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आलोचना - उग तो आया है प्रेम: निरे क्रूर और वीभत्स दौर में अपनी परंपरा से जुड़े कवि का विनम्र स्वर

निरे क्रूर और वीभत्स दौर में अपनी परंपरा से जुड़े कवि का विनम्र स्वर
राजसूय
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राजसूय। इस उतावले दौर में जब कविताई-प्रेम यौन-क्रियाओं की तरकीबें तलाशता शैथिल्यता का शिकार होकर हांफ रहा है। प्रेम में चरम की खोज में भटकतों ने यौन-हिंसाओं का मार्ग अपनाकर इसे घमासान में तब्दील कर दिया है। घात-प्रतिघात, लेन-देन और हार-जीत के आंकड़ों से उलझी एक नई परिभाषा से परिष्कृत नये-प्रेम को ही वही प्रेम साबित करने की जिद सिर चढ़ चुकी है, जिसका वास्ता दिया जाता है तो लगता है प्रेम बहस बन गया है। 
यही नहीं इस शैथिल्यता के शिकार हुए कुछ तो स्वीकार भी चुके हैं कि यही है वह जिसे प्रेम कहा गया है तो कुछ अनमने से अस्वीकार के साथ यह कहते भी नहीं चूकते कि प्रेम है ही नहीं तो कुछ ने अभियान छेड़ दिया है कि गर यही प्रेम है तो क्या हर्ज है! 
लिहाजा, प्रेम के नाम कुछ मसखरियां भी शुरू हो गई है ताकि अगर कहीं प्रेम बचा भी है तो उसकी आत्मा का भी तर्पण करा दिया जाए। गोया प्रेम का फ्रेम बनाकर मालाएं चढ़ाई जा चुकी हैं। 
कुछ तो है ही, जैसे में कुछ तलाशते 'भागते चोर की लंगोटी ही ठीक...' जैसी व्यंजनाओं में रीझते-अमूझते समय में अगर कहीं जमीन से कुछ हरा फूटे। संभावनाएं पसार पाती है। प्रकाश फैलाती कुछ पत्तियां खिले तो बरबस की स्वर उभरता है, उगा है कुछ। कहीं यह प्रेम तो नहीं। और इसी समय कवि संजय आचार्य 'वरुण' कहते हैं 'उग तो आया है प्रेम'। यह टाइटल इस निरे क्रूर और वीभत्स हो रहे दौर में अपनी परंपरा से जुड़े कवि का वह विनम्र स्वर है, जिसमें वह किसी अभियान का हिस्सा नहीं। किसी विमर्श की ओट में उड़ाया गया बेहूदा मजाक नहीं, बल्कि चिंताओं से उपजी घोषणाओं से असहमत एक संकेत है--उग तो आया है प्रेम। इस काव्य-संग्रह में संजय आचार्य 'वरुण' ने अनुभूतियों का ऐसा सघन वन रचा है, जहां सिर्फ पे्रम है। इन कविताओं से निकलते हुए निकलना उतना ही मुश्किल है, जैसे प्रेम में पड़े हुए किसी एक का दूसरे के प्रभाव से निकल पाना। 
प्रेम को समझने के लिए इस कविता से परे जैसे जाने का ही मन नहीं करता। यह कविता एक उच्छवास है जैसे, 'बहुत खुश हो गई होगी/मां/ऊपर स्वर्ग में/जब/तुम्हारे छूते ही/फिर से/जी उठा था मैं' सही अर्थों में प्रेम का यही चरम है, जिसे रामकृष्ण परमहंस ने अपनी धर्मपत्नी शारदा में पाया था और उन्हें मां संबोधित किया था। प्रेम में नायिका का मां होना ही उसका प्रयोजन होता है, अभीष्ट होता है और जब संजय कहते हैं, 'रच तो दिया/एक रिश्ता/मैंने और तुमने/आओ!/अब जुटाएं/थोड़ी सी उम्र/नवजात/रिश्ते के लिए' ऐसा लगता है जैसे जीने के लिए यहीं सांसें मिली हैं बाकी तो अब तक था, वह तलाश थी। इसी तलाश में भटकता बादल बरसता है। भंवरा बगिया-बगिया मंडराता किसी एक फूल में गुम जाता है। परवाना परवाह नहीं करता जान की, फना हो जाता है और एक कवि फिर इस तरह से अभिव्यक्त होता है। 
