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अलोचना - शाह संगत : तुम हो, तुम में है: अनुभूतियों की सघनता और भौंचक्का कर देने वाले प्रसंगों का गुलदस्ता

अनुभूतियों की सघनता और भौंचक्का कर देने वाले प्रसंगों का गुलदस्ता
राजसूय
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बीकानेर की प्रसिद्ध हवेलियों जैसी नक्काशी अपने लेखन में करते हुए चमत्कृत करने वाले अनिरुद्ध उमट देश के उन साहित्यकारों में से हैं, जिन्हें देखकर अग्रज-पीढ़ी आश्वस्त है। हिंदी साहित्य के भविष्य की चिंता का वे न सिर्फ शमन है बल्कि समाधान भी है। उनकी कृति 'शाह संगत : तुम हो, तुम में है' से निकलते हुए विभोर होने के अनेक पल मिलेंगे, लेकिन आप अंत तक यह तय नहीं कर पाएंगे कि यह पत्रों का विवेचन है, संवाद या एकालाप है, संस्मरण है या कि रेल का जीवंत सफर। चलते ही यह एक उपन्यास में तब्दील हो जाएगा और कई बार ऐसा लगेगा कि आपकी अपनी कहानी है। कविता तो जैसे शब्द से शब्द के बीच रची हुई है। त्रासदियों से संपृक्त, बिछोह से उत्सवित, मिलन से आशंकित और हर हाल में उत्साहित 'शाह संगत' संवेदनहीन के मन में भी ठीक उसी तरह से तरलता पैदा कर सकती है, जैसे पत्थरों में नक्काशी करने वालों ने हवेलियों को जीवंत कर दिया है। बीकानेर शहर की सिर्फ हवेलियां ही कलात्मक नहीं है, भाषा रचनात्मक तरीके से लेखक भी हैं। विश्वास नहीं होता तो अनिरुद्ध उमट से निकलकर देखिये। लिखते समय मानों वे शब्दों का शृंगार करते हैं। उनकी लगाई हुई मात्रा, छोड़ा हुआ कोमा और जुड़े हुए शब्द असंगत में संगत का वह अहसास है, जो तादात्म्य की मांग करता है। वाक्य रचना के प्रचलित नियमों में जरा-सा बदलाव करते हुए वे ऐसी रचना करते हैं कि आप तुरंत खारिज करने का साहस नहीं जुटा पाते। कहा जा सकता है कि यह अनिरुद्ध उमट की मौलिक संरचना है। नियमित रूप से साहित्य के विद्यार्थी उनके लेखन पर उनका नाम नहीं भी लिखा हो तो पहचान जाएंगे और जो अपेक्षाकृत कम पढ़ते हैं, वे भी पढ़ते हुए ठिठक जाएंगे। 
सवाल उछलेगा ही उछलेगा कि कौन है यह लेखक? 
इससे भी ज्यादा अचरज तब होगा जब सुदूर पश्चिम के बीकानेर शहर से एक नाम उभरेगा-अनिरुद्ध उमट।  'शाह संगत' वस्तुत: सुविख्यात लेखक रमेशचंद्र शाह के उन पत्रों का संग्रह है, जो उन्होंने अनिरुद्ध उमट को लिखे। उमट ने इन पत्रों के साथ अपनी अनुभूतियां संजोते हुए इसे ऐसा प्रवाह दिया है, जैसे कथा कही जा रही है। सही-सही यही है। यह एक कथा-प्रसंग है। यह कथा है अनिरुद्ध उमट के अंदर उमड़ते-घमड़ते साहित्यकार की अधीरता, छटपटाहट और स्वप्नदर्शी होने की। किस्मत और नियति को मानते हुए भी सतत कर्मशीलता में भरोसा रखने वाले बीकानेर के ऐसे युवक की, जिसके पास न तो ढंग से भोपाल जाने के लिए किराया तो क्या पत्रों को पोस्ट करने के लिए भी पैसे नहीं हुआ करते होंगे। बल्कि जिस दौर में वे थे, पत्र लिखने की पड़ी भी किसे थी। 
लेकिन इतिहास साक्षी है कि अनिरुद्ध न सिर्फ नियमित पत्र-व्यवहार करते बल्कि ऐसे पत्र लिखते है कि रमेशचंद्र शाह और ज्योत्सना मिलन जैसे अनेक अपने समय के महत्वपूर्ण रचनाकार उन्हें पत्रोत्तर भी देते हैं और पूरा डूबकर जवाब लिखते हैं तो इसे क्या समझना चाहिए? 

