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राजसूय। पता नहीं क्या सोचकर उसके माँ-बाप ने उसका नाम रखा था 'रतन'। मैं तो क्या पूरे मोहल्ले में एक भी शख्स ऐसा नहीं था जो उसके माँ-बाप से सहमत हो। जब और जहां भी उसकी बात चलती, लोग उपहास करते हुए कहते कि इसके माँ-बाप ने इसका नाम 'रतन' रखकर रतन शब्द के साथ अजीब-सा मजाक किया है। पाटों और पान की दुकानों पर घण्टों तक उसका मजाक बनाने वाले लोग उसके नाम के ठीक आगे 'न' जोड़कर, फिर पूरे शब्द का मध्य से सन्धि-विच्छेद करके कहते कि 'यह बेचारा तो ढंग से 'नर तन' भी नहीं है लेकिन घर वालों को रतन लगता है।'
यह बात समाप्त होते ही लोगों का झुण्ड जोर से ठठाकर ऐसे हंस देता, जैसे कि रतन के लिए रखे गए इस निन्दा प्रस्ताव को ध्वनिमत से सबने अपना समर्थन दे दिया हो।
शाम के बाद देर रात तक मोहल्ले में जगह-जगह जमे, बातों की जुगाली करते समूहों में राजनीति, महंगाई, सरकार और आतंकवाद पर होने वाली अन्तहीन बहसें जब उबाऊ और विवादित होने लगती तो किसी एक व्यक्ति द्वारा बड़ी चतुराई से बातों का रुख रतन की तरफ मोड़ दिया जाता। फिर तो रतन के किस्से ऐसा असर दिखाते कि कुछ देर पहले तक लाल हो रही आंखें और फुंफकारती नासिकाएं सामान्य होकर पुनः अपने सहज स्वरूप में आ जाती और पान, गुटखे तथा जर्दे के रस से अभिषिक्त रहने वाली रक्तवर्णी दंत पंक्तियां होंठों की सीमाओं का अतिक्रमण करके बाहर आने को उद्यत दिखाई देने लग जाती। रतन के ऊपर घण्टों तक हंसने वाले इन लोगों में ही रतन का जबरदस्त आतंक भी था। आतंक, डॉन, मवाली या गुण्डे वाला नहीं, उस लिहाज से तो वो बेचारा निरीह था। आतंक इन अर्थों में था कि उसकी छवि पूरे मोहल्ले और आस-पास के इलाकों में पकाऊ, चिपकू और बे-सिर-पैर की बातें करने वाले फैंकू और गपोड़ के रूप में थी। इसीलिए लोग उसे सामने से अपनी तरफ आते देखकर दूसरी गलियों में घुस जाते थे।
इन सारी बातों, मजाकों और अपने उपहास में जमने वाले मजमों से बेखबर रतन एक अलग ही दुनिया में जी रहा था। सबको पता था कि वह मात्र पाँच हजार की एक मामूली-सी नौकरी करता है, मगर उसकी बातें हजारों, लाखों से शुरू होकर करोड़ों तक पहुँचती थी। देखने में भले ही उसकी हैसियत प्रथम श्रेणी के रेल के डिब्बे में यात्रा करने की भी नहीं लगती थी, लेकिन अपनी हवाई यात्रा के किस्से सुनाते समय उसका आत्मविश्वास देखकर जरा भी नहीं लगता था कि वह गप्प मार रहा है। रतन की विशेषता यह थी कि उससे बात करने वाला व्यक्ति जिस क्षेत्र से सम्बन्धित होता, रतन उसी क्षेत्र की राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय हस्तियों से अपने बेहद निजी और घनिष्ठ ताल्लुकात का जिक्र इस आग्रह के साथ करता कि सुनने वाला यह बात आगे किसी और को न बताए।
पिछले दिनों रणछोड़ मास्टरजी का लड़का रवि रणजी ट्रॉफी खेलकर आया था। वह मोहल्ले में पनवाड़ी की दुकान पर खड़ा अपना वह बैट दोस्तों को दिखा रहा था, जिस पर महान क्रिकेटर कपिलदेव ने अपना ऑटोग्राफ दिया था। बकौल रवि कपिलदेव ने उसे अच्छा क्रिकेटर बनने के गुर भी बताए थे।
'रवि! तूने कपिल साहब को बताया तो नहीं होगा कि तू बीकानेर के गांधी चौक का रहने वाला है ?'
