‘‘मां और मैं तो तुम्हारे सामने हैं। हम दो के अलावा मेरे पिता हैं। एक छोटी बहिन है, जो पढ़ रही है। मेरी पत्नी है और दो बच्चे हैं। मेरे चाचा की मृत्यु हो गई, उसके कोई संतान नहीं थी तो उनकी पत्नी यानी मेरी चाची भी हमारे साथ ही रहती है।’’
‘‘इतना बड़ा परिवार है! मुझे तो लगा छोटा-सा होगा।’’
‘‘नहीं साहब, भगवान की दया से सबका साथ है।’’
अनिल परिवार के बारे में जानकर चैंक गया। उसे तो लगा था कि छोटी-सी जगह है तो परिवार भी छोटा ही होगा। आलोक को लेकर अब तो उसकी जिज्ञासा कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी। उसने समय नहीं गंवाया अगला सवा करने में।
‘‘मगर यहां तो बमुश्किल दो लोगों के रहने की जगह है। आस-पास कोई घर भी दिखाई नहीं देता। फिर बाकी लोग कहां रहते हैं।’’
आलोक मुस्कराया, क्योंकि उसे इसी सवाल की अपेक्षा थी।
‘‘बाकी लोग घर पर रहते हैं। यहां तो केवल मां रहती है।’’
‘‘ओह! घर कहां है फिर?’’
‘‘इस इलाके में लगभग सभी के घर पहाड़ी पर हैं। क्योंकि पहाड़ों के नीचे घर बना नहीं सकते। पहाड़ के टूटने का खतरा बना रहता है। बारिश भी यहां बहुत होती है तो नीचे पूरा पानी भर जाता है। इसी कारण सभी घर ऊपर ही बने हुए हैं। मेरा घर भी यहां से दो किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ पर बना हुआ है। परिवार के बाकी सदस्य वहीं रहते हैं। बच्चों की स्कूल भी वहीं है।’’
‘‘अब समझा। मगर भाई, इस छोटी-सी दुकान से घर कैसे चलता है? महंगाई भी तो बहुत है।’’
आपका कहना वाजिब है। मूल आधार कमाई का तो यही होटल है। पहले पापा चलाते थे, अब उनकी उम्र नहीं रही। बीमार रहते हैं। तब मुझे ही इसे संभालना पड़ता है। हां, थोड़ी जमीन भी है हमारे पास। उसमें फ्रूट की खेती करते हैं। यहां पानी की कमी नहीं है, इसलिए सेब, अमरूद, अंगूर आदि की खेती आसानी से हो जाती है। उसकी कमाई थोड़ी होती है, मगर घर चलाने में कुछ तो सहयोग हो ही जाता है।’’
‘‘पहाड़ पर खेती हो जाती है!’’
‘‘हां, पहाड़ों के मध्य की समतल जमीन खेती के काम आती है। यहां के फल इसीलिए अच्छे माने जाते हैं, क्योंकि मैदानी इलाकों की तरह दवाओं का उपयोग यहां नहीं होता। पानी, हवा, धूप से ही पकते हैं। इसी कारण इन फलों में मिठास अधिक होता है। मैं आपको मेरे खेत के अंगूर लाकर खिलाता हूं।’’
आलोक भीतर गया और प्लेट में कुछ अंगूर लेकर आया। थोड़े अनिल को दिए और बाकी मनोज और अंकल को देकर आया। गजब का मिठास था अंगूर में। सब ने तारीफ की। क्योंकि इस तरह के मीठे अंगूर पहली बार सब ने खाए थे।
आलोक वापस आकर अनिल के पास बैठ गया।
‘‘बस, साहब। मेरी जिंदगी की कहानी तो इतनी-सी है।’’
‘‘यह कहानी तुम बता रहे हो उतनी छोटी नहीं, बहुत बड़ी है।’’
आलोक बात को समझ नहीं पाया। अनिल को देखता भर रहा।
‘‘बुरा मत मानना, तुम्हारी कहानी सुनने के बाद तो मेरे मन में कई तरह के सवाल खड़े हो गए हैं। मानता हूं, ये सब सवाल तुम्हारी व्यक्तिगत जिंदगी से जुड़े हैं। मगर जब बात मुझसे साझा की है तो सवाल करने का भी अवसर दो।’’
आलोक चुप रहा। जैसे उसका मौन ही उसकी स्वीकृति हो।
‘‘तुम्हारी मां यहां रहती है तो फिर वह तुम्हारे पिता से मिलने कब जाती है? बच्चों से कब मिलती है?’’