यही ना कि अनिरुद्ध उमट लेखक बनने के लिए ही पैदा हुए थे, लेकिन उन्होंने लेखन करते हुए अनेक शर्तों, वर्जनाओं और नियमों का उल्लंघन करते हुए वैसा लिखा, जैसा वे स्वयं चाहते थे। एक बार जब वे कुछ और बेहतर करने के लिए उद्यत होकर नंदकिशोर आचार्य के पास गये तो उन्होंने भी उन्हें कह दिया कि हम तुम्हें तुम्हारी शैली में ही सुनना चाहते हैं। रमेशचंद्र शाह भी पहले असहमत होने के बाद प्रस्तुति के बाद खुद को गलत मानते हुए अनिरुद्ध को सही स्वीकार करते हैं। 

'शाह संगत' में अनेक आरोह-अवरोह है। मुफलिसी के बावजूद रेलगाड़ी के सामान्य कोच में धर्मपत्नी किरणलक्ष्मी के साथ यात्राओं के अनेक किस्से हैं। 
यह कथा उमट के रमेशचंद्र शाह के प्रति अनन्य भाव को देखते-समझते प्रख्यात कवि लक्ष्मीशंकर वाजपेयी के उस अनुराग से शुरू होती है, जब वे अनिरुद्ध को अपने साथ अल्मोड़ा ले जाते हुए कहते हैं कि यही है तुम्हारे रमेशचंद्र शाह का अल्मोड़ा गांंव, लेकिन उस गांव में शाह नहीं मिलते, क्योंकि मिलना बीकानेर में लिखा होता है। 
बीकानेर में स्वाद की बात करते हुए संगत में उमट द्वारा अल्मोड़ा के खास स्वाद का जिक्र करते हुए शाह का ध्यान आकृष्ट करना। उनके हस्ताक्षर लेने के लिए हड़बड़ाए हुए ट्रेन में उस वक्त प्रवेश करना जब छूटने वाली हो और फिर एक दिन भोपाल के प्राफेसर्स कॉलोनी वाले उनके घर पहुंच जाना। इस पूरी यात्रा में रमेशचंद्र शाह के साथ ज्योत्सना मिलन और फिर इस तरह शम्पा शाह और राजोला से जुड़े कईं प्रसंग हैं, लेकिन नवीन सागर का आना जैसे इस पूरे कथा-क्रम का वह क्षितिज है, जहां से उतरना बेमन से होता है। बीकानेर में नवीन सागर का जिस तरह उन्होंने प्रवेश करवाया है, वह किसी कला-फिल्म के आते हुए अमिताभ बच्चन जैसा है। उनका हरीश भादाणी के साथ बहस करना। चाय की तलब लगने पर माहेश्वरी भवन के पीछे स्वामियों के मौहल्ले से बच्चों का बहाना कर गिलास भर दूध ले आना और आनंद निकेतन में कविता करते हुए सभी का दिल जीत लेना जैसे प्रसंगों के बीच मानवेंद्र बगरहट्टा के साथ भोपाल जाते समय हुए वाकयों में नवीन सागर का होना ऐसा रचा गया है कि जब इस किताब के माध्यम से पाठकों को खबर मिलती है कि वे नहीं रहे, तो सहसा पाठक भी भरोसा नहीं कर पाते। और फिर उनकी आखिरी इच्छा कि तुम मेरे लिखे का एक पन्ना भी किसी को मत देना। सब्र की सारी सीमाओं को तोड़ देता है। 
नवीन सागर के लिए एक जगह वे लिखते हैं-अवांछित, लेकिन जिस तरह वे घुल-मिल जाते हैं, दूध में चीनी की तरह हो जाते हैं। जिनके देहांत की सूचना कुछ फीका-फीका सा कर जाती है। उनके निधन के बाद भोपाल में उनकी धर्मपत्नी छाया से मिलने को याद करते हुए कहते हैं अनिरुद्ध, 'नवीन सागर अब उदासी का पक्का रंग हो चुके थे।'
