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सिजोफ्रेनिक बोले तो सत्य के मेरे साथ प्रयोग

आलोचना - सिजोफ्रेनिक

सिजोफ्रेनिक बोले तो सत्य के मेरे साथ प्रयोग
राजसूय
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राजसूय। विष्णुयश अपनी पत्नी अपूर्वा के साथ एक सामान्य जिंदगी बसर कर रहा है, लेकिन अचानक से उसके सोचने-समझने और व्यक्त करने के तरीके से समाज असहत होने लगता है तो दूसरी ओर उसे ऐसा लगता है कि उसे जो महसूस हो रहा है, वही सही है। हालांकि, विष्णुयश इस अभियान का पुरोधा बनने की ललक लिए नहीं है कि उससे सहमत हुआ जाए, लेकिन वह एक ऐसा किरदार जरूर है, जिसे लगता है कि अगर वह खुद को गांधी समझता है तो उसे गांधी बनने दिया जाए। अगर वह अपने अंदर शंबूक या पतरस की स्मृतियों को जीना चाहता है तो उसे जीने दिया जाए। लेकिन समाज उसे बीमार मानसिकता का एक ऐसा किरदार बना डालता है, जो आखिरकार साजिशों से हार जाता है। कमाए हुए चुनिंदा लोगों का साथ गंवाए हुए अपनों की भरपाई नहीं कर पाता, लेकिन वह अनंत की यात्रा के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए उद्यत होता है। एक नाटकीय दृश्य में उसका शक्तिपात होता है और एक नई चैतन्यधारा से ओतप्रोत हुआ वह अनहदनाद की खोज में निकल पड़ता है। 
यह है कथाकार प्रमोद कुमार शर्मा के उपन्यास 'सिजोफ्रेनिक' का लब्बोलुआब।  इस उपन्यास से निकलते हुए मुझे बार-बार यह लगा कि यह कल्पना और यथार्थ के कोलाज से निर्मित एक आत्मकथ्य हो सकता है, लेकिन यह उपन्यास नहीं। क्योंकि उपन्यास का पात्र विष्णुयश बहुत बार लेखक प्रमोदकुमार शर्मा की काया में प्रवेश करता और कई बार बिल्कुट सटते हुए निकलता प्रतीत होता है। कई बार छाया की तरह छोटा, बड़ा और लंबोतरा नजर आता है, लेकिन यह मैं इसलिए कह सकता हूं कि उपन्यास के लेखक से मेरा पुराना परिचय है। 
अगर इस तरह समझने की छूट मैं लेता हूं तो यह अतिक्रमण होगा। हर पाठक  को यह धरम पल्ले रखना चाहिये कि जब तक रचनाकार यह घोषणा नहीं करे कि यह कहानी उसकी अपनी है, उसे उस रचनाकार के जीवन से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। भले ही वह रचनाकार उसके कितना ही पास हो या कि उससे कितना ही दूर। 

अजएव, मुझे भी इस उपन्यास को एक कथा की तरह की पढऩा-गुनना चाहिए ताकि मैं अपने पाठक-धर्म का निर्वहन कर सकूं। और इस तरह जब मैं इसे पढ़ता हूं तो आकाशवाणी का उद्घोषक विष्णुयश की यह कहानी अपने अंदर कुछ क्रांतिकारी करने की आग धधकाए बैठे एक ऐसे किरदार की कहानी है, जिसके लिए सिगमंड फ्रायड ने कभी घोषणा की थी कि व्यक्ति के अंदर सकारात्मकता और नकारात्मकता समान रूप से विद्यमान रहती है। अगर वह अपनी सकारात्मक शक्तियों को समझते हुए तदनुरूप काम कर ले तो ठीक वरना उसे नकारात्मक होने से कोई नहीं रोक सकता। यही विष्णुयश की त्रासदी है। 
पूरे कथानक में विष्णुयश यह साबित करने की कोशिश करता है कि उसे कुछ विद्युत तरंगों के माध्यम से संदेश मिल रहे हैं। कुछ है तो पराभौतिक है, लेकिन उसे समझा नहीं जाता। सहानुभूतिवश उससे प्रभावित लोग कुछ देर के लिए उसकी सोच पर ठहरते हैं, लेकिन फिर अपना माथा झटककर चलते बनते हैं। यहां तक कि विष्णुयश की पत्नी भी एक आउटिंग के दौरान कुछ देर के लिए प्रभावित होती है, लेकिन यह प्रभाव देर तक दूर तक कायम नहीं रहता। 
इस कथ्य की सबसे बड़ी यही त्रासदी है कि उपन्यास का नायक विष्णुयश यह कन्वे नहीं कर पाता और धीरे-धीरे उन रास्तों पर चल निकलता है, जहां लिजलिजापन है, अपमान है, ग्लानि है और जैसा कि ऐसे समय में ऐसा ही होता है, हम अपने आसपास को गुनाहगार मानना शुरू कर देते हैं। विष्णुयश भी मानने लगता है। प्रतिक्रिया ही कहें, उसे भी अपने लोग गलत मानने लगते हैं। 
इस तरह मैं इसे आत्मकथा मानने से इंकार करता हूं। भले ही इसमें अनेक सूत्र लेखक और नायक से गुंथे हों। 