उसका चेहरा उदास हो गया। लंबी-लंबी सांसें लेने लगा। फिर आकाश की तरफ देखा। नजरें सामने के पहाड़ों पर जाकर ठहर गईं। थोड़ी देर तो उसके मुंह से शब्द ही नहीं निकले। फिर जैसे उसने अपने आत्मबल को जुटाया, बोलने को तैयार किया।
‘‘साहब, मां और पापा को मिले हुए 17 साल हो गए।’’ इतना कहकर उसने अपनी गर्दन झुका ली।
‘‘क्या कह रहे हो।’’
‘‘सच यही है। मेरा घर पहाड़ पर दो किलोमीटर ऊपर है। मां इस उम्र में पहाड़ पर चढ़ नहीं सकती, पापा का नीचे आना और वापस जाना तो कल्पना से भी परे है। इस मजबूरी के कारण ही दोनों नहीं मिल पाते। मां के बिना इस होटल में खाने का काम कौन करे! यदि यह काम न हो तो घर का खर्चा कैसे चले। इस मजबूरी के कारण दोनों में दूरियां हैं। मैं अभागा बेटा, इस उम्र में भी दोनों को साथ नहीं दिलवा पा रहा। इसी उम्र में तो साथ जरूरी होता है। इन दोनों को अलग-अलग रहते हुए देखता हूं, खून के आंसू पीता रहता हूं।’’ यह सब कहते-कहते आलोक की आंखें नम हो गईं। दर्द की एक लकीर उसके चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। अनिल ने उसके कंधे पर हाथ रखा तो दोनों आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी। टप....टप....टप, जिस तरह से आंखों से आंसू बह रहे थे उससे लगता था कि अर्से बाद वह अपने भीतर के दर्द को इन आंसुओं के जरिये बाहर लाया है। बात भी सही थी, क्योंकि इस शिद्दत से उसके दर्द को कभी किसी ने जानने की कोशिश भी नहीं की थी।
अनिल स्टूल से उठा और उसको आंसू पोंछने के लिए रुमाल थमाया। उसने आंसू पोंछे। अपने को संयमित किया। अक्सर भावुकता में जब आदमी बहता है तो आंसू निकल ही पड़ते हैं। भावुकता जब मन पर हावी होती है तो भावना बहुत पीछे छूट जाती है। यहीं तो आकर भावुकता और भावना के मध्य का महीन फर्क मिट जाता है। भावुकता और भावना के बीच बड़ा फर्क है, यह अनिल को आज प्रत्यक्ष दिखाई दिया। वह भी आलोक से जुड़-सा गया।
‘‘साहब, विडंबना देखिए। बीमारी के कारण पिता नीचे नहीं आ सकते। अगर मैं उनको नीचे ले आऊं तो वापस पहाड़ पर पहुंचना मुश्किल। मां की उम्र इतनी है कि वह दो किलोमीटर पहाड़ की चढ़ाई नहीं चढ़ सकती। बेबस हैं दोनांे, और यूं मानिये कि मैं भी बेबसी का शिकार हूं।’’
‘‘तुम्हारी पीड़ा मुझे समझ आती है भाई।’’
भाई कहा तो पहले वह चैंका, फिर मुस्कराया। उसे यह संबोधन पसंद आया। यह उसके चेहरे से साफ झलक रहा था।
‘‘फिर तुम दोनों को मिलाने के लिए क्या प्रयास करते हो?’’
‘‘भला हो इस मोबाईल का। पहले तो फोन से दोनों की बातें कराता था। लंबी बातें करते थे। अब वीडियो-काॅल की सुविधा है तो दोनों एक-दूसरे को देख भी लेते हैं।’’
इस बात पर दोनों हंस पड़े।
‘‘तुम दोनों जगहों के बीच कैसे सामंजस्य बिठाते हो भाई!’’
