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आलोचना - आं दिनां इयां लखावै :: तेवर की परिपक्वता और जीवन से लिए सबक का तलपट

तेवर की परिपक्वता और जीवन से लिए सबक का तलपट
राजसूय
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राजसूय। राजस्थानी में लखाव शब्द की व्यंजना मुहावरेदार है। इस शब्द को समझने के लिए अलख को समझना होगा। अलख को समझे बगैर यह शब्द अबूझा-सा प्रतीत होगा। अगर कोई समझेगा भी तो लाख से समझने  जैसी दुर्घटना का शिकार होगा। बल्कि लख शब्द तो अलख से पहले का है। पहले जब बहुत सारी चीजों को लख लिया गया यानी जान लिया गया तो फिर जो जानने से रह गया, उसे अलख कहा गया। 
हमारे इधर सामान्य बातचीत में भी अगर कोई असामान्य, अशिष्ट या अटपटी बात करता है तो उसे पूछ भी लिया जाता है लखाव ही पड़ै कोयनी क्या? यानी समझ में नहीं आ रही है क्या कि तू किससे, क्या या कैसी बात कर रहा है। मने यह कि जिसे लखाव नहीं पड़ता, वह इंसान ही कहां। और जो कहे कि आं दिनां इयां लखावै, वा कवि से कम क्या हो सकता है। अगर उसने अपने लखाव को व्यक्त कर दिया। 
वरिष्ठ रचनाकार नवनीत पांडे का 'आं दिनां इयां लखावै' राजस्थानी का नया कविता संग्रह है, जो उनके अब तक रहे तेवर की परिपक्वता और जीवन से लिए सबक का तलपट है। 
एक रचनाकार यहां तक आते-आते और कुछ नहीं तो यह तो पहचान ही जाता है कि उसे हाथे-बाथे क्या है। बावजूद इसके वह कविता के माध्यम से ही अपनी बात कहना चाहता है तो यह न सिर्फ कविता की जीत है बल्कि कवि की हूंस की भी जिद है कि उसने अपने हथियार नहीं बदले हैं। 
इस पूरे संग्रह की कविताएं लखाव की कविता है। जो भले ही आम आदमी को यथार्थ का आइना दिखाते हुए कईं बार यह भी समझाती है कि उसके हाथ में ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन यह पराजय या निराशा की कविताएं नहीं होकर  परिस्थितयों पर विचार करने के लिए उकसाने वाली कविताएं हैं। कई बार कहते हैं कि तुमसे ना हो पाएगा, तो सुनने वाले में ज्यादा जोश जाग जाता है। प्रकारांतर से कहें तो नवनीत पांडे के अंदर बैठा कवि इस समाज को यही कह रहा है कि कर लो कुछ, देखो मैं भी तो कविता कर रहा हूं। 
अगर लखाव कवि की साख है तो हर इंसान को भी अपने वजूद का लखाव होना चाहिए। और उसे ठीक उसी तरह अन्याय, अनाचार और अत्याचार करने वाले को कहना चाहिए, 'खबरदार!/पैली न्हा धो/फेर म्हारै नैड़ो आइजै/थूं भींटेज्योड़ो है/म्हांसू अळघो रैइजै' (म्हांसू अळघो रैइजै-47) 
नवनीत पांडे की यह कविता सामान्य अस्पृश्यता या छूआछूट का नरेटिव नहीं बल्कि उस आम आदमी की हुंकार है, जो भ्रष्ट लोगों से कहता है मुझसे दूर रह। 
कहन का साधारणीकरण करने वाले इसे समझने की भूल करते हुए जो जितना अभिव्यक्त हुआ, उसी के इर्दगिर्द घूमते नजर आएंगे, लेकिन अगर हम यह जानना चाहेंगे कि क्या इस कविता में कवि कुछ और भी कहना चाहता है तो नवनीत पांडे बहुत ही सरलता से संप्रेषित भी होंगे। 