फिर मैं पढ़ते हुए यह सोचता हूं कि यह एक बिखरी हुई पटकथा का पहला ड्राफ्ट भी हो सकता है। क्योंकि यहां इतने शानदार और बेबाक दृश्य खींचे गये हैं कि अगर इनका सुयोग्य निर्देशक फिल्मांकन करे तो फिल्म देखता दर्शक अपनी कुर्सी से नहीं हिल सके। लेखक ने नायक के अपमान के ऐसे-ऐसे दृश्य रचे हैं कि दर्शक इस कौतुहल में आगे बढ़ते हैं कि आगे क्या होगा। एक दृश्य में तो नायक पर सहनायिका से भी गई-बीती एक किरदार विष्णुयश के चेहरे पर थूकती है। यह दृश्य योजना अंदर तक हिला देने वाली है, लेकिन सिर्फ यही एक नहीं। अनेक दृश्य है। तस्करों से भयाक्रांत विष्णुयश का ट्रांसफर प्रकरण, इससे पहले किसी लड़की के प्रेम को चंगुल मानते हुए निकलने के यत्न में विष्णु यश, यात्राओं में विष्णुयश, उदयगिरी की सभा में विद्रोही विष्णुयश...अपूर्वा के साथ घूमते हुए रोमांटिक होने का दृश्य...कार्यक्रम संचालन करने से पहले शिथिल पड़ जाने की घटना और अंतिम दृश्य से कुछ पहले वीडियो कॉल करते हुए अपनी पत्नी अपूर्वा द्वारा पकड़े जाने के बाद विष्णुयश की स्थिति...ऐसे अनेक दृश्य लेखक ने रचे हैं, जो इस समूचे उपन्यास से पटकथा बनने का आग्रह करते हैं। इस उपन्यास को पटकथा बनाने के लिए अगर कोई निर्देशक तैयार हो तो संभव है एक नया वितान खुले। प्रमोद कुमार शर्मा के लेखक को एक नया आयाम मिले। 

लेकिन पटकथा यानी प्रमोद शर्मा की यह कहानी वस्तुत: अतृप्त-आत्मा है, जिसे लोकेशन चाहिये, कैमरे चाहिए। बड़ा पर्दा चाहिये। पोस्टर चाहिए। दर्शक चाहिए जो बरसों की साधना के बाद भी प्रमोद कुमार शर्मा नहीं जुटा पाए हैं, इसलिए एक उपन्यास समाज को अर्पित करते हैं, लेकिन यहां फिर सवाल खड़ा होता है कि क्या इसे उपन्यास भी कहा जाना चाहिए या कि एक लंबी कहानी, क्योंकि यह कथानक उपन्यास की शर्तों को पूरा नहीं करता। एक धार चलता है और खत्म हो जाता है, उपन्यास अपने केंद्र को बार-बार छोड़ता है, लेकिन फिर केंद्र के निकट आकर थिरकना शुरू कर देता है। उपन्यास विस्तार करते हुए अनेक-अनेक प्रकार से अपने केंद्र को छूता है। उपन्यास की व्यंजना अगर कहानी से अलग नहीं होती तो क्यों ही कोई कहानी और उपन्यास को अलग-अलग विधा नाम देता। 