'पिघलकर/बह जाने दो मुझे/अपने ऊपर/भिगो लेने दो/तुम्हारी यह काया/सोचता हूं/निराकार होकर समा जाऊं/तुम्हारे भीतर/मिटकर बनने का सुख/लेने दो ना' अंतिम पंक्ति का यह आग्रह भला किसे पसीजने से रोक सकता है। कौन होगा जो इस अंतिम-इच्छा जैसे प्रार्थना-स्वर को स्वीकार नहीं करे। ऐसे में कहां और किसे समय है कि इसमें नारी या पुरुष का स्वर तलाशे। किसी पड़ी है वाद और विमर्शों के तकाजे झंडे लेकर खड़ा होने की। जब प्रेम होता है तो फिर कहां रहती है अपने होने की सुध। सुधबुध। 
'उठाकर खुद को/दे दिया/ तुम्हारे हाथों में/अब मेरा/क्या करना है/तुम जानो'
यह अंदाज बेसाख्ता ही आता है और इसे समझने के लिए इसी तरंग में उतरना पड़ता है। कई बार नायक होना होता है तो कभी-कभी नायिका और अनेक बार वह जिसे न तो नायक और न नायिका की अनुभूतियों से समझा जा सकता है, एक ऐसा पंछी बनना होता है, जिससे जुड़ा शब्द आता है विहंगम। देखें यहां संजय 'वरुण' प्रेम से समृद्ध कितना सुंदर दृश्य रचते हैं
'सिर्फ एक बंदू/ भिगो गई/रेत का एक-एक कण/फिर उतर गई धरती के भीतर/बहुत गहरे तक/बादल/देखता रहा/धरती को/एकटक/भूल जो गया था/अपना होना'
प्रेम में अहंकार का क्या काम। 'प्रेम गली अति सांकड़ी' कहने वाले ने यूं ही तो नहीं कहा होगा यहां दो नहीं समाते हैं। एक हो जाते हैं। कविता का यह केनवास देखें कितना विस्तृत है, 'अरथाता रहा/बहुत दूर तक/तुम्हारा स्पर्श/छुआ नहीं था तुमने/लिख दिया था/मेरे भीतर/प्रेमÓ ऐसा स्पर्श जो छुअन न लगे, लगे प्रेम। तन और मन के बीच झूलते प्रेम को परिभाषित करते हुए आंगिक-सौंदर्य और यौनिक-आकांक्षाओं के बीच पेंडुलम बने हुओं के लिए छुअन को प्रेम में तब्दील करना संभव नहीं होगा, तब तक कहां उग आएगा प्रेम भला। इस प्रेम को जो पाए वह कह पाए कि 'तुम एक नींद सी/मैं तुम्हारे भीतर/घुला हुआ एक स्वप्न।'
ठीक इसी समय प्रेम एक और ठौर तलाशता है। प्रेम देह से परे। वासना से मुक्त कुछ इस तरह सामने आता है जैसे प्रेम का यही आखिरी पड़ाव है। कुछ भी आखिरी नहीं होने पर भी, जिसे आखिरी मानने के लिए अधिकतम एकमत है, वहीं प्रेम है। वही प्रेम है। 
'उसके हाथों से/तुम ही/छूते हो मुझे/बताया नहीं मैंने/पर जानता हूं ईश्वर/मेरे लिए तुम्हारे प्रेम को' यहीं आते-आते लगता है, जैसे यही प्रेम सिद्ध है। सिद्ध है जैसे प्रेम। ऐसी सिद्धि जो अनुभूति में भी स्वाभाविक है। 