ऐसा ही ज्योत्सना मिलन के देहावसान पर होता है। रमेशचंद्र शाह की पत्नी के रूप में अनिरुद्ध के प्रति अगाध स्नेह रखने वाली ज्योत्सना मिलन के पत्र भी इस किताब में संजोये हुए हैं तो उनके साथ यादें-बातें भी। गिरिराज किराड़ू को शाह की अपेक्षा मिलन का लेखन आकृष्ट करने का प्रसंग, जिसमें शाह बात की बजाय लहजे से असहज होते नजर आते हैं, बहुत ही मर्मबेधी है। शाह के घर में अनिरुद्ध का एक कमरा होना या अनिरुद्ध की छत पर ज्योत्सना मिलन का तारों भरे आकाश तले खूब बतियाना और पत्रों में आत्मीयता बांटती ज्योत्सना मिलन का भी विदा ले लेना। अनिरुद्ध लिखते हैं, 'हमारी बहुत-सी बातें थीं, बहसें थीं, असहमतियां थीं, स्नेह था, सिर्फ एक बात कभी नहीं थी कि मुझे उन के न रहने के बारे में लिखना होगा।'
शाह के एक पत्र में अनिरुद्ध उमट की एक कहानी 'छायाÓ का जिक्र है। कहानी के तकनीकी पक्षों पर बात करते हुए वे न सिर्फ सराहना करते हैं बल्कि एक पंक्ति पर भी ठिठक जाते हैं, जहां अनिरुद्ध लिखते हैं, 'हम जिन्हें स्नेह करते हैं वे हमारे पास अधिक समय तक नहीं रहते--बल्कि उनकी दूरियां हमारे साथ रहती हैं।' बकौल शाह, बड़ी पीड़ादायक सच्चाई है। 
और एक सच्चाई यह भी है कि शाह एक अदिनांकित पत्र का प्रारंभ ही इस तरह करते हैं, 'नयी पीढ़ी के बहुत ही कम लोग ऐसे मुझे मिले हैं जिनकी आंखों से अपने लिखे को पढऩे-जांचने-परखने की उमंग होती है।'
मुझे लगता है कि अनिरुद्ध उमट के लिए यह नोबेल है। नोबेल पुरस्कार। और एक ऐसे ही किसी संदर्भ में जब वे लिखते हैं कि सलाह-मशविरा करने लायक लोग यहां मुझे सुलभ नहीं। कुछ कहने को बाकी नहीं बचता कि शाह बार-बार बीकानेर क्यों आना चाहते हैं। अनिरुद्ध से सबकुछ शेयर क्यों करते रहते हैं। 
शाह और उमट के बीच पत्रों का यह सिलसिला लंबा चलता है और हर पत्र सिर्फ पत्र नहीं है। राजी-खुशी के समाचार नहीं है। समझ है, सीख है। जिज्ञासों और कौतुहलों का शमन है। रचना प्रकाशित नहीं होने पर हताश अनिरुद्ध को प्रेरित करती पंक्तियां हैं। यही नहीं रचनाद्रोहियों पर निशाना है कि जिन्हें समझ नहीं आता, वे आलोचक बन गए हैं। एक जगह तो लिखते हैं कि वहां भी लगता है कम्युनिस्टों ने ही गोटियां फिट कर रखी हैं। यह कहते हुए वे जिन प्रवृत्तियों की ओर इशारा करते हैं, एक नया लेखक भला क्या समझ पाता है, लेकिन उनका एक पत्र अनिरुद्ध को बताता है कि उन्हें क्या-क्या करना चाहिए। साथ ही कविता के साथ-साथ कविता की रक्षा के लिए समीक्षा करने के लिए भी प्रेरित करते हैं। कविता की रक्षा के लिए समीक्षा करने के लिए कहते हैं, लेकिन एक अन्य पत्र में  उनकी हिदायत भी है कि आलोचना के अधिकार के लिए हमें स्पष्ट समझ और पूरी सहिष्णुता की प्रेमशक्ति चाहिये। 
शाह की एक पंक्ति सूक्ति की तरह सामने आती है, 'मृत्यु न होती तो कला, दर्शन, सभ्यता, संस्कृति कुछ भी न होता।'और एक जगह कला क्या है का जवाब देते हुए कहते हैं, 'जिस संदिग्धता की बात तुमने की है--स्वयं जीवन की संदिग्धता की--उसी से उबरने की कोशिश कला है।'
मुझे लगता है कि इस जवाब के बाद सारे जाळे कट जाते हैं। 