बातों में व्यस्त रवि पीछे से अचानक आई इस आवाज से चौंका। उसने मुड़कर देखा और तत्काल ही खुद को संभालते हुए बोला - 'नहीं रतन काका, न तो ऐसी कोई बात चली और न ही मैंने उन्हें यह बताया।'
पनवाड़ी की दुकान पर रतन का यह अप्रत्याशित प्राकट्य देखकर रवि की बातों से रोमांचित हो रहे श्रोताओं में से दो-तीन तो हिम्मत हारकर तुरन्त ही भाग छूटे और रवि की उपलब्धि से मन ही मन जल-भुन रहे कुछ लोग केवल यह देखने के लिए डटे
रहे कि रवि के कपिलदेव से मिलने के जुकाम को रतन अब किस तरह चुटकियों में उतारने वाला है। उन लोगों का यह अनुमान सही साबित होता भी दिख रहा था।
'अगर तूने उनको यह बताया होता कि तू यहां का रहने वाला है तो तुझे इससे भी ज्यादा वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता। तेरे बताते ही वो तुझसे पहला सवाल यही करते कि आपके मोहल्ले में रहने वाला रतन कैसा है ?' रतन का रहस्योद्घाटन सुनकर रवि का मुंह खुला का खुला ही रह गया। पनवाड़ी तो रतन द्वारा की गई ऐसी कई वारदातें देख चुका था, उसने मुस्कुराते हुए रवि पर तरस खाकर अपनी गर्दन को एक विशेष अन्दाज में हिलाया और पान लगाने लगा।
'कपिलदेव आपको कैसे जानते हैं रतन काका ?'
रवि जैसे किसी सदमे से उबरने की कोशिश कर रहा हो।
'अरे! हमारा तो बचपन साथ ही गुजरा था बेटा! जब मैं छोटा था तब मेरे बाबूजी हरियाणे में नौकरी करते थे, पूरे पाँच साल तक कपिलदेव के गाँव में रहे हम लोग। पहली से पाँचवीं तक मैं और वो खेजड़े वाली स्कूल में निकर पहनकर साथ ही जाते थे। लेकिन ये बातें किसी को कहने की नहीं है बेटा। कौन मानेगा कि मेरे जैसा लूरिया-जमारिया किसी जमाने में कपिलदेव का जिगरी हुआ करता था।'
रतन की बातें सुनकर रवि को अपनी उपलब्धि बहुत बौनी लगने लगी। वह कुछ बोल पाता इससे पहले पनवाड़ी ने पान पर कत्था-चूना रपटाते हुए पूछा, ये सब याद तो होगा ही कपिल देव को ? कभी फोन वगैरह.....?'
'अरे नहीं पप्पू भाई, वो इतने बड़े आदमी काहे को मुझे याद रखेंगे ? और क्या लेने यहां फोन करेंगे ?'
रतन ने पनवाड़ी की बात को बीच में काटते हुए कहा।
'एक बात है, सामने खड़ा होऊं तो झट से पहचान जाएंगे मुझे।'
'कैसे पता ?' मगन ने आँखें फाड़कर पूछा।
'कैसे पता क्या ? अभी दो बरस पहले हमारी कम्पनी किसी टूर्नामेंट की प्रायोजक बनी थी। कम्पनी के मालिक ने आधी रात को मेरे यहाँ फोन खड़काकर कहा कि रतन ! ये सारी जिम्मेदारी तुम्हें ही उठानी है। मेरा मन तो नहीं था पर जब मालिक गिड़गिड़ाने लगा तो मैंने भी कहा कि चलो भइया, ये भी करके देख लेते हैं। बस! उसी टूर्नामेंट में कपिलदेव जी आए थे। पहले तो मुझे बहुत देर तक गौर से देखते रहे, फिर बोले, तू रतन है ना ? मैं कपिलदेव निखंज तेरा जिगरी कप्पू। मैंने कहा, तुझे तो वैसे भी देश का बच्चा-बच्चा जानता है भाई, मैं तो इसलिए नहीं बोला कि अब तू इत्ता बड़ा क्रिकेटर है, इण्टरनेशनल सेलीब्रिटी है। मैं एक मामूली आदमी। वो बोले – अरे, ऐसी बातें मत कर यार। आदमी सब कुछ भूल सकता है, लेकिन अपने बचपन के सुहाने दिन कभी नहीं भूलता। तू तो मेरे उन दिनों का साथी है रतन, आ साथ में कॉफी पीते हैं।'