'हर रात/सिरहाने रखकर सोता हूं/तुम्हारी स्मृतियां/कि जी सकूं/पुराने दिनों को/सपनों में ही सही/फिर एक बार/.../तुम्हारे एहसास भी/तुमसे कम नाजुक नही' और इसी वक्त कवि स्वीकार करता है, 'जब/देह से/अनुभूति बनकर/तुम/उतर आती हो/मेरी देह में/तब नहीं रह जाता/मैं भी/केवल एक देह' यह अदेही होना ही प्रेम की चुनौती है। अपने प्रेम में मां और ईश्वर की छवि देखते हुए पाने की अभ्यर्थना करने वाली नायिका या नायक को कहां सूझता होगा राग, लय और वह सब जो घूमते हैं प्रेम का मुखौटा पहने। 
क्योंकि इस संग्रह का कवि पुरुष है और हम अभिशप्त हैं लिखे हुए को कवि या कवयित्री का खुद-का भोगा हुआ मानने-समझने के लिए। इसलिए संभव है कि संजय की इन कविताओं में पुरुष की ओर से प्रणय-निवेदन लगे, लेकिन सही अर्थों में ये कविताएं लैंगिक-भेद से परे है। अगर उनके मन में प्रेम उगने को हो तो इसे पढ़ते हुए महिलाएं भी उतनी ही विगलित हो सकती हैं। यही कवि का वैशिष्टय है कि रचते हुए वह सभी का स्वर बनने की ताब रखता है। इस संग्रह के कवि में कहीं भी पुरुष होने का अहंकार नजर नहीं आता। अगर इन कविताओं के नीचे नाम में ध्वनित होने वाली पुरुष-वाची संज्ञा हटाकर कोई ऐसा नाम रख दिया जाए जो स्त्रीलिंग या पुल्लिंग के लिए समान रूप प्रयुक्त होती हो तो यह संग्रह हर मन का अंदाज-ए-बयां हो जाए। 
अपनी अनुभूतियों में भी इतना सहज होना किसी के भी कवि होने की पहली शर्त होती है, जिसे संजय आचार्य 'वरुण' न सिर्फ समझते हैं बल्कि बखूबी निभा ले जाते हैं। इसी को एकाकार होना कहते हैं, जिसे एक कविता में इस तरह निभाया गया है, 'डूबना तुझमें/उतरना खुद में/ जाने क्यों/तुझसे होकर/निकलता है/अपने आप तक/पहुंचने का रास्ता/कुछ गलत भी/नहीं लगती/तुम्हारे भीतर/स्वयं की तलाश'। 
यही है वस्तुत: प्रेम। स्वयं की तलाश। जाने क्यों हम इससे परे प्रेम को नये-नये नाम देते हुए आख्यान तो रचते हैं। प्रसंगों के चर्चे तो करते हैं, लेकिन पा नहीं सकते, जो होता है प्रेम। स्मृतियों में, प्रतीक्षा में, परवाह में पनपते प्रेम को देखना हो तो 'उग तो आया है प्रेम' मे रमना होगा, कुछ नया मिलेगा बल्कि वह मिलेगा जिसकी तलाश थी। लगेगा जैसे इसी का इंतजार था, 'प्रतीक्षा/सींचती जो है/प्रेम को' कहते हुए कवि आपाधापी में जी रहों को एक सूत्र थमा जाते हैं। प्रेम के लिए प्रतीक्षा का, धैर्य का वह सूत्र जो मिलता जो जीवन का धन्य बना देता है। लोक में प्रचलित तुलसीदास जी से जुड़े एक प्रसंग में ऐसा ही सूत्र मिलता है। अपनी धर्मपत्नी से मिलने की उत्कंठा में तुलसीदासजी को न तो उफनती नदी का खतरा समझ आया और न तैरती लाश दिखी और तो और वे रत्नावली के कक्ष तक पहुंचने के लिए जिस रस्सी के सहारे चढ़े, वह भी रस्सी नहीं होकर सर्प था। रत्नावली ने यह देखकर सबसे पहले जो कहा उस वाक्य से ही तुलसी का जीवन सार्थक हो गया। यही है प्रेम का प्रेम होना। तुलसी कामांध थे ऊपर से पुरुषमद, नाराज हो सकते थे, लेकिन स्वीकारा कि वे गलत थे, क्योंकि वे प्रेम के वशीभूत थे और निकल पड़े। ले ली नई राह...