‘‘साहब, रात को दुकान मंगल करके मां के साथ खाना खाता हूं। उसे आराम से सुलाता हूं और उसके बाद पहाड़ी के घर जाता हूं। रात के अंधेरे में जाना मजबूरी है, मां भी डरती है। मगर जाना मजबूरी है। रोज रात को पहाड़ी पर जाना। पापा और पत्नी-बच्चों को संभालना। सुबह जल्दी उठकर वहां के काम करता हूं और पहाड़ी से वापस घाटी की इस दुकान पर आ जाता हूं। यही हर दिन का क्रम है।’’
‘‘रोज पहाड़ी पर जाना और आना, बहुत कष्टप्रद रहता है।’’
‘‘मगर दूसरा कोई उपाय भी नहीं है। परिवार को जोड़ने के बड़े काम के सामने यह कष्ट तो मामूली लगता है।’’
‘‘बहुत सही कहा तुमने।’’
‘‘यह अलग बात है कि हर दिन एक चिंता में बीतता है। नीचे होता हूं तो ऊपर के अपनों की चिंता जुड़ी रहती है और ऊपर होता हूं तो मां का खयाल हर समय दिमाग में रहता है। इन दोनों स्थितियों के बीच कई बार तो पत्नी, बच्चों तक को भूल जाता हूं। लगता है, एक पिता और पति के रूप में अपनी जिम्मेवारी को पूरा नहीं कर पा रहा हूं।’’
‘‘मगर एक पुत्र, एक इंसान की जिम्मेवारी तो बहुत शिद्दत से निभा रहे हो। संतोष तो इस बात से मिल सकता है।’’
‘‘दिल बहलाने को खयाल अच्छा है.... सही तो कहा है गालिब ने। तभी तो खुद को बहला लेता हूं।’’
‘‘जीवन की यही कहानी है। खुद को बहलाना भी एक हुनर है। इस हुनर को जानने वाले ही हर हालत में जी लेते हैं। नहीं तो आदमी को टूटने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। टूटते मैंने देखा है।’’
आलोक यह सब सुनकर थोड़ा-थोड़ा हलका होने लगा। पीड़ा के अवसाद को अपने भीतर भी कम महसूस करने लगा। क्योंकि घाव पर मरहम लगाने वाले अब तो ढूंढ़ने से भी नहीं मिलते। अनिल की इस बात ने गर्व की अनुभूति करवा कर घाव को भरने का काम किया था।
‘‘मन को सुकून मिला आपकी बात से। वरना मुसाफिर मेरे पास थोड़ी देर ही ठहरते हैं। कुछ सहानुभूति के कोरे शब्द बोलते हैं और दाम चुकाकर निकल जाते हैं। आजकल तो दर्द, पीड़ा, सुख, सहानुभूति, संवेदना सहित सब चीजें बिकाऊ हो गई हैं। तभी तो सरे राह संवेदना को तिल-तिल मरते देखकर भी आदमी विचलित नहीं होता। लापरवाह बन अपने रास्ते निकल लेता है।’’
‘‘बहुत गहरी बात कही है भाई! व्यक्ति के सामने आज सबसे बड़ा संकट संवेदना का ही है। तभी तो हर आदमी एक अजीब-सी उलझन में घिा संशय से भरा जीवन जी रहा है।’’
‘‘मगर मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी है।’’
‘‘कैसे? किस उम्मीद की बात कर रहे हो?’’
‘‘जाहिर है, आदमी उम्मीद आने वाले समय, आने वाली पीढ़ी से ही करता है। मेरी भी उम्मीद वहीं टिकी है।’’
‘‘मैं तुम्हारी बात समझा नहीं।’’
‘‘अपने बेटे की बात कर रहा हूं। वह थोड़ा बड़ा होगा तो मेरा सहयोग करेगा। तब मैं पूरे परिवार को एक कर पाऊंगा। तब मां को यहां रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वह हमारे साथ रहेगी। बेटे को अभी से इसी भाव को ध्यान में रखकर तैयार कर रहा हूं।’’
अब जाकर अनिल को उसकी बात समझ में आई। उसे लगा, आलोक केवल वर्तमान को नियती मानकर नहीं जी रहा है। उसकी नजर भविष्य पर पर भी है। चूंकि नजर वहां है इसलिए उसने सपने भी पाल रखे हैं। जो आदमी सापने पालता है, वह कभी मरता नहीं। जीने का जज्बा उसे वर्तमान से लड़ने की शक्ति देता रहता है। अनिल का मन इस सोच से बेहद खुश हुआ।
‘‘मगर, क्या तुम यह नहीं चाहोगे कि तुम्हारा बेटा पढ़-लिखकर अफसर बने। बड़ा आदमी बने।’’
‘‘साहब, अफसर बनने से आदमी बड़ा नहीं बनता। परिवार को जोड़कर रखने वाला बड़ा आदमी होता है। सुख पैसों में नहीं, अपनों में बसा रहता है। इसे आज का आदमी भूल गया है। चाहता तो मैं भी सरकारी नौकरी कर लेता, मगर परिवार से दूर रहना पड़ता। फिर इनका ध्यान कौन रखता?’’