अपनी ऐसी ही बातों और ऐसे किस्सों की बदौलत रतन मोहल्ले के सभी चुटकुलों का प्रमुख पात्र बना हुआ था। यह तो कल्पना करना भी बेमानी था कि उसकी बातों को कभी किसी के द्वारा गंभीरता से लिया होगा। आलम तो यह था कि यार-दोस्तों के जमघटों में किस्सा–गो और परफॉर्मर टाइप के लोग उसकी एक्टिंग और मिमिक्री करके काफी वाहवाही लूटते थे।
रतन के जीवन का यह दूसरा पक्ष शायद कोई जानता था या नहीं कि दो कमरों के पुराने से जर्जर मकान में रहने वाले 50 वर्ष के रतन को अपनी पुरानी–सी साइकिल बीमार पिता के इलाज के लिए बेच देनी पड़ी थी। यह दूसरी बात थी कि पिता फिर भी नहीं रहे। रतन के भीतर पिता और साइकिल के दुःख से उबर पाने की जद्दोजहद अभी तक चल ही रही थी कि प्रकृति ने उसके साथ फिर एक क्रूर मजाक कर लिया। थोड़े दिन बीमार रहने के बाद पत्नी भी उसका साथ छोड़कर चली गई।
अब घर में प्रतिपल जवान होती बेटी और हर क्षण पहले से ज्यादा बूढ़ी होती माँ के बीच एक रतन ही था जिसके पास अभावों की आग की तेज तपिश झेलते हुए भी जीवित रहने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था। घर में शेष बचे हुए दो लोग ऐसे थे, जिनके मौजूद रहते रतन को निराश–हताश होकर ज़िन्दगी के सामने घुटने टेकने का जरा भी अधिकार नहीं था। उसको देखने से यह आभास नहीं होता था कि वह टूटा है, और अगर सच में वह टूटा था तो उसकी यह टूटन बहुत ज्यादा गहरे तक थी। हो सकता है भीतर ही भीतर टूटकर बिखर भी गया हो, मगर तारीफ यह थी कि अपनी टूटन और बिखराव को ऊपर सतह तक उसने कभी नहीं आने दिया। मैं कुछ ज्यादा ही संवेदनशील था या फिर मुझे रतन के प्रति कुछ सहानुभूति-सी होने लगी थी, यह समझ नहीं आ रहा था, पर मुझे उसे सुनना अच्छा लगने लगा था। मोहल्ले में पीपल के चबूतरे पर मैं रतन से घण्टों तक बतियाता था तो उस पर बनने वाले चुटकुलों में मुझे भी यथोचित स्थान और आदर मिलने लगा पर सौभाग्य से मुझे कभी उसकी परवाह नहीं हुई।
रतन एक समन्दर की तरह मेरे सामने था। उसमें आवेगों-संवेगों की अनगिनत लहरें निरन्तर उठती जाती थी। इन लहरों में वह मुख्यमंत्री के आवास पर बेखौफ़ जाकर उनसे बेधड़क बेबाक बातें करने के किस्से के बीच अचानक से असमय साथ छोड़ गई पत्नी को याद करके आँखें भिगो लेता था तो कभी किसी फ़िल्म अभिनेता की बेटी की शादी में शरीक होने की बात कहते-कहते उसे अपनी बिना माँ की बेटी दुल्हन के लिबास में नज़र आने लगती। कभी किसी बड़े नेता को अपने पिता के देहान्त की खबर देने की बात बताते-बताते उसके चेहरे पर दर्द और अकेलेपन की परछाइयां अनचाहे ही उभर आती थी, लेकिन वो रतन था, उसने किसी तरह जीना सीख लिया था। वह अवांछित रूप से बेवक्त की उभर आई वेदना को झाड़-पोंछकर तुरन्त ही किसी अगले किस्से का सिरा पकड़ लेता, जहाँ किसी बड़ी संगीत कम्पनी का मालिक अपने नए एलबम की रिकॉर्डिंग और लॉन्चिंग उसकी देखरेख में करवाने