बीकानेर से भोपाल के बीच बिखरे हुए यादों के फूलों को उठाने-सूंघने-सहेजन के ये पल सिर्फ अनुभूतियों की सघनता को ही अभिव्यक्त नहीं करते। कई बार ऐसे अवसर भी आते हैं कि भौंचक्का कर देते हैं। भोपाल में अनेक साहित्यकारों से मिलने-जुलने के प्रसंग है। अनिरुद्ध के एकल काव्यपाठ से लेकर दिनकर पर कार्यक्रम, हिंद स्वराज और डायरी विधा पर पर्चे पढऩे तक की यादें हैं, लेकिन इस किताब में एक याद मलयज के साथ बड़ी ही डरावनी होकर सामने आई है। यहां सिर्फ दर्द हैं, अनेक-अनेक तरह के दर्द। 

बीकानेर की सड़कों पर घूमने का चाव रखने वाले शाह के साथ अनिरुद्ध भोपाल में भी घूमते नजर आते हैं। वहां नवीन सागर हैं, मानवेंद्र बगरहट्टा हैं और इन चारों के साथ हुई एक घटना है। 
भोपाल के इस वाकये के बाद लगभग सन्नाटे में आए सभी जब अपने-अपने घर को चले जाते हैं, वहां मानवेंद्र का एक ही संवाद बहुत भारी पड़ता है, 'अफसोस की बात है, फिर तुम खुद को लेखक समझते हो'। उमट ने पूरी किताब में सिर्फ एक यही संवाद मानवेंद्र को दिया है, लेकिन जैसे एक अच्छा निर्देशक जानता है कि किससे कब क्या काम लेना है, उमट इसमें निष्णात हैं। पूरी किताब में सिर्फ इस एक संवाद के साथ मानवेंद्र अपने होने का दस्तावेजी स्वर है, जो किसी के कुछ होने पर सवाल उठाते हुए झिंझोड़ देता है।  
बीच-बीच में दीपचंद सांखला, श्रीलाल मोहता, श्रीगोपाल व्यास, शूभू पटवा, शीन काफ निजाम आदि से जुड़े अनेक संदर्भ इस संगत में है तो संवित सोमगिरि महाराज, हरीश भादाणी और नंदकिशोर आचार्य के साथ रमेश चंद्र शाह की जुगलबंदी की साक्ष्य भी बिखरे पड़े हैं। 
'शाह संगतÓ को पढऩा जितना सरल है, इसमें उतरकर बाहर निकलना उतना ही असंभव। पढ़ते हुए कभी-कभार पैन से रेखा खींचने का मैं अभ्यस्त इसे पढ़ते हुए एक जरूरी वस्तु के रूप में मार्कर को रखा, ताकि सूक्तियां-सी लगने वाली पंक्तियों को अलग कर सकूं। 
'घर लौटने पर दफ्तर पीछे छोड़ देना चाहिए' शाह की यह पंक्ति उन सभी लेखकों को, जो सरकारी नौकर भी हैं, के लिए संजीवनी है। सरकारी नौकर के लेखक बनने के बाद कार्यालयो में होने वाली दुर्घटनाओं पर एक पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है, जिसमें बीकानेर के लेखकों के संस्मरणों में बड़ी-बड़ी त्रासदियां होंगी। यहां तक कि वे यह स्वीकारते हुए भी नहीं हिचकिचाएंगे कि सरकारी नौकरी ने ही उन्हें बड़ा लेखक नहीं बनने दिया। अगर अनिरुद्ध उमट इनमें से अपवाद है तो यह शाह की इन पंक्तियों का कमाल है, 'जीविका का कोई संबंध रचना से नहीं है। माक्र्स लैम्ब से ले कर महान