‘‘तुम्हारी बात में दम है।’’
‘‘दूसरे, इस जगह आदमी कम है तो नौकरी भी कम है। बेरोजगारी की स्थिति भयावह है। फिर नौकरी मिलना आसान भी तो नहीं। हमारे पास न पैसा है और न पावर। आजकल नौकरी के लिए इनका होना जरूरी है।’’
‘‘पावर क्यों नहीं। तुम्हारे इलाके में भी तो एमएलए, एमपी होंगे ही। वे ही तो इस जमाने में बड़े पावर हैं।’’
वह हंसने लगा।
‘‘इसमें हंसने की क्या बात हुई! गलत तो नहीं कहा मैंने।’’
‘‘आपने गलत नहीं कहा, मगर जो कहा वह आधा सच है।’’
‘‘आधा सच कैसे?’’
‘‘पावर नेताओं के पास है, यह बात सही है। इससे तो इनकार ही नहीं। पैसा और पावर, ये दोनों चीजें नेताओं और अफसरों तक ही तो सिमट कर रह गई।’’
‘‘फिर हंसे क्यों?’’
‘‘मगर यह हमारे काम नहीं आते। परिवार, रिश्तेदार, भक्त आदि का ही कुनबा इतना बड़ा होता है इनका कि हम लोगों का तो नंबर ही नहीं आता। इसीलिए मैंने कहा कि आपकी बात आधा सच है। इसी कारण मुझे आधे सच पर हंसी आई।’’
आलोक ने गहरी और सही बात कही। इसी कारण अनिल चुप रहा।
‘‘इन नेताओं के लिए हम आदमी हैं ही नहीं।’’
‘‘फिर क्या हैं?’’
‘‘वोटर, फकत वोटर। चुनाव के समय ही उनके काम आते हैं। बाकी समय तो हम उनके लिए भीड़ हैं।’’
‘‘कटु सत्य तो यही है।’’
‘‘भीड़ इस कटु सत्य को जानती है, फिर भी भोगती है। या यूं कहूं कि भोगने को मजबूर है।’’
‘‘इसकी वजह क्या है?’’
‘‘भीड़ एक नहीं है, बिखरी हुई है। यदि एक हो जाए तो इन पावर वालों को पल भर में झुका सकती है।’’
‘‘यह एका भी तो कभी पूरा न होने वाला सपना बन गया है।’’
‘‘तभी तो भोगने की मजबूरी है।’’
‘‘तुमको ऐसा नहीं लगता कि हमारी व्यक्तिगत बातें अब काफी हद तक राजनीतिक बातों में तब्दील हो गई है?’’
‘‘यही तो विडंबना है। पहले राजनीति एक अलग चीज थी, मगर अब तो इसने हर घर में, खाने की थाली तक में अपनी जगह बना ली है। चाहकर भी व्यक्ति इससे बच नहीं सकता। खैर, छोड़ो इन बातों को। राजनीति की माया नेता जाने, हमेंक्या! आप पहाड़ पर कैसे जा रहे हैं?’’
आलोक की तरफ से यह पहला सवाल था। अब तकतो अनिल ही उससे सवाल कर रहा था। आलोक के भीतर भी सवाल जिंदा है, इसका मतलब उसकी आदमियत जिंदा है।
‘‘साहित्य का एक बड़ा आयोजन है पहाड़ी पर। उसमें भाग लेने जा रहे हैं हम। पूरे देश से लोग आ रहे हैं उसमें।’’
‘‘ओह, आप भी साहित्य से जुड़े हैं। तभी इतने सवाल कर रहे हैं। मगर आपके लिखे को पढ़ते कितने लोग हैं?’’