फिर मैं यह सोचता हूं कि क्या हम और हम ही क्यों, सुना है सारी दुनिया में ऐसा ही हो रहा है, तो क्यों नहीं हम सभी ब्रह्मांड के ज्ञान साहित्य रसिक इस बात पर गौर करना ही बंद कर दें कि लिखने वाले ने क्या लिखा है। पहले पढ़ें और तय करें कि इसे विधागत रूप से क्या कहना चाहिए। 
बोले तो उसने चाहे अपनी रचना पर उपन्यास लिखा हो चाहे कहानी या के संस्मरण या रिपोर्ताज, कविता या गजल। हम उसे अपने तरीके से पढ़ें और फिर समझें कि यह क्या है। हो सकता है कि रचनाकार को जो बात समझ में ही नहीं आए और पढऩे वाला बता दे कि यह रचना फलां खांचे में फिट है।  अगर ऐसा हो तो यह सवाल ही खड़ा नहीं हो कि जिसपर उपन्यास लिखा है, वह उपन्यास है या नहीं। कविता के पैमानों पर कविता खरी उतरती है या नहीं। 
खैर...
इस तरह मैं इस रचना को एक लंबी कहानी, जो कथा की तरह चलती है, रिसीव करता हूं। यह कथा सुनाने वाले चूंकि प्रमोद कुमार शर्मा हैं, तो कई बार यह कथा उनके जीवनानुभवों से स्पर्श करते हुए निकलती-सी प्रतीत होती है। बीकानेर की सीमाओं से बाहर यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसे यह अहसास है कि उसके इस सृष्टि में आने का प्रयोजन सामान्य नहीं है। यहां तक कि उसे लगने लगा है कि वह गांधी ही है। इस पूरे उपन्यास का यह केंद्रीय भाव है। इस कहानी में रॉ का दफ्तर आता है। एक चीफ का चेहरा उभरता है। हनुमानगढ़ में अपने घर की याद आती है, जो दुर्गा कॉलोनी की बजाय गांधी नगर में होता है। उसे बार-बार लगता है कि इसकी कोई वजह है कि वह गांधी नगर में रहा। उसके घर के सामने रॉ का दफ्तर रहा। 
इस तरह की बातों से उपन्यासकार पाठकों को जोड़े रखता है। कभी उसे लगता है कि वह शंबूक है तो कभी वह जीसस के शिष्य पतरस को अपने अंदर महसूस करता है। 
इस तरह इस कथानक में यह मूल भाव प्रकट होता है कि इस सृष्टि में आने वाले हर व्यक्ति को लगता है, जैसे वह अपने पूर्ववर्ती का विस्तार है। उसके छोड़े हुए काम को पूरा करना है। विष्णुयश को लगता है, जैसे वह गांधी है। गांधी के छोड़े हुए कार्यों को पूरा करना है, लेकिन वह बजाय देश को असली आजादी दिलाने वाले गांधी के मकसद के। बजाय अहिंसक समाज की स्थापना के, कुछ-कुछ 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' वाले गांधी के विवादास्पद रूप से प्रभावित नजर आता है। बहुत ही धुंधला और अटपटा ही सही, लेकिन विष्णयश को अपनी स्वीकारोक्तियों के साथ गांधी के साथ खड़ा करने की कोशिश की गई है, जो संभव हो भी सकती थी, लेकिन उपन्यास का केनवास छोटा कर दिए जाने की वजह से विष्णयश का किरदार वह विस्तार नहीं ले पाता, जिसकी संभावना प्रारंभ में नजर आती है। फिर भले ही वह विष्णुयश आग लगा देने वाले संपादकियों का 'घोस्ट राइटर' हो चाहे, 'पालीवालों का झोरावा' द्वारा एक ही रात में पूरा गांव छोड़ जाने की कहानी को सामंतों की मर्जी के बगैर भी रिकार्ड करने वाला एक सरकारी मुलाजिम या तस्करों के नेटवर्क का खुलासा करने वाला अंदर ही अंदर दहक रहा एक पत्रकार, जो पता नहीं कैसे भांग की लत में गाफिल हुआ समाज से कटते-कटते आखिरकार बहिष्कृत हो जाता है। जेल जाता है, जेल से निकलकर फिर अपनी पत्नी से मिलने जाता है तो उसके मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया जाता है। 