की जिद करने लगता। यह रतन का संसार था। उसकी अपनी दुनिया। उसके ख़यालों में बसा एक ऐसा जहान, जहाँ वह देशभर की सेलिब्रिटीज का चहेता था, करीबी था, उनका संकट-मोचक था। यहाँ नायिकाएं उसे प्रणाम करती, राजनेता हाथ मिलाते, पार्श्वगायक गाने के सुर पूछते, बिजनेसमैन अपनी कम्पनियां संभालने के निवेदन करते तो प्रशासनिक अधिकारी आपातकालीन स्थितियों में उससे सलाह-मशविरा करते थे। अपनी इस दुनिया में वह अभावों से जूझता, वेदनाओं को जीता, अकेलेपन को भोगता और दो जून की रोटी के लिए दौड़ता रतन नहीं था। यहाँ उसे माँ के आँसुओं में भीगे जर्जर बुढ़ापे और बेटी के मुरझाए कुंआरेपन को कम ही जीना पड़ता था। जीने के अपने इन बहानों के साथ शायद वह खुश ही था।
'लाडो, कल सुबह जल्दी उठ जाना और मुझे भी जल्दी उठाना।'
रतन ने अपनी बेटी को फरमान जारी करने के लहजे में कहा। बेटी ने कारण पूछा तो कहने लगा, 'अरे, कैसी लड़की है तू? तुझे पता नहीं कल 15 अगस्त है।'
'हाँ, है तो सही।' बेटी बोली।
'है तो सही क्या? ..... अपन स्टेडियम चलेंगे। इस बार सरकार प्रदेश का मुख्य समारोह बीकानेर में कर रही है। मुख्यमंत्री के साथ सारे मंत्री, बड़े–बड़े नेता, उद्योगपति, कलक्टर, कमिश्नर सब होंगे। तरह–तरह की झांकियां और बहुत सारे कार्यक्रम होंगे। कुल मिलाकर बड़ा आलीशान कार्यक्रम होगा बेटा। मैंने तो ऐसे प्रोग्राम बहुत देखे हैं ..... सोचता हूँ कि तुझे भी दिखा लाऊं। ऐसा अद्भुत नजारा। मैंने पास की व्यवस्था भी कर ली है। अब सुबह उठने में आलस मत करना, वरना चूक जाएगी बहुत कुछ देखने से।' बेटी की जिज्ञासा को जागृत करते हुए रतन ने कहा।
'हाँ पापा, सुबह जरूर चलेंगे स्टेडियम। मुझे टीवी और अखबार में आने वाले लोगों को अपनी आँखों से देखना है।' बेटी चहककर बोली। फिर सुबह का इंतजार आँखों में लेकर बाप–बेटी सो गए।
बीकानेर का विराट राजकीय स्टेडियम। हजारों लोगों का हुजूम। चारों तरफ भीड़ ही भीड़। सुरक्षा के सख्त इंतजाम। हाथों में वायरलैस लिए इधर–उधर घूमते सैकड़ों पुलिसकर्मी। अपने मातहत कर्मचारियों को लगातार निर्देश देते प्रशासनिक अधिकारी। हाथों में, कंधों पर कैमरे टिकाए हर पल की छवियां कैद करते मीडिया के लोग। बैरीकेट्स के द्वारा अलग–अलग बांटे गए स्टेडियम के विभिन्न हिस्सों में जगह चुरा–चुराकर धंसे हुए लोग और उनके हाथों में लहराते सैकड़ों छोटे–बड़े तिरंगे के स्वरूप। कार्यक्रम आरम्भ हुआ। मंच संचालक ने सधी हुई आवाज में मुख्यमंत्री, मंत्रिमण्डल के सभी सदस्यों, पक्ष–विपक्ष के बड़े नेताओं तथा उपस्थित विशिष्टजनों का स्वागत किया। भव्य विराट मंच हजारों आँखों द्वारा अपलक निहारा जा रहा था। उन्हीं हजारों आँखों में दो जोड़ी आँखें रतन और उसकी बेटी की भी थीं।
झण्डारोहण हुआ। तिरंगा खुलकर पूरी आन, बान, शान से लहराने लगा। स्टेडियम से उठे 'जन गण मन' के समवेत स्वर आसपास के वायुमण्डल में गूँज उठे। आकाश में श्वेत कबूतर छोड़े गए। सभी औपचारिकताओं के बाद संचालक ने बाअदब मुख्यमंत्री जी को उद्बोधन के लिए आमंत्रित किया। हजारों लोग स्टेडियम में उपस्थित थे और लाखों लोग टीवी चैनलों के माध्यम से प्रदेश के मुख्य स्वतंत्रता दिवस समारोह को लाइव देख रहे थे।
