आलोचना
आलोचना - भीड़ में अकेले: कौतुहल, उत्सुकता और रोमांच के साथ समय के लिजलिजे पलों से भी साक्षात्कार
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राजसूय। 'भीड़ में अकेले' राजस्थान की नई हिंदी कहानी का एक ऐसा प्रतिनिधि स्वर है, जिसे पढ़े बगैर आप नये बन रहे राजस्थान के कथा-तेवर को आधा-अधूरा ही जान पाएंगे। क्योंकि किसी को नया कह देना एक जुमला या फतवा हो सकता है, लेकिन नया क्या बताना बड़ा मुश्किल है। इस कहानी संग्रह में समाज की घटनाओं और प्रवृत्तियों नये तरीके से देखने की दृष्टि से संपन्न माधव राठौड़ ने वह रचा है, जो कौतुहल, उत्सुकता और रोमांच तो पैदा करता ही है, समय के लिजलिजे पलों को भी प्रकटाने में भी संकोच नहीं करता।
यही वजह है डायरी विधा में अपना हुनर आजमा चुके माधव राठौड़ की अगर एक कहानी भी आपने पढ़ ली तो आप इस संग्रह को पूरा पढ़े बिना नहीं रह पाएंगे। यह कहानी संग्रह दरअसल उत्तर आधुनिक शैली का एक उपन्यास भी है, जिसमें कहीं कोई रिलेवेंसी नहीं होते हुए भी अंतर्कथाएं आपस में जुड़ती रहती हैं और कथानक आगे बढ़ता रहता है।
कथाकार माधव राठौड़ इस उपन्यास के नायक हैं, जो किसी सधे हुए बातपोश की तरह न सिर्फ कहन को दिलचस्प बनाते हैं बल्कि अगर पाठक छलांग लगाते हुए आगे बढऩा चाहे तो उसे यह अफसोस करवाकर छोड़ते हैं कि आखिर उसने ऐसा चाहा तो चाहा क्यों। अगर जरा-सा हौसला दिखाते तो यह संग्रह एक उपन्यास के रूप में भी लाया जा सकता है, जो कि एक कहानी में वे स्वीकार करते हैं, 'बतौर लेखक उसकी हमेशा से इच्छा रही कि फुरसत के दिन मिलेंगे तो एक उपन्यास जरूर लिखेगा'।
राजस्थान के नये कथाकारों में माधव राठौड़ को मैं ऐसे कथाकार के रूप में देख रहा हूं, जिन्होंने कंटेंट के साथ जिस तरह का ट्रीटमेंट किया है, अधुनातन है। नयापन है। इसकी वजह उनके लिखने से पहले बहुत सारा पढऩे और लगातार पढ़ते रहने की शर्त तो काम कर ही रही है, लेकिन लिखना क्या है का सवाल भी उनके लिए अनसुलझा नहीं है, लिखते हुए वे जानते हैं कि उन्हें क्या लिखना है। उन्हें पता है कि नया क्या है और जो कह दिया गया है, उसे फिर से दोहराने से कोई फायदा नहीं है। यहां उनकी विनम्रता वरेण्य हो जाती है जब वे जो कहना चाहते हैं और किसी ने पहले कह रखा है तो उसे जस का तस कोट करते हुए फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं। उन्हें पढ़ते हुए उनके पढ़े हुए का अवगाहन करना भी एक आश्वस्ति है, इस तरह अपने अनुभवों को परोटने के मामले में कहानीकार निष्णात साबित हुए हैं।
माधव एक लेखक के रूप में किसी भी तरह के रीपीटेशन के पक्ष में नहीं है, इसलिए वे अपने पूर्ववर्तियों द्वारा कहे गए को फिर से नहीं कहते। कहने के नये तरीके भी नहीं खोजते बल्कि जो कहने से बचा है, उसे कहने के प्रयास में रचनाकर्म करते हैं।
शनिवार, 28 मई को 'भीड़ में अकेले' मिली। रविवार को पहली कहानी पर नजर गई। टाइटल आकर्षक लगा, 'कितरेत्सु, बूटा गोरिल्ला और टोंगारीÓ। दरअसल, ये एनीमे किरदार हैं, जिनका शगल है आपस में झगड़ते रहना और बच्चों में बड़े प्रसिद्ध हैं। माधव की पहली कहानी में ये नाम बतर्ज भायलापणी के नाम हैं, जो दोस्तों के मोबाइल में एक-दूसरे की पहचान के पर्याय हैं। सभी दोस्तों के के अपने सपने हैं, सिद्धांत हैं और नियति तो है ही। समकाल के सामाजिक, आर्थिक बदलावों को टच करते हुए यह कहानी सधे कदमों से आगे बढ़ते हुए किसी पर भी कमेंट नहीं करती बल्कि आज की पीढ़ी जिस तरह से स्क्रॉल करते हुए आगे बढ़ती है, बढ़ती जाती है।
यह कहानी पूरी की तो अगली कहानी 'गांव का विदा गीतÓ सामने थी। हर भारतीय मन गांव सुनकर नोस्टेल्जिया का शिकार हो ही जाता है। इस कहानी से निकलते हुए मुझे बरबस ही नारू रोग से जागरुकता फैलाने वाले दीवारों पर लिखे स्लोगनो को याद आने लगे। माधव अपनी कहानी शुरू कर चुके होते हैं और अंत तक आते-आते यह सवाल छोड़ जाते हैं कि गांव क्यों खत्म हुआ। जैसे बातपोश अपनी बात को जोर देकर कहता है, माधव कहते हैं 'चैट जीपीटी भी नहीं जानता' तो लगता है जैसे कहीं हम ही तो नहीं हैं, गांवों के हत्यारे!