पूरा कथानक जिस संभावना के साथ खुलता है और जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ते हुए पाठकों का कौतुहल बढ़ाती है, रोचकता पैदा करती है, लेकिन अचानक से कहानी घूमकर विष्णुयश के सिजोफ्रेनिक होने और नहीं होने के विमर्श के बीच ठहर जाती है। ठीक उसी तरह जैसे सिग्नल मिलने की प्रतीक्षा में स्टेशन से थोड़ी दूर आकर खड़ी हुई सुपर-फास्ट रेल गाड़ी। 
और इस अप्रत्याशित रुकने का असर स्टेशन पर जाने के लिए तैयार गाड़ी पर नहीं पड़ता और वह निकल जाती है। नुकसान होता है, उस यात्री का, जिसे उस गाड़ी में जाना था। आगे की यात्रा करनी थी। यहीं से कहानी में गैप शुरू होता है,जो बढ़ते हुए बड़ा फासला बन जाता है। इस उपन्यास में यह पाठक का नुकसान है। 
इस तरह इस उपन्यास के तत्त्व बिखर जाते हैं। यह उपन्यास जब कंसीव हुआ होगा तो बड़ी संभावनाओं के साथ हुआ होगा। जहां बदलाव की क्रांति की एक धधकती चिंगारी से निकलने वाले एक मसीहा द्वारा आमूल-चूल परिवर्तन की दास्तान होनी होगी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है। समाज इस विष्णुयश को सिजोफ्रेनिक बताकर लेखक को भी दिशाभ्रम में डाल देता है। 
नायक का अतिशय भय, अतिरंजित विनम्रता, सरकारीकरण की प्रक्रिया, लेखक की आत्ममुग्धता और सुहानुभूति के बीच नायक द्वारा खुद ही को विगलित करने के तामझाम इस उपन्यास के पाठक को कई बार बेचैन कर छोड़ते हैं, लेकिन पाठक को लगता है कि कुछ खास होगा। कुछ बड़ा होगा या कि कुछ नया होगा। इस खोज में पन्ने पलटते रहने के अलावा पाठक के पास बचता ही नहीं है कुछ। बहुत अधिक मामलों में यह खोज प्रमोद कुमार शर्मा के लेखकीय कृतित्त्व की है। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती लेखन से यह भरोसा जमवाया है कि वे कुछ अलग और बेहतर कहने का माद्दा रखते हैं। फिर यह उपन्यास भी अपने इसी तरह के प्रयोगों के लिए बांधता है। घटनाओं का घमासान, देश, काल और परिस्थितियां सहित पात्रों का नाम पाठकों के मन में जिज्ञासाएं पैदा करता है। 

हालांकि, इस कहानी में बिखरे पड़े सूत्रों से यह समझना बेहद आसान है कि आध्यात्मिक और धार्मिक आख्यानों का ज्ञान रखने वाले प्रमोद कुमार शर्मा अपने नायक को विष्णुयश नाम क्यों देते हैं। इस नाम का सीधा-सा अर्थ अवतारों की परंपरा में कलियुग में अवतार लेने वाले कल्कि से है। ऐसा जिक्र आता है कि विष्णुयश उस कल्कि के पिता का नाम होगा। कुछ ऐसे ही पौराणिक और ऐतिहासिक संदर्भों के इशारे शंबूक और पतरस के रूप में भी सामने आते हैं। महात्मा गांधी भी कई बार नायक के जेहन में उभरते रहते हैं। 
संभव है कि यह संयोग हो, लेकिन उपन्यासकार ने अपने नायक का नाम सामान्य से अलग रखा है, एक बार इधर मुड़कर सोचने के लिए मजबूर होना लाजिमी है। नायक की पत्नी का नाम अपूर्वा है, जो भी एक ध्वनि है। पत्नी का चरित्र-चित्रण अनेक जगहों पर विष्णुयश पर भारी पड़ता नजर आया है। भले ही उसे स्क्रीन पर आने के अवसर कम मिले हों, लेकिन अपूर्वा ने अंत तक अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करवाई है। 