मुख्यमंत्री ने जैसे ही मंचस्थ अतिथियों और प्रदेश की जनता को सम्बोधित कर अपनी बात शुरू की, तभी अचानक एक जोर की आवाज हुई। स्टेडियम में उपस्थित जन समुदाय, मुख्यमंत्री और अतिथियों आदि सभी ने एक साथ उस आवाज की दिशा में देखा।
आम जनता की दर्शक दीर्घा की तीसरी विंग में हड़कम्प-सा मच गया। आवाज यहीं से आई थी। इस विंग में लगी हुई विशाल कनात का एक रस्सा जिस नए बने हुए खम्भे से बांधा गया था, हवा के जोर और रस्से की ताकत को वह खम्भा अधिक देर तक झेल नहीं सका। अचानक उस खम्भे का एक पत्थर निकलकर गिर पड़ा। कनात का वह हिस्सा बहुत ही डरावने ढंग से मुक्त होकर जन समुदाय पर जा गिरा। तसल्ली से मंच पर आँखें जमाए बैठे लोग बुरी तरह से घबरा गए। सभी चौंक गए कि ये सब क्या हो गया है। अगले ही मिनट सभी अधिकारी कर्मचारी पुलिसकर्मी और मीडियाकर्मी इसी तरफ दौड़े चले आए।
कनात को समेटकर इकट्ठा करने के बाद अफरा-तफरी के बीच ही सब का ध्यान उस तरफ गया, जहाँ खम्भे का वह मनहूस पत्थर गिरा था। सबने देखा कि 17-18 साल की एक लड़की, एक अधेड़ उम्र के लहूलुहान शख्स का सिर अपनी गोद में रखे सुबक रही है। हाँ..... वह रतन ही था। हे भगवान! रतन नहीं रहा। यह समाचार कन्ट्रोल रूप से आया। जहाँ मेडिकल टीम उसे बचाने के लिए प्रयास कर रही थी, लेकिन बचाया तो उसे जाता जो जिन्दा होता। सिर पर पत्थर की चोट लगते ही सांसारिक जटिलताओं से जूझती उसकी आत्मा को यह देह त्यागने का अवसर मिल गया। हजारों लोगों की भीड़ में एक भयावह सन्नाटा पसरा था। समारोह की औपचारिकता आनन-फानन में पूर्ण हुई।
माटी हो चुकी रतन की देह स्टेडियम के बड़े से कार्यालय में थी। मुख्यमंत्री हाथों में पुष्प लेकर वहाँ पहुंचे और रतन के पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित की। उनके साथ बड़े-बड़े नेताओं, मंत्रियों, उद्योगपतियों, आला अधिकारियों और दूसरे वी.आई.पी.'ज से घिरा रतन जैसे उनसे भी बड़ा वी.आई.पी. था, जो सबके सामने निश्चिंत होकर सोया हुआ था। मुख्यमंत्री ने रतन की बेटी के सिर पर वात्सल्य से हाथ फेरा, उसके परिवार की जानकारी ली। उन्होंने अधिकारियों को रतन के परिवार के लिए जरूरी निर्देश दिए और आगे के सभी कार्यक्रम रद्द कर रतन के अन्तिम संस्कार में जाने की घोषणा की। उम्रभर बड़ी-बड़ी हस्तियों के बहुत करीब होने की बातें करने वाला यह गुमनाम सेलिब्रिटी राजकीय गाड़ियों के काफिले के साथ एक एम्बुलेंस में लेटा हुआ आखिरी बार अपने घर जा रहा था। कुछ देर पहले मुक्त किए गए श्वेत कपोत अब बहुत दूर जा चुके थे।
-संजय आचार्य 'वरुण'
लेखक
संजय आचार्य 'वरुण'
बीकानेर की महान दिवंगत हस्तियों की स्मृतियों को ताजा करते हुए लिखे जाने वाले कॉलम 'वो चेहरे याद आते हैं' के लेखक संजय आचार्य 'वरुण' जाने-माने कवि व शायर हैं। राजसूय के समाचार-समन्वयक।