सिर्फ यही नहीं, नवनीत पांडे के इस संग्रह में ऐसी कईं कविताएं हैं, जो व्यंजना और गहराई लिए है बशर्ते की उन कविताओं को वैसी ही दृष्टि के साथ पढ़ा भी जाए। अगर इन कविताओं को सामान्य दृष्टि के साथ पढ़ा जाएगा तो इसमें प्रतिरोध नजर आएगा जो अंतत: अवसाद के गहरे सागर में समा जाता है जबकि ये कविताएं जैसा कि टाइटल 'आं दिनां इयां लखावै' से ही स्पष्ट कि कवि वह बता रहा है कि इन दिनों ऐसा लग रहा है। लग रहा है यानी महसूस हो रहा है। लग रहा है यानी साल रहा है। लग रहा है यानी उसे अखर रहा है। लग रहा है यानी कुछ दरक रहा है। वस्तुत: ये कविताएं खत्म  हो रही संवेदनाओं का अलार्म है। बेशक, अलार्म कर्कश होता है। कविताओं का स्वर भी कर्कश है। पहला अलार्म सुनने के बाद भी अगर आप नहीं उठते हैं तो वह फिर से आपको जगाने के लिए बजता है बल्कि समय पर नहीं जागने वाले को यह अहसास भी कराता है कि उसने क्या गंवा दिया है। 
नवनीत पांडे कि ये कविताएं अपने अधिकार और कत्र्तव्य से विमुख हुए समाज को यह अहसास कराती है कि तुमने क्या-क्या खो दिया है और इस उदासीनता के चलते कैसे-कैसे नाजोगे लोगों ने सत्ताएं प्राप्त कर ली है। 
पांडे की कविताओं में सत्ता का अर्थ कोई एक नहीं है। सचिन पायलट से लेकर साहित्य में होने वाले डेब्यू तक को वे अपनी कविता में अरथाते हैं। उनकी अेक कविता 'अेनकाउंटर' प्रतिभाओं की अकाल मौत पर सखरी-टीप है। राजस्थानी में 'उतर भीखा म्हारी बारी' एक कहावत है, जिसका अर्थ है कि आपस में ही सबकुछ पा लेना। नपोटिज्म से इसे खूब समझा जा सकता है। इस संग्रह में इसी भीखा पर पूरी सीरीज लिखी हुई है। रेत पर भी कुछ कविताएं हैं। कुछ कविताओं पर कोरोना-काल का प्रभाव भी नजर आता है। कृति का टाइटल जिस कविता के शीर्षक से रखा गया है, उसमें भी कोरोना का असर है।
एक कविता है - डांई। इस संग्रह की यह प्रतिनिधि कविता है। लगभग सभी कविताओं का निचोड़। इस कविता में वे कहते हैं, 'थारो अेक ई खेल/ म्हनै ढब सूं/खेलणो नीं आवै /इण वजै / हर गड़कै/ डांई म्हा में ईज आवै'। इस संग्रह में यह कविता कभी तो अवसर मिलेगा जैसे सपने संजोये लोगों का  इकरारनामा है। सही कहूं तो निरीह व्यक्ति के ये सबक हैं, व्यथा है, पीड़ा है। 
96 पृष्ठों के इस संग्रह में 77 कविताएं हैं, जिसमें समाज में हुए बदलावों के असहनीय पक्षों का उद्घाटन करते हुए कवि ने जो चित्र और चरित्र खड़े किए हैं, अधिकतर प्रतीकात्मक हैं, लेकिन समझ में आते हैं। उघाड़े हुए सच को दिखाने का यह हुनर नवनीत पांडे को प्रयोगवादी कविता से दूर कटु यथार्थ से साक्षात्कार का अवसर देता है। अधिकतर कविताएं सीधी, सरल और स्वाभाविक प्रतिक्रिया वाली है, जिसे प्रस्तुत करने में कवि ने शिल्प पर ध्यान नहीं दिया। कुछ-कुछ जगहों पर तुकबंदी का आग्रह जान पड़ता है, लेकिन कविताएं अतुकांत ही हैं।  
- हरीश बी.शर्मा

हरीश बी शर्मा

लेखक

हरीश बी शर्मा

पत्रकारिता का लंबा अनुभव। दैनिक भास्कर सहित लोकमत, निर्भय कलम, लॉयन एक्सप्रेस आदि अखबारों में बतौर पत्रकार कार्य किया। राजसूय के सलाहकार संपादक। राजसूय के संस्थापकों में से एक।

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