नायक को उन लोगों से शिकायत है, जो सुनी-सुनाई बातों को आगे बढ़ाते हुए समाज में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते हैं। फिर भले ही वे धर्मगुरु हों चाहे पिता तुल्य ससुर। वही जैसलमेर से आए एक एमएलए के प्रति नायक अहसानमंद है, जो कोई रिश्ता नहंी होने पर भी साथ निभाता है। उपन्यास की शुरुआत टिहरी गढ़वाल की वादियों से होती है, जहां नायक बतौर कैदी जेल से सजा काटकर आया है। उसे मुरलीधर बाबा की तलाश है। 
आशंकाओं में जी रहे। रचनात्मक व्यक्ति के लीलने की कहानी के रूप में आगे बढ़ रही इस कहानी का अंत फटाफट में कर दिया गया है। बीकानेर में हुए एक पांच हजारी साहित्य उत्सव का जिक्र लाकर वहां से एक रुचि चावला नाम की लड़की की एंट्री करवाते हुए कहानी को समेटने का प्रयास किया गया है ताकि नायक को जेल हो और वह एक नये मार्ग के अन्वेषी के रूप में आगे बढ़े। उपन्यास अंत में कागजी शरीर का यह चोला की तर्ज पर गुरु से मिले ज्ञान से विभोर हुए शिष्य विष्णुयश पर खत्म होता है। 

कहानी के प्रारंभ में पाठकों को बांधने में रहस्य रचे गए हैं। नायक की जेल से वापसी और फिर टिहरी गढ़वाल के दृश्य एक सिजोफ्रेनिक से कैसे जुड़ेंगे, पाठकों के लिए यह कौतुहल का विषय होता है, लेकिन कुछ ही दूरी के बाद कथानक सहज गति से आगे बढ़ता है। प्रमोद कुमार शर्मा ने बड़ी तादाद में रेडियो नाटक लिखें हैं, ऐसे में उनमें शब्द-चित्र खड़े करने की कला है। यहां भी जगह-जगह ऐसे शब्द-चित्र है। बल्कि छोटे-छोटे वाक्य भी, जो प्रभावित करते हैं। उनसठ शब्द-चित्रों में फैला हुआ यह उपन्यास और बेहतर और संभानाओं से भरा हो सकता था, लेकिन एक तो वर्तनीगत अशुद्धिओं की भरमार और दूसरा फटाफट समेटने की जिद से एक बेहतरीन आख्यान को अधूरा छूट गया। मुझे लगता है कि ऐसा करने के पीछे आकाशवाणी का समय के साथ भागने की प्रवृत्ति रही होगी, जिसमें तय समय-सीमा में करना होता है। यह उपन्यास न सिर्फ और अधिक विस्तार चाहता है बल्कि कम से कम उतनी गहराई तो चाहता ही था, जितनी उपन्यासकार ने घोषणा की। 
इस उपन्यास को राष्ट्रीय कवि चौपाल प्रकाशन ने छापा है। 251 रुपये के इस उपन्यास का आवरण यशस्त्री डिजाइनर गौरीशंकर आचार्य ने बनाया है, जो उपन्यास के नायक विष्णुयश की प्रेरणामओं का प्रतीक है। 
-हरीश बी.शर्मा 

हरीश बी शर्मा

लेखक

हरीश बी शर्मा

पत्रकारिता का लंबा अनुभव। दैनिक भास्कर सहित लोकमत, निर्भय कलम, लॉयन एक्सप्रेस आदि अखबारों में बतौर पत्रकार कार्य किया। राजसूय के सलाहकार संपादक। राजसूय के संस्थापकों में से एक।

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