ये दोनों कहानियां पढऩे के बाद इस संग्रह को छोड़ा जाना संभव नहीं। लेकिन रविवार को तो ज्यादा काम होते हैं। सोचता हूं, संग्रह का टाइटल 'भीड़ में अकेले' तो पढऩी ही चाहिए। संग्रह की सैकंड-लास्ट कहानी। यहां भी एक टीवी का किरदार है-मिस्टर बीन। मैंने पहले भी कहा कि माधव को जहां पहले से कुछ मिला होता है, उसे फिर से कहने की खेचळ नहीं करते, लेकिन उनका कहन और उस पर भी वर्णन की शैली, शायद उनके डायरी लेखन में महारत का परिणाम है कि वे लिखते हुए कहते-से प्रतीत होते हैं। यह कहानी आपाधापी में लगे लोगों के अकेलेपन बल्कि खोखलेपन का वह रोजनामचा है, जो सभी को अपना-सा लगता है।
'चुने हुए दुख' एक मनोवैज्ञानिक कहानी है, जिसके एक शब्द को भी समझने से आप चूके तो कहानी को समझने से चूक सकते हैं। महीन बुनावट और किसी एक शब्द में सारा दुख। अपना चुना हुआ दुख। एक बड़ा सवाल और उस सवाल से जूझते प्राणियों के बीच द्वंद्व। दोषारोपण। निर्णयहीनता।
'आत्महत्या से पूर्व' एक साधारण-सा टाइटल है। जहां लगता है माधव चूके हैं। वे इतने साधारण टाइटल दे ही नहीं सकते! क्यों दिया? वे जानें, लेकिन यह कहानी रोचक होते हुए भी अपने टाइटल की वजह से असर छोड़ नहीं पाती, क्योंकि पाठक को लगता है, माधव कुछ ट्विस्ट देंगे। आत्महत्या होने नहीं देंगे, जैसा माधव अपनी कहानियों में करते भी हैं कि कुछ नया होगा। आत्महत्या होगी नहीं, लेकिन आत्महत्या हो जाती है। कदाचित यह भी ट्रीटमेंट हो।
एक लेखक ता-जिंदगी अपने रचे हुए किरदारों और पाठकों के बीच फंसा हुआ रहता है। अगर एक बार निकल जाता है तो फिर वहीं जाकर फंस जाता है। जाने यह लेखक का शौक है, शगल है या किस्मत। कुछ तो है कि उसे इन सभी में मजा आने लगा है। आदत लग जाती है।
'स्वाद' कहानी दोमुंहे लोगों की एक साधारण-कथा है, जिसमें सवाल है, हैरत है, यथार्थ है। 'बेदखलÓ कहानी संवेदना के तार झनझना देने वाली कहानी है, जहां व्यक्ति न्याय और फैसले के बीच अटपटी स्थितियों में खड़ा है। मार्क और फरीदा की चिंताओं के माध्यम से माधव यहां कई मनों की थाह ले लेते हैं। 'आभे में पसरा दुख' लिखते वक्त जाने कितनी बार माधव ने कागज फाड़े होंगे, यह वे ही जानें, लेकिन यह कहानी उनके पूरे कहानी संग्रह की सबसे उल्लेखनीय कहानी है, जिसमें उन्होंने वह कह दिया है, जो देख-सुन चुके लोग भी कह नहीं पाते। पिता के प्रायश्चित की यह लोमहर्षक कहानी है। यह कहानी एक घुटी हुई चीख है।
इसके अलावा संग्रह में 'सपने में अटकी एक याद' और 'डरा हुआ आदमी' कहानियां समकालीन परिवेश के कुछ स्याह धब्बों की ओर इशारा करती है, लेकिन जैसा कि पहले कह चुका हूं यहां कहानीकार कुछ विजुअल खड़े कर देता है और पाठकों पर छोड़ देता है कि वह 'ऐसा ही होगाÓ मानते हुए आगे निकल जाए या फिर किसी क्रांति का जतन करे।
लगता है माधव खूब घूमे हैं। नहीं घूमें हैं तो दुनिया में उनकी रुचि अच्छी-खासी है। जर्मनी, तुर्की, इजराइल, सीरीया, पाकिस्तान अािद कहानियों में कम प्रयुक्त हुए जैसे देशों के संबंध में उनकी जानकारियां पर्याप्त है, जो उन्हें दूसरे कहानीकारों से अधिक विश्वसनीय बनाती है।