फर्नांन्दो पेसाआ तक कितने ही दृष्टांत हैं जिनकी रचनात्मक प्रतिभा को जीविका का घटियापन छू भी नहीं पाया। तुम्हारा एक दुश्मन सचमुच का है-शारीरिक स्वास्थ्य--उसे तुम काबू में कर लो, तो कैसी भी परिस्थिति तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती।' मुझे लगता है कि यही वह प्रस्थान-बिंदु है, जिसके बाद अनिरुद्ध उमट सरकारी तंत्र के त्रासदियों से काफी ऊपर उठ गये। एक बेहतरीन सर्जक के रूप में अनिरुद्ध उमट यहीं से पहचान पाते हुए दिखाई देते हैं। वरना क्या जरूरत होती है कि शाह उनकी एक-एक कविता पर बात करे। खुलकर सराहें और तीखी टिप्पणी करते हुए खारिज भी करे। बताने वाले मिलते कहां हैं। शाह की टिप्पणियां नये-उभरते आलोचकों के लिए आलोचना के नये औजार कि तरह है, उनका यह पत्र वस्तुत: नई आलोचना की राह बनाता-सा है। 
यही वह वजह है कि एक अपेक्षाकृत कम पढ़ा-लिखा अनिरुद्ध आज अपनी भाषा की रचनात्मकता से पहचाना जा सकता है। प्रोफेसरों के बीच वह अपनी तरह का अकेला लेखक होता है, जिसे नंदकिशोर आचार्य यह कहकर हौसले से और लबरेज कर देते हैं कि तुम तो उसी तरह लिखो जिस तरह तुम्हारी लिखने की शैली है...तुमसे हम उसी के अनुरूप अपेक्षा करते हैं।
और इस तरह एक अनिरुद्ध सिंह उमट का अनिरुद्ध उमट होने की रचना-प्रक्रिया हमारे सामने आती है। शाह की यह संगत इसलिए भी अनूठी है, क्योंकि यहां सिर्फ पत्र नहीं है। पत्रों का विवेचन भी नहीं है। भोपाल से बीकानेर तक का एक अदीठा सूत्र है। एक विशाल सेतु है, जो बहुत कुछ जोड़ता है। भोपाल से जुड़ी यादों के बीच एक याद को जिस तरह से उमट से संजोया है, बेमिसाल है। 
'उस दिन की भोपाल की उस सुबह की तरह ही विनोद कांबली फिर विनोद कांबली की तरह नहीं मिला।' अनिरुद्ध उमट की यह पंक्तियां जैसे नये युग का एक मुहावरा बन जाना चाहती हो। इस पूरी किताब को सिर्फ इसी रूप में समझा जा सकता है कि यह दो पीढिय़ों के बीच के अंतराल को पाटने का  दायित्वबोध से भरा गंभीर संवाद है, अगर इसके अलावा इसे समझाने का कोई भी यत्न किया जाए तो फिर टीका लिखी जा सकती है, लेकिन फिर भी लिखने वालों को लगेगा कि कुछ रह गया। कुछ बताने से बच गया है। 
एक पत्र में जैसे शाह लिखते हैं, 'है अभी कुछ और जो कहा नहीं गया।'
- हरीश बी.शर्मा

हरीश बी शर्मा

लेखक

हरीश बी शर्मा

पत्रकारिता का लंबा अनुभव। दैनिक भास्कर सहित लोकमत, निर्भय कलम, लॉयन एक्सप्रेस आदि अखबारों में बतौर पत्रकार कार्य किया। राजसूय के सलाहकार संपादक। राजसूय के संस्थापकों में से एक।

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