प्रेम ऐसे ही सूत्र देता है।  प्रेम में सफलता नहीं सार्थकता होती है। प्रेम तन मय नहीं, तन्मय करता है। विभोर करता है। संजय 'वरुण' का यह कृतित्व प्रेम का एक ऐसा अदभुत प्राकट्य है, जो नई पीढ़ी को प्रेम के मौलिक रंग से अवगत करवाने की चेष्टा में सामने आया है। 
कवि सम्मेलनों के ख्यातनाम कवि संजय 'वरुण' वस्तुत: प्रेम और दर्शन की कविताएं करते हुए यहां तक पहुंचे हैं, लेकिन नई कविता के फे्रम में यह संग्रह उनके कृतित्व का वह पक्ष है, जो उन्हें राष्ट्रीय स्तर के कवि की श्रेणी नहीं दिए जाने पर आपत्ति भी है। इस संग्रह के साथ संजय आचार्य 'वरुण' नई पीढ़ी की राष्ट्रीय कविता का प्रतिनिधित्व करते हुए नजर आते हैं, जिसकी न सिर्फ समय को बल्कि कविता को भी जरूरत है। 
हमारे इधर एक बड़ी समस्या है कि अभी तक अग्रज भी अपने आपको सिद्ध करने में सक्षम नहीं हुए हैं। ऐसे में अपेक्षाकृत युवाओं पर नजर जाए भी तो कैसे, लेकिन मेरा यह विश्वास है कि संजय इन कविताओं की वजह से अपनी पहचान बनाने में सक्षम होंगे। 
'लो सम्हालो/ मैंने इकट्ठा किये हैं/रोशनी के/कुछ टुकड़े।/रख देना ले जाकर इन्हें/अपने घर के/अंधकार से भरे/उस एक कक्ष में/जहां/दिखाई नहीं देता है-प्रेम/आत्माओं से विहीन/कुछ शरीरों को।/अब शायद देख पाएं वे-/तुम्हारे लिए मेेरे/और मेरे लिए/तुम्हारे प्रेम को।' 
यह कहते हुए प्रेम को समझने के लिए रोशनी की जरूरत जताने वाले संजय आचार्य 'वरुण' उस आत्म-तत्त्व से जुडऩे की बात करते हैं, जो प्रेम का पराक्रम है। इस पूरे संग्रह में आश्चर्यजनक रूप से शृंगार नहीं है, लेकिन प्रेम है। अभिसार नहीं है, लेकिन प्रेम है। रूठने-मनाने के किस्से नहीं हैं, लेकिन प्रेम है। शिकायतें नहीं, शिकवे, दुआ नहीं बद्दुआएं नहीं, लेकिन प्रेम है। नायक नहीं, नायिका नहीं, लेकिन प्रेम है। प्रेम का यह अगोचर-सा अहसास  अनूभूृतियों के ताप से संप्रेरित होकर जिस चरम की ओर ले जाने के लिए उद्यत करता है, वहां तक जाने के लिए सहमत होना भी बहुतेरों के लिए संभव नहीं। यहीं आते-आते कविता संग्रह का टाइटल अपनी सार्थकता की घोषणा करते हुए कहता है-उग तो आया है प्रेम, बचा सकते हो तो बचा लो वरना पौधे का कितना जीवन?
इस काव्यसंग्रह के प्रकाशक है अरुण प्रकाशन और मूल्य रखा गया है 180 रुपये। 
- हरीश बी.शर्मा

हरीश बी शर्मा

लेखक

हरीश बी शर्मा

पत्रकारिता का लंबा अनुभव। दैनिक भास्कर सहित लोकमत, निर्भय कलम, लॉयन एक्सप्रेस आदि अखबारों में बतौर पत्रकार कार्य किया। राजसूय के सलाहकार संपादक। राजसूय के संस्थापकों में से एक।

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