अंतिम कहानी 'तीन शहर : तीन मुलाकातें' एक अप्रतिम प्रेम कहानी है। प्रेम को कुछ नहीं मानने वालों को मनवाना कहानीकार का उद्देश्य नहीं है, क्योंकि माधव से पहले भी हुए हैं कईं लोग जिन्होंने प्रेम को माना है, जाना है, पूजा है। इसलिए यहां भी कहानीकार को उन लोगों से शिकायत नहीं है, जो बतर्ज 'किताबों में छपते हैं चाहत के किस्से, हकीकत की दुनिया में चाहत नहीं है...' कहते हुए प्रेम को खारिज करते हैं। माधव एक जगह शिबोस्र्का को कोट करते हुए कहते हैं, 'जिनको सच्ची मोहब्बत कभी नसीब ही नहीं हुई, उन्हें बड़बड़ाने दीजिये कि ऐसी कोई चीज ही नहीं होती, बस उनका यही यकीन, उनके जीने-मरने को आसान बना देगा।'
माधव की इस किताब को पढऩे के अनेक फायदे हैं। आप सिर्फ कहानी की नई धारा से परिचित तो होते ही हैं। साथ ही साथ आप अनेक पाश्चात्य लेखकों और विचारकों को भी याद कर लेते हैं। उन्हें सीरीया बहुत याद आता है। दो कहानियों में सीरीया है। कोरोना है। गांव है। शराब है। प्रेमिकाएं हैं। भ्रष्टाचार है। नए रेफरेंस है। जुमले हैं और इन सभी के बीच से निकलते हुए उनके पास गोरखनाथ और मछंदरनाथ के किस्से भी हैं। एक गार्ड से वे कहलाते हैं कि हम नेपाली गोरखनाथ को अपना आराध्य मानते हैं और खुद को उनका सिपाही, इसलिये सम्मान में गोरखा कहलाना पसंद करते हैं। कहानी में यह संवाद नहीं होता तब भी कहानी के स्ट्रक्चर पर कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन इस संवाद के होने से कहानी पाठकों को जो जानकारी देती है, उसे अब तक जाने-समझे को चुनौती देता प्रतीत होता है। माधन ने इस संग्रह में ऐसे कई अवसर रचे हैं।
वे अपनी जानकारियों और अनुभवों बल्कि यह कहें कि जिसे वे खुद पसंद करते हैं, उन्हें शेयर करने की अनूठी युक्ति का प्रदर्शन करते हुए पूरे कहानी संग्रह में ऐसे संयोग रचते हैं कि अपनी जानी-समझी बात को कह सकें। बल्क् िऐसा करते हुए वे सफल भी हुए हैं। इस तरह वे यहूदियों पर बात करते हैं। सूफिज्म समझाते हैं तो कभी पाकिस्तान में बलोच का पक्ष रखते हुए नजर आते हैं, लेकिन वे यहां रुकते नहीं। उलझते नहीं। कहते हुए आगे बढ़ जाते हैं, जैसे कोई सधा हुआ बातपोश अपने कथानक को नहीं छोड़ता।
गोरखनाथ की बात करते हुए वे आधुनिक नृत्यकला की प्रवर्तक मानी जाने वाली इज़ाडोरा डंकन तक पहुंच जाते हैं तो बीच-बीच में काफ्का, लाओत्से, रूमी, शिबोस्र्का, नेरुदा, जगायव्स्की, कुंद्रा, प्रूस्त, ओरहान पामुक जैसे नामों को इतनी सहजता से लाकर निकाल ले जाते हैं कि लगता ही नहीं कुछ हुआ हो, लेकिन हलचल तो होती ही है।
इस तरह की हलचल से भरा हुआ यह कहानी संग्रह वाकई भीड़ में अकेल अपनी प्रतिष्ठा को पाएगा। प्रयोग, तकनीक और नयेपन का आग्रह लिए खूबसूरत कहानी संग्रह के लिए माधवजी राठौड़ को ढेर सारे रंग।
कहानी संग्रह बोधि प्रकाशन, जयपुर से छपा है। मूल्य 199 रुपये है।
- हरीश बी.शर्मा
लेखक
हरीश बी शर्मा
पत्रकारिता का लंबा अनुभव। दैनिक भास्कर सहित लोकमत, निर्भय कलम, लॉयन एक्सप्रेस आदि अखबारों में बतौर पत्रकार कार्य किया। राजसूय के सलाहकार संपादक। राजसूय के संस्थापकों में से एक।