यकायक सहज में कही गई उसकी बात ने अनिल को पूरी तरह से हिला दिया। क्योंकि यह तो अस्तित्व से जुड़ा सवाल था। सच्चा सवाल था। इस प्रश्न का हल ढूंढ़ने में ही तो आजकल हर साहित्यकार लगा है। मगर जवाब मिल ही नहीं रहा।
तभी आलोक की मां आ गई।
‘‘बेटा, आज मैंने ग्राहकों के साथ तेरे पापा के लिए अलग से सेब की सब्जी बनाई है। रात को जाते वक्त ले जाना। उनको बहुत पसंद है।’’ यह कहकर मां वापस चली गई और अपने काम में लग गई।
आलोक भावुक हो गया। कई बार मां इसी तरह पापा की पसंद की सब्जी बनाकर देती थी, क्योंकि उसे उनकी पसंद मालूम थी। पापा भी मां की सब्जी खाकर बहुत खुश होते थे। कई देर तक तो उस सब्जी को देखते ही रहते थे। फिर मुस्कराते और उसे खाना शुरू कर देते। भली ही पेट भर जाए, मगर उस दिन मां की भेजी पूरी सब्जी खत्म करते थे। खाते वक्त अगाध स्नेह उनकी आंखों से टपकता रहता था। खा-लेते तो फिर उदास हो जाते। मां से दूरी का दर्द फिर से छलक पड़ता। आलोक यह सब देखकर भावुक हो जाता। उसे लगता मां को पापा के पास छोड़ दूं और अपनी पत्नी को नीचे होटल पर ले जाऊं। मगर यह भी तो संभव नहीं था। क्योंकि उसके नीचे आ जाने पर मां-पापा और बाकी लोगों का खयाल कौन रखे? आज सब्जी ले जाने के बाद भी यही सब होगा। यह सोचकर वह भावुक हो गया था।
अनिल उसके मन के भाव ताड़ गया था, क्योंकि उसने भी तो अपने मम्मी-पापा का इस तरह का स्नेह महसूस किया हुआ था। पापा बहुत बातूनी थे। मां सूं हर समय तकरार करते रहते थे। मगर मां के स्वर्गवास के बाद तो वे बात करना ही भूल गए। हर समय चुप रहते। अपनी इच्छा भी बताने से परहेज करते। उसे अपने मम्मी-पापा याद आ गए।
‘‘क्या हुआ साहब! किन खयालों में खो गए?’’
‘‘कुछ नहीं। तुम्हारी मां का आना, तुम्हारे चेहरे के भाव देखकर मैं भी पुरानी यादों में खो गया।’’
तभी अचानक से घाटी के उस क्षेत्र में बादल आ गया। उससे अंधेरा हो गया। मनोज और अंकल भी उठकर खड़े हो गए थे। आलोक आकाश की तरफ देख रहा था।
‘‘साहब, आप अब निकल लें। नहीं तो बारिश आ जाएगी। फिर गाड़ी चलाने में मुश्किल होगी।’’
‘‘सही कह रहे हो। हम वहां तक बरसात से पहले पहुंच तो जाएंगे न!’’
‘‘बिलकुल। यह अभी यहां बरसेगा, आप निकल लीजिए। तब तक ऊपर तक बादल पहुंच नहीं पाएगा।’’
‘‘तुमको तो बादलों का बड़ा अनुभव है!’’
‘‘अब तक की उम्र इन बादलों को देखते हुए ही गुजारी है।’’
तभी मनोज पास आया।
‘‘चलो भाई! मौसम खराब हो जाएगा।’’
‘‘चलते हैं। अभी पहाड़ पर बरसात नहीं आएगी। हमारे पहुंचने के बाद ही आएगी।’’
‘‘तुम कोई मौसम वैज्ञानिक हो क्या?’’
‘‘नहीं। इस आलोक ने मुझे बताया। यहीं रहता है। बचपन से बादलों को देख रहा है।’’
मनोज को अब बात समझ में आ गई।
‘‘बादलों की भाई को पूरी जानकारी है।’’
आलोक उदास हो गया। बहुत संभलकर बोला-
‘‘साहब, मेरा जीवन भी तो आकाश की तरह ही है। जिंदगी आकाश और मैं बादल का एक टुकड़ा। कभी यहां तो कभी वहां। बादल का टुकड़ा ही तो हूं....।’
लेखक
मधु आचार्य 'आशावादी'
राजसूय के संरक्षक
दैनिक भास्कर के कार्यकारी रहे संपादक मधु आचार्य 'आशावादीÓ साहित्य के क्षेत्र में भी जाने-पहचाने नाम हैं। पत्रकारिता की शुरुआत राष्ट्रदूत से की। इन दिनों आरएनई के लिए सेवाएं दे रहे हैं। राजसूय के संरक्षक।