खबर सबसे पहले
राजसूय। कस्बे के हमारे पुश्तैनी मकान का सौदा हो गया। घर पड़ौसी ने ही खरीदा तो थोड़ी तसल्ली हुई। चलो घर कदीमी पड़ौसी के ही पास रह गया है। पड़ौसियों का संग-साथ पीढ़ियों से रहा था। किंतु जब हमारा काम इन्दौर में जम गया तो तीनों भाइयों ने यहीं एक हाऊसिंग सोसाइटी में ऊपर-नीचे तीन फ्लैट ले लिए। इधर अनेक वर्षों से पुश्तैनी कस्बे में चाहकर भी जाना हो ही नहीं पा रहा था। बीकानेर के थली अंचल से बड़े भइया तीस वर्ष पहले काम की तलाश में इन्दौर आ गए थे। विवाह के कुछ माह बाद ही हम दोनों भाइयों को भी भाईजी के बुलावे पर यहीं आना पड़ा। हमारा काम-धंधा कोई बहुत बड़ा नहीं है। दो-चार कर्मचारियों के साथ खुद खटना पड़ता है। कभी कोई अपरिहार्य काम होने पर कर्मचारियों के भरोसे छोड़ कर जाने पर हो सकता है, नुकसान न हो, पर आशंका तो बनी रहती ही है। और तीनों भाई तो एक साथ कहीं जा ही नहीं सकते, किसी एक को तो रहना ही पड़ता है।
यों भी इन्दौर काफी सुहावना और मनभावन शहर लगा तो, बड़े भइया के सहयोग से हम दोनों छोटे भाइयों ने भी अपना-अपना धंधा यहीं जमा लिया। देश के पुश्तैनी मकान में मां- बाबूजी अकेले रहते थे, एकाध दिन के लिए हम भाइयों में से कोई एक जाया करता और उनकी किसी न किसी तकलीफ का हल करके लौट आते। हर बार हम उनसे साथ चलने का आग्रह किया करते पर वे यह कहकर टाल जाते कि इस कस्बे और मौहल्ले के अलावा उनका कहीं भी जी नहीं लगता। हम मन मसोसकर रह जाते। किन्तु दोनों जब चलने-फिरने से लाचार हो गए तो उनकी न आने की आना-कानी की ज्यादा परवाह न करते हुए बड़े भइया सुरेश किसी तरह से ठगा-पटा कर उन्हें यहीं ले आए थे। वे अक्सर पुश्तैनी घर-गवाड़ी, गली-मौहल्ले, गांव के लोगों, पुराने जमाने की बातों को याद किया करते। बड़ी भाभी उनकी हर बात को गौर से सुनती तथा अक्सर उन्हें दिलासा दिया करती कि वह जल्दी ही उन्हें कुछ दिन देश ले जाकर लाएगी। मझले दिनेश भइया की धर्मपत्नी यानी मेरी मझली भाभी तथा मेरी श्रीमती को पुश्तैनी कस्बा अधिक रुचता नहीं है।
बड़ी भाभी ने भइया और हम दोनों देवरों को राजी भी कर लिया था कि दस दिन हम अपने गांव के मकान जिसे वे हवेली कहती थीं, में रहेंगे। दस दिनों में व्यापार का कोई घाटा नहीं होनेवाला, हमारे कर्मचारी सब संभाल लेंगें। थोड़ी- सी किन्तु-परन्तु के बाद भाभी की बात से लगभग सभी सहमत हो चुके थे। यह भी तय हुआ कि जाएंगे तो मकान की मरम्मत और एक दो धार्मिक व्रत-उद्यापन भी कर आएंगे। पर कहावत है न 'मेरे मन कछु और- हरि के हाथ कछु और।' कोरोना काल के कहर में थोड़े-थोड़े अर्से बाद मां-बाबूजी दोनों ही चल बसे। हमने इलाज कराने में कोई कसर नहीं रखी, पर रोग संभला ही नहीं। किसका वश चले? उनके गुजर जाने पर बड़ी भाभी काफी उदास रहने लगीं। वे उनकी सेवा और करना चाहती थीं।
वस्तुतः भाभी को भी देश से प्रेम रहा है। वे अपनी शादी के दस बारह साल तक हवेली में मां-बाबूजी के साथ रही हैं। हम लोग जब अपनी पत्नियों को यहां इन्दौर लेकर आए और हमने तीन अलग-अलग फ्लैट लिए तो बच्चों की पढ़ाई की बात कहकर अपने दोनों बच्चों के साथ भइया भी भाभी को यहीं ले आए थे।
उज्जैन महाकाल की यात्रा के बहाने, देश की हवेली के पड़ौसी इन्दौर आकर भइया से मिले और अपना मंतव्य साधते हुए उन्हें सुझाया कि देश का मकान जर्जर हो चला है। आप का काम यहां भली प्रकार जमा हुआ है, इसलिए आपका वहां आना कम ही मुमकिन लग रहा है। बात को बिना घुमाए कह रहा हूं, नाराज मत होना। आप चाहें तो इसे बाजार भाव से हमें दे सकते हैं।
भइया इस प्रस्ताव से थोड़े से तो अन्यमनस्क हुए, पर फिर कुछ सोचकर पूछा कि- "मकान का क्या मिल सकता है?"
पड़ौसी ने सरगोशी के अंदाज में कहा, "भाई साहब! यूं तो थोड़ा दूर आपके जितना ही बड़ा मकान लूं तो पचास में मिल जाए, पर आप वाला मेरे घर के ठीक सामने हैं, इसलिए साठ दे सकता हूं। साठ से उसका आशय साठ लाख से था। भइया इस ऑफर से पिघल गए। उन्होंने हम दोनों भाइयों से सलाह ली तो हमने कहा, भइया जैसा आपको उचित लगे।
भाभी ने जरूर प्रतिरोधपूर्वक कहा कि- 'पुरखों की जमीन कोई बेचता है क्या?
भाभी के सवाल का ठीक-ठीक उत्तर तो हम में से किसी के पास नहीं था,पर भइया ने एक मुर्दा-सी दलील रखते हुए कहा कि मारवाड़ और मालवा में क्या अंतर है? अभी व्यापार में बीस-बीस लाख रुपये डालने से काफी मदद मिल सकती है।
एक-दो दिन में ही पता नहीं किस तरह से भइया ने भाभी को मना ही लिया और पड़ौसी अपने साथ लाई राशि बयाने के रूप में सौंप गया। दो-तीन महीने में मकान के सौदे की सारी राशि प्राप्त हो गई। इस बीच दो दिन के लिए भइया देश गए और मकान के बर्तन, जूनी चीजों को एक कबाड़वाले को बेच आए। अब मकान में कुछ नहीं था।
मकान की रजिस्ट्री करवाने के लिए बड़े भइया, भाभी और मैं देश आए, मझले भइया की पाॅवर-ऑफ-अटर्नी साथ ले आए। देश में हम अपने ही समाज के गेस्ट हाउस में कमरा लेकर रुके। भाभी बार- बार मकान में चलने का आग्रह हम दोनों भाइयों से कर रही थी। उनके आग्रह का मान रखने के लिए हम दोनों भाई उन्हें लेकर मकान पर आए।
बहुत उतावल के साथ भाभी घर में घुसी और एक-एक कमरे को खोलकर उन्हें गौर से देखने लगी, शायद उन्हें पुरानी स्मृतियां हो आईं। वे बहुत उदास मन से खोई हुई-सी हर कमरे को खोल-खोलकर देख रही थीं। उनकी आंखें भीगी हुई थीं। बड़े वाले कमरे को खोलकर उन्होंने कहा कि पड़ौस के कितने लोग हमारे घर इस कमरे में बैठकर ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर रामायण देखा करते थे। भाभी पिछवाड़े की नाल (रास्ता) खोलकर कई देर भाव-शून्य सी ठिठकी- खड़ी रहीं।
वे देख रही थीं, पिछवाड़े की सदा हरी रहनेवाली खेजड़ी उदास-सी खड़ी थी। कितने आस-चौथ के व्रतों की साक्षी रही है यह। भाभी कुछ पल के लिए खेजड़ी के नीचे खड़ी रहीं।
हमने देखा, सभी जगह थोड़ी-थोड़ी देर खड़ी रहकर भाभी आंख मुंदें मन ही मन कुछ बुदबुदा रही थीं।
गेस्ट हाउस में लौटने पर मैंने कुतूहलवश भाभी से पूछा- भाभी, आप मकान में हर जगह ठिठक-ठिठक कर क्या बुदबुदा रही थीं?
भाभी कुछ पल तो खामोश रही, इस प्रश्न से फिर उनकी आंखें भर आई थीं, जिन्हें साड़ी के पल्लू से पोंछते बोली, लाला! हवेली उल्हाना दे रही थी और खेजड़ी भी। इसलिए हर जगह से क्षमा मांग रही थी। खेजड़ी से भी।
लेखक
चेतन स्वामी
साहित्य अकादेमी के सर्वोच्च भाषा पुरस्कार से समादृत चेतन स्वामी एक कवि, कहानीकार, अनुवादक, आलोचक और संपादक भी हैं। पत्रकारिता के लिए भी आपको राजस्थान पत्रिका ने पुरस